11/02/2007

हिंदी का आधुनिक कालिया मर्दन...

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दरअसल, पिछले दिनों हुए नया ज्ञानोदय विवाद पर एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसका नाम रखा गया 'युवा विरोध का नया वरक'। मैंने सोचा कि साल बीतते-बीतते इस पर एक टिप्‍पणी जड़ दी जाए, सो तहलका हिंदी डॉट कॉम में मैंने अपने समीक्षा के स्‍तम्‍भ में इस पुस्तिका के बहाने विवाद पर रोशनी डालने की कोशिश की थी। अजीब है कि समाज-राजनीति के हर क्षेत्र में तहलका मचाने वाले इस माध्‍यम ने साल के सबसे बड़े साहित्यिक तहलके को पढ़ने के बाद छापने से मना कर दिया। इस पर कभी और बात करेंगे कि आखिर इसकी क्‍या वजहें हो सकती हैं, फिलहाल वह समीक्षा जस की तस जनपथ से गुज़रने वालों के लिए प्रस्‍तुत है...








साहित्य रचे जाने के अलावा कभी-कभी हिंदी जगत में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्हें लेखन में जगह मिल जाती है। चाहे वह रचनाकार की निजी अभिव्यक्ति के रूप में सामने आए या आलोचना के स्तर पर, यह बहुत कुछ घटना के वैचारिक और प्रवृत्तिगत स्तर से तय होता है कि उसे कितना स्पेस दिया जाए। आम तौर पर हिंदी में यह चलन नहीं रहा कि किसी घटना से उद्वेलित होकर कुछ लेखक गोल बना कर किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के खिलाफ हल्ला बोल दें। यह हिंदी की जनवादी परंपरा नहीं रही है, लेकिन जिस तरीके से हिंदी में सनसनी का दौर टेलीविजन चैनलों से निर्यात किया जा रहा है, वह लेखन, सम्पादन और प्रतिक्रिया यानी आलोचना पर भी आज हावी हो चला है। इसकी ताज़ा मिसाल हाल ही में छपी एक छोटी-सी पुस्तिका है जिसे नाम दिया गया है 'युवा विरोध का नया वरक'। यह पुस्तिका हिंदी के हालिया 'नया ज्ञानोदय विवाद' पर प्रकाशित की गई है। इसे कुछ अप्रवासी पटनावासियों ने लोक दायरा श्रृंखला के तहत छापा है। गौरतलब है कि लोक दायरा नाम से कुछ युवा लेखकों का समूह पटना में कुछ वर्षों पहले सक्रिय था। इससे पहले पांच पुस्तिकाएं इस श्रृंखला के तहत आ चुकी हैं।

हालांकि, पुस्तिका के प्रकाशन में ज़ाहिर तौर पर कुछ नए-पुराने युवा लेखकों की भूमिका है, लेकिन आश्चर्य तब होता है जब हम इसमें लिखने वालों की सूची में ज्ञानरंजन, राजेश जोशी, नासिरा शर्मा, कृष्णा सोबती, दिलीप चित्रे, अशोक वाजपेयी आदि वरिष्ठ लेखकों के नाम देखते हैं। दरअसल, विवाद शुरू तो हुआ था पत्रिका नया ज्ञानोदय के युवा विशेषांक में लेखकों के अपारम्परिक परिचय से, लेकिन बाद में लेखिका नासिरा शर्मा के बारे में पत्रिका में सम्पादक रवींद्र कालिया की टिप्पणी के चलते मैदान में उपर्युक्त वरिष्ठ आलोचकों-कथाकारों को उतरना पड़ा। खास बात यह है कि इस पुस्तिका के लिए विशेष तौर पर लिखने वाले कम हैं, यहां लेख व प्रतिक्रियाएं अधिकतर साभार ली गई हैं। विवाद के गर्म होने के दौरान कई लेखकों की प्रतिक्रियाएं जनसत्ता, सण्‍डे पोस्ट और राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुई थीं। मोटे तौर पर यह पुस्तिका उन्हीं का एक संकलन है।

सबसे पहले पुस्तिका में ध्यान उसके आवरण पर जाता है। आगे और पीछे दोनों ओर प्रकाशित टिप्पणी से हमें हिंदी में कालिया विरोधी लेखकों की आत्ममुग्धता और प्रूफ की त्रुटियों की भयंकर बानगी मिलती है :

'इस दायरे की खिड़कियां और दरवाज़े इसलिए खुले हैं कि साफ़ और ताज़ी हवा की गुंजाइश हमेशा बनी रहे क्योंकि यही हवा दायरे को ताकत देती है। फिलहाल इस दायरे की ताकत हैं- कृष्ण कल्पित, कुमार मुकुल, पंकज चौधरी, प्रेम भारद्वाज, स्वतंत्र मिश्र, उमाशंकर सिंह, रजनीश, हरेंद्र, अच्युतानंद मिश्र, अरविंद कुमार...।'

यहीं से यह स्पष्ट होने लगता है कि किस तरह सही मुद्दे पर प्रवृत्तिगत बात करने की बजाय इसे व्यक्ति निंदा का औज़ार बना कर खुद को स्थापित करने की चेष्टा की गई है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि आज से आठ माह पहले जब युवा विशेषांक आया था, उपर्युक्त दायरे की आधा दर्जन ताकतें दिल्ली से चल रहे एक साम्राज्यवाद विरोधी लेखक मंच का हिस्सा हुआ करती थीं और वहां यह प्रस्ताव इन्होंने रखा था कि लेखकों के परिचय के खिलाफ अभियान चलाया जाना बहुत ज़रूरी है। पुस्तिका छापने की योजना वहीं परवान चढ़ी थी, लेकिन जब मंच में इस व्यक्ति केंद्रित कुत्सा अभियान को आम सहमति नहीं मिली, तो ये ताकतें उस मंच को कमज़ोर कर के बाहर निकल गईं।

यह बात बिलकुल दीगर है कि नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया के दिल्ली आते ही साहित्यिक माहौल बदलने लगा था। उनकी संपादकीय क्षमता से पहले भी दिल्ली के युवा लेखक परिचित रहे होंगे, फिर पहले उनके दरबार में अपनी रचनाएं छपवाने के लिए मत्था टेकना और फिर कुछ की रचनाएं न छापे जाने से उद्वेलित होकर विरोध अभियान शुरू कर देना आखिर किस प्रवृत्ति का द्योतक है? इसी पुस्तिका में कृष्ण कल्पित ने एक जगह लिखा भी है :

'...इस पूरे साहित्यिक विवाद में कुछ युवा रचनाकारों का जो रूप और संवेदना प्रकट हुई - वह सचमुच महत्वाकांक्षाओं के अंधेरों से भरी हुई थी। यह लड़ाई सड़कों पर लड़ी गई - एसएमएस के जरिए, लेखों के जरिए, ब्लॉग के जरिए, परचों के जरिए।'

ज़ाहिर तौर पर यह बात सच है कि युवा विशेषांक में लेखकों का परिचय बहुत अपमानजनक तरीके से चरित्रहनन की शैली में दिया गया था, लेकिन उसका विरोध जिस प्रवृत्तिगत स्तर पर किया जाना चाहिए था वह संभव नहीं हो सका। पत्रकारिता के खराब नमूने का विरोध करने के लिए वस्तुपरक विवेक को तिलांजलि देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। इस लिहाज से पुस्तिका का हिंदी साहित्य में 'कनटेन्ट' के स्तर पर कोई खास योगदान नहीं दिखता।

हां, यह ज़रूर है कि हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता जिस दौर में पहुंच चुकी है, उसकी तस्वीर हमें पूरे विवाद को समझने और पुस्तिका पढ़ने के बाद साफ मिल जाती है। दूसरे, जिस किस्म के संपादन और भाषा की उम्मीद सुधी लेखकों से की जानी चाहिए, उस पर पुस्तिका खरी नहीं उतरती है। कम दाम में खराब काग़ज़ पर छपाई का पर्याय संपादन की गलतियां नहीं होता।

आखिर में कहने को यही रह जाता है कि हिंदी साहित्य की मौजूदा आत्ममुग्ध तस्वीर से रूबरू होना हो तो इस पुस्तिका को पढ़ें। किस तरह मुद्दे को व्यक्ति में और मैक्रो को माइक्रो में तब्दील कर दिया जाता है, खुद को मार्क्‍सवादी कहने वाले लेखकों द्वारा दी गई यह ताज़ा मिसाल है। बाकी विश्लेषण खुद कुमार मुकुल अपने आलेख 'नया ज्ञानोदय की परिचय पच्चीसी' के नीचे जड़ी टिप्पणी में कर देते हैं- कि इस आलेख को 'हंस' में न छाप पाने के पीछे कथाकार संजीव का क्या तर्क था। उनके तर्क को विस्‍तार दें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तिका साहित्यिक अपशिष्ट में फेंके गए ढेलों का ढूह भर है।

10/12/2007

त्रिलोचन, माओरी और भाषाधर्मी मित्रों के बारे में

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
'भाषाई आत्मसम्मान और एक्टिविज्म'
का सवाल


जीतेंद्र रामप्रकाश

अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्तव




'बोलना का कहिए रे भाई,
बोलत बोलत तत्त नासाई'



(मैं वाणी के बारे में क्या कहूं भाई?
वाणी की अधिकता से तो तत्व का नाश हो जाता है)



ये शब्द एक ऐसे व्यक्ति के हैं जिसे भारत में महान संत का दर्जा प्राप्त है, लेकिन यह व्यक्ति इतना विनम्र था कि इसने खुद को दास कहना ही बेहतर समझा- दास कबीर। यहां जिस संदर्भ में दास प्रयुक्त हुआ है, अंग्रेजी में उसके लिए कोई समानांतर शब्द उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजी में 'स्लेव' या 'सर्वैन्ट' भी इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। दास में अंतर्निहित संकेतार्थ एक सूफियाना विनम्रता का भाव लिए हुए है। इसमें किसी के लिए उपयोगी होने, या कहें चापलूसी का भाव नहीं है। इस शब्द की सभी लक्षणाएं उन मध्यकालीन संत कवियों की देन हैं जिनकी वाणी उतनी ही पवित्र थी जितना उनका जीवन।

भाषा शब्दों से नहीं, उनकी लक्षणाओं से ताल्लुक रखती है। भाषा में अंतर्निहित ये लक्ष्यार्थ सदियों के सांस्कृतिक पोषण का परिणाम हैं। किसी भी शब्द में छिपे संकेत जनता द्वारा प्रयुक्त अर्थच्छवियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए कोई भी भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम भर नहीं है, बल्कि सामूहिक चेतना का एक ऐसा आईना है जिसमें वहां की संस्कृति प्रतिबिंबित होती है, जिसमें उसकी पहचान की जा सकती है। इसी बुनियादी प्रस्थापना के साथ मैं आगे और कुछ बोलने का खतरा मोल ले रहा हूं और मुझे आशा है कि इस प्रक्रिया में मैं 'तत्व का नाश' नहीं होने दूंगा।

भारतीय भाषाओं के संबंध में फैली अज्ञानता, उपयोगितावादी दृष्टिकोण और अपराधबोध के बारे में कोई भी रोषपूर्ण टिप्पणी करने से पहले मुझे सर्वप्रथम अपनी सीमाओं को स्वीकार कर लेना चाहिए। मैं कोई भाषाविद्, विद्वान या विशेषज्ञ नहीं हूं। लेखन में मेरा अनुभव दूसरों की ही तरह मुख्यत: ई-मेल, एसएमएस और आधिकारिक दस्तावेज तैयार करने तक ही सीमित है। मैं ज्यादातर अपनी भाषा ही बोलता हूं और मेरी कोशिश रहती है अपने सीमित भाषाई अनुभवों को उन लोगों तक पहुंचाऊं जिन्हें इनकी दरकार है। मेरे लिए भाषा का अर्थ है 'ज़ुबान' - जिसका प्रयोग संप्रेषण, कार्य संपादन और जीवन के लिए किया जाता है। साथ ही भाषा मेरी सांसों की ध्वनि भी है और मेरा तत्व संगीत भी!

मैं भाषा का उपयोग तो करता हूं, लेकिन शुक्र है कि मैं उपयोगितावादी नहीं हूं। मेरे संपूर्ण विकास और अस्तित्व की पहचान के लिए जिस तरह से मेरे लिए माता-पिता का प्रेम उपयोगी है, उसी तरीके से भाषा का उपयोग भी अन्त:करण में कृतज्ञता और प्रेम के भाव से विच्छिन्न नहीं है। भाषा के प्रति मेरे इस भावावेग के लिए कुछ दिनों पहले तक मेरे पास कोई पारिभाषिक शब्द नहीं था। अब, मैं उस लेखक को धन्यवाद दे सकता हूं जिसने भाषाई 'विकासवाद' के ऊंचे आदर्शवादी मचान पर चढ़ कर हम जैसे लोगों को 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' (क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति अंधवादी) करार दिया है। विद्वानों को बड़े-बड़े नाम देने का बहुत शौक होता है, जैसे अंग्रेजों को था! अंग्रेज बस इतना करते थे कि इन नामों को वे शब्दकोशों में जोड़ लेते थे, मसलन कैंब्रिज शब्दकोश में पियन का अर्थ दिया हुआ है भारतीय नौकर।

हमें हमारी पहचान बताने के लिए आपको साधुवाद! आप जैसे बुध्दिजीवी विद्वानों के रहते हुए आखिर हम जैसे तुच्छ लोग अपनी पहचान भी जानने की ज़ुर्रत कैसे कर सकते हैं? (हालांकि, जैसा मैंने पहले कहा, भाषा का कुल सार उसकी लक्षणाओं में है)। तो अब हुज़ूर-ए-आला की इजाज़त से मैं 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' के इस तमग़े को उसी तरह गर्व से पहनूंगा जैसा कि हम में से कई ने 'स्यूडो सेक्युलर' (छद्म धर्मनिरपेक्ष) के तमग़े को धारण करना चुना है। मैं खुद को संबोधित करने के लिए इसका अधिक से अधिक इस्तेमाल करूंगा, और इसके लगातार प्रयोग से आप द्वारा दिए गए अर्थ को निरर्थक बना दूंगा। हमारे सामूहिक आत्मसम्मान की भावना का अर्थ मैं इस शब्द में भर दूंगा। अगर भाषा हमारी मां है, तो हुजूर इसका 'दास' बनने में हमारा सौभाग्य ही होगा लेकिन एक नौकर हम कभी न होंगे। ज़रा ज़बान संभाल के हुजूर, कहीं हम आपके लफ्ज़ न झटक लें।

'संभल के', उसने कहा, जैसे ही हम उस भरे-पूरे बाज़ार की ध्वनियों को पीछे छोड़ते हुए बाईं ओर जाती एक ऐसी गली में घुस गए जो लगता था अपने अकेलेपन में ही सहमी जा रही हो। गली में प्रवेश करते ही हमारा स्वागत ठहरे हुए पानी के एक गङ्ढे और सीवर के उस गंदले पानी से उठते दुर्गंध के भभूके से हुआ जो घरों की गंदगी साफ कर पाइपों के कंठ में घड़घड़ाते हुए नीचे की ओर आता था। इनके अलावा गली में खेलते खुशनुमा अधनंगे बच्चों के शरीर पर हमेशा मंडराते रहने वाली उन भिनभिनाती मक्खियों ने भी हमारा आवभगत किया जो भारत में काफ्का की याद दिलाती थीं। वह महिला काफी उदार थीं। यह जानते हुए कि हम राजधानी से आए थे और हर महानगरवासी की ही भांति हम भी इस छोटे से शहर में खो जाएंगे, उन्होंने हमारे फोन के जवाब में अपनी बेटी को हमें कुछ दूर तक राह दिखाने भेज दिया था। एक और मोड़, अगली गली और उसके अंत में एक बड़े से आंगन वाला सामान्य लेकिन अनगढ़ सा घर। वहां पहुंचते ही एक महिला हमें घर के अंतिम कमरे तक ले गईं। और ये रहे!

खादी का भूरा कुर्ता और चेक की नीली लुंगी पहने, दो कंबलों को तकिया बनाकर सफेद पलस्तर छोड़ती दीवार के सहारे टिके हुए बिस्तर पर चारों ओर बिखरी किताबों के बीच वह बैठे थे, त्रिलोचन। कौन त्रिलोचन? अब, मैं बिना 'तत्व' खोए उनके बारे में कुछ भी कैसे बोल सकता हूं? जीता-जागता कबीर; एक ऐसा कवि जिसने बीसवीं सदी की शायद सबसे बेहतरीन कविताएं लिखी हैं; एक अमर्त्य लेखक जिसे ज्ञानपीठ पुरस्कार तक नहीं दिया गया, या एक ऐसा ग्रैंड ओल्ड मैन जिनके नाम पर सम्मानस्वरूप आपस में लड़ते-झगड़ते सभी साहित्यिक समूह एक हो जाते हैं। शायद कोई भी विवरण उनके लिए सटीक नहीं बैठता। इस 'त्रिलोचन' की जाने कितनी अर्थच्छवियां हैं।

कुछ ही दिनों पहले उन्हें सवेरे अचानक अस्पताल ले जाना पड़ा था। अब वे इस एकाकी कमरे में अपनी दुनिया में खोए हुए आराम कर रहे हैं। घर की बहू उषा जी हम लोगों के लिए कुछ नाश्ता और शरबत ले आईं। मैंने त्रिलोचन जी के स्वास्थ्य के बारे में कुछ उत्सुकता दिखाई, लेकिन उन्होेंने मेरे सवाल को अनसुना करते हुए अपनी बीमारी के बारे में कुछ भी नहीं बताया। कई बार मेरी ओर देखने के बाद उन्होंने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ी। और उन्होंने क्या-क्या बोलना चुना? अन्य लेखकों के बारे में कुछ बातें, पेड़ों, भाषाओं और बोलियों के बारे में कुछ बातें आदि; इनमें से कुछ ऐसी भाषाएं थीं जिनके नाम मैंने पहले कभी नहीं सुने थे; जो शायद हमारी धरती और इस ग्रह के अन्य हिस्सों पर भी मौजूद हैं।

पर्यावरणविद् चेतावनी देते हैं, 'हमारा खूबसूरत ग्रह खत्म हो रहा है।' जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तानों, सागरों और दुनिया के अन्य सुदूर हिस्सों में हमारे वैज्ञानिक और पर्यावरणवादी आंदोलनकारी संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि, हम में से कई इनकी पूरी तरह प्रशंसा नहीं करते हैं, लेकिन कुछ सचेतन लोग लगातार लड़ाई छेड़े हुए हैं, जो शायद एक हारी हुई लड़ाई है। मिनट दर मिनट तिल-तिल कर हमारी धरती मर रही है...वर्षा के जंगलों को नष्ट किया जा रहा है, हवा में ज़हर घुलता जा रहा है, जल प्रदूषित हो रहा है। दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं...कई चीजें हमारे बोलते-बोलते दुर्लभ हो रही हैं...पौधे, पशु, पक्षी और कीड़े-मकोड़े आदि। जो इनके लिए लड़ रहे हैं, उन्हें शुभकामनाएं।

इसके अलावा एक और ऐसी चीज है जिसकी मौत हो रही है, बहुत शांति से। आकलन के मुताबिक हमारी धरती पर करीब 5500 से 6500 के बीच भाषाएं और बोलियां हैं। इनमें से कई लुप्त हो रही हैं, चूंकि इन्हें बोलने वाले अपने बाद की पीढ़ी को सिखाना ज़रूरी नहीं समझते। हर पखवाड़े दुनिया के किसी कोने में एक भाषा मरती है, अपने अंतिम बोलने वाले की मौत के साथ। इसके बाद कुछ नहीं बचता। न कोई गीत, न ध्वनि, न कथाएं। इसी दर से चलता रहा तो आकलन है कि इस सदी के अंत तक दुनिया की 97 फीसदी भाषाएं समाप्त हो जाएंगी।

एक भाषा की मौत हो ही जाती है तो क्या? हम हमेशा उस भाषा को सीख सकते हैं जो बची हुई है। आखिरकार, सारा मामला जिसकी लाठी उसकी भैंस का ही है! क्यों?
इससे क्या फर्क पड़ता है कि जंगलों में बाघ समाप्त हो रहे हैं.....कि किसी सुदूर वर्षा के जंगल में एक फूल की पंखुड़ियां हमेशा के लिए झड़ जाएं.....या कि एक छोटा-सा कीड़ा सहारा के रेतीले ढूहों में अंतिम बार दफन हो जाए? हमें तो फिल्में देखने और किस्तें चुकाने से ही फुर्सत नहीं है!

'यह बहस अब समाप्त हो चुकी है', ऐसा कहते हैं हमारे अंग्रेज़ीदां बुध्दिजीवी, और ऐसा कहते हुए वे हमें अंधवादी और स्तालिनवादी ठहरा देते हैं। मैं उनकी इस बात से सहमत हूं कि 'अंग्रेजी के बारे में सारी बहस समाप्त हो चुकी है, या हो जानी चाहिए।' वे कहते हैं कि अंग्रेजी के आर्थिक फायदे हैं, इसलिए हमें इसे सीखना चाहिए। ठीक! यह संपर्क का एक माध्यम है और वैश्विक भाषा है। ठीक! हिंग्लिश को हमें स्वीकार करना होगा इसलिए अंग्रेजी शिक्षण और ज्ञान आवश्यक है। ठीक है, मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं। भारतीय भाषाओं के बारे में जो लोग चीखते-चिल्लाते रहते हैं वे महज कमजोर दृष्टि वाले भावनात्मक लोग हैं जो विकास में बाधक हैं। गलत!

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अंग्रेजी अवसरों को भुनाने वाली भाषा बन चुकी है और इसकी आवश्यकता स्वयं सिध्द है। लेकिन गंभीर समस्याएं तब खड़ी हो जाती हैं जब इस आवश्यकता को कोड़ा बना कर भारतीय भाषाओं के प्रेमियों पर फटकारा जाता है। इससे भी बुरा तब होता है जब अपनी मातृभाषा में दक्ष नहीं होने के बचाव में इसे इस्तेमाल किया जाता है, अपनी भाषा से संबध्द हीन ग्रंथि को इस आवश्यकता की चादर से ढंकने की कोशिश की जाती है। यह तर्क गलत तो नहीं है- यह सिर्फ सीमित तर्क है और इसे कहने का तरीका बहुत भद्दा है। 'साहबों' की भांति अक्खड़पन दिखाते हुए ये अंग्रेज़ीदां लोग अपनी सीमित दृष्टि, अपनी रणनीति का दोहरापन और अपने त्रुटिपूर्ण विश्लेषण के छिछलेपन को छुपाने के लिए ऐसा धुआं पैदा करते हैं जो लंबे समय के लिए खतरनाक साबित हो सकता है और हमारी संस्कृति की खुदकुशी के लिए पूर्वपीठिका तैयार करता है!

यह बहस भले खत्म हो चुकी हो, संघर्ष जारी है। अंग्रेजी के बारे में बहस जहां खत्म होती है, जैसा कि होना चाहिए, भारतीय भाषाओं के बारे में संघर्ष वहीं से शुरू होता है। ऐसा ही होना भी चाहिए। यह एक ऐसा संघर्ष है जहां उपयोगितावादी अंग्रेज़ीदां लोगों के साथ हम कोई संभावना नहीं देखते, लेकिन अंग्रेज़ी का एक सामान्य प्रेमी खुद-ब-खुद हमारे साथ है। आखिर एलेन गिन्सबर्ग ने अपनी अंग्रेज़ी भाषा को समृध्द करने के लिए क्या त्रिलोचन से वैदिक काव्यात्मक तत्वों को सीखने में काफी वक्त नहीं गुज़ारा?

भाषाएं किसी प्रयोगशाला के यांत्रिक कार्य या मौखिक परंपरा का हिस्सा नहीं हो सकतीं जिन्हें हम अपनी भावनात्मक पहचान के लिए बचाते फिरें। ये संचार का माध्यम हैं और इनका एक सत्व है। लेकिन कैसा संचार और कैसा सत्व? भाषा कुछ ध्वनियों का समुच्चय ही नहीं है जो बाजार के विनिमय में योगदान दे। यह उपभोग की वस्तु मात्र नहीं है। यह सजीव है। भाषाएं जीती हैं, श्वास लेती हैं, गाती और नाचती हैं, सपने देखती हैं तो प्रार्थना में सिर भी नवाती हैं। भाषाएं, जुंग के शब्दों में कहें तो 'सामूहिक अर्धचेतन' का संरक्षण करती हैं। भाषाओं में हमारे मिथक, मुहावरे और हमारी सामूहिक स्मृति संरक्षित है। ये हमारी संस्कृति को धारण करने वाला पात्र और अस्मिता की वाहक हैं। भाषा में सिर्फ परंपरागत कला की वसीयत और उनके संदर्भ ही नहीं होते, बल्कि व्यक्ति द्वारा अर्जित मूल्य और विश्वदृष्टिकोण भी विद्यमान है। वेदों से लेकर मध्यकालीन संत कवियों तथा दरगाहों पर श्रोताओं के दिलों में गूंजती कव्वालों की आवाज़ों से होते हुए 21वीं सदी के एक निरक्षर किसान तक- भाषाएं हमारे बनते-बिगड़ते दार्शनिक दृष्टिकोण की अर्थच्छायाओं को साथ लेकर चलती हैं जो सदियों तक हमें रास्ता दिखाती हैं। वे स्वप्न में मुझे अपने बेनाम और चेहराविहीन पुरखों को देखने की दृष्टि प्रदान करती हैं जिनमें वे मुझसे बातें करते हैं। किसी की मातृभाषा सिर्फ मुनाफे और नुकसान, प्रेम और गौरव का ही मामला नहीं है बल्कि आत्मबोध का भी मसला है। यह आत्म और उसे मिले उत्तराधिकार के बीच एक अपरिहार्य अंतर्फलक है। यह मेरी व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान का मामला है। और हुजूर, उस पहचान को मैं एक बर्गर के साथ खा नहीं जा सकता। और इसके लिए मैं कोई माफी नहीं मांगूंगा...।

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त्रिलोचन, माओरी और भाषाधर्मी...

3 टिप्‍पणियां:
दरअसल, भाषा के प्रति किसी का रवैया जीवन के प्रति उसके रवैये को प्रतिबिंबित करता है। यह कुछ महत्वपूर्ण चीजों के प्रति उसके वास्तविक रवैये का विस्तार है- जैसे संबंध, प्रेम, बहुलतावाद, राजनीति, संस्कृति और मां धरती। यदि मैं भाषा को तात्कालिक व्यापार के उद्देश्य से मात्र व्यावसायिक विनिमय का औजार मानूं, तो यह ऐसी व्यापक विश्वदृष्टि का परिणाम होगा जो माल आधारित बाजार और उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज है। यदि मैं अपनी भाषा को बहुत महत्व देते हुए दूसरों की भाषा को उपेक्षा से देखूं तोयह रवैया नस्लवाद, धार्मिक और राजनीतिक अलगाववाद के ही समान है जिसके खतरे हम सभी देख चुके हैं। यदि सिर्फ मेरे हितों की खातिर कम प्रयुक्त की जाने वाली बोलियों और भाषाओं के लुप्त होने की संभावना बनती हो, तो यह रवैया अल्पसंख्यकों और हाशिए पर जी रहे लोगों के प्रति असहिष्णुता बरतने के ही समान है। यदि 'सफलता की भाषा' को सीखने की प्रक्रिया में मैं अपनी मातृभाषा बोलने की जहमत न उठाते हुए उसे आधुनिक विश्व व्यवस्था में अप्रासंगिक समझने लगूं, तो यह एक ऐसे व्यक्ति का लक्षण होगा जो सिर्फ सफलता ही नहीं चाहता बल्कि सफल, ताकतवर और वर्चस्वकारी व्यक्तियों की नकल भी बनना चाहता है।

भाषा का सवाल किसी एक नहीं, सभी भाषाओं का सवाल है। इसका संभावित उत्तर बहुवचन में ही दिया जा सकता है। अपनी भाषा के पक्ष में खड़ा होना अपनी अस्मिता के पक्ष में खड़ा होना है, लेकिन दूसरी भाषाओं का विरोध करना फासीवाद का समर्थन करना हुआ। सभी जीवित प्राणियों की भांति भाषाएं एक समाज या समूह का सत्व हैं। ये एक परिवार की अवधारणा से जाकर जुड़ती हैं। भारतीय भाषाओं के परिवार में एक-दूसरे के बीच मजबूत अंतर्सम्बन्ध है जो इसे पोषण प्रदान करता है। यह हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व में बहुलतावाद का परिचायक है और हमारे चरित्र को परिभाषित करने तथा अस्तित्व को तय करने में इसकी बड़ी भूमिका है। इसलिए एक को बचाने का अर्थ होगा कि हम सभी भाषाओं को प्रोत्साहन दें। यह संवादात्मक सह-अस्तित्व के मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना है। इस बहुलतावाद के आधार पर ही हमारा लोकतंत्र बचा रह सकेगा और प्रगति में स्थायित्व बना रह सकेगा। भारतीय भाषाओं के समर्थकों को अवमानित करना बहुलतावाद की अवमानना है। भाषाएं सजीव हैं और अंतर्संवाद से ही उनका विकास संभव है। लेकिन इसी दौरान अगर कोई 'शावनिस्ट' अपनी मातृभाषा को बचाना चाहता है, तो उसके इस सरोकार से खिलवाड़ न करें।

आज भारतीय भाषाओं को संरक्षित करना, उनका विकास करना और प्रोत्साहन देना अपरिहार्य हो गया है। पहले भाषाएं आम आदमी द्वारा गढ़ी जाती थीं और कभी-कभार दरबार के विशेषाधिकार पर यह निर्भर करता था। लोगों के बीच के अंतर्वैयक्तिक संबंधों और संवाद से ध्वनियां पैदा होती थीं जिन्हें लेखक और विद्वज्जन लिखित रूप में संरक्षित करते थे। मसलन, इसी प्रकार से उर्दू का जन्म शास्त्रीय स्रोतों जैसे लश्करी यानी लश्कर या सेना की भाषा, सरायकी यानी सराय की भाषा और दक्खिनी तथा रेख्ता और अन्य रूपों से हुआ। पिछली सदी में मीडिया और प्रौद्योगिकी का अप्रत्याशित विकास ही भाषाओं को तय करता रहा है। आज भाषा सिर्फ सराय और सड़कों पर ही नहीं गढ़ी जाती, बल्कि 'ऑन एयर' और सॉफ्टवेयर में भी बनती-बिगड़ती है। मीडिया को एक ऐसी भाषा की जरूरत है जो किताबी न हो, न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों द्वारा बनाई गई हो बल्कि उत्तेजक हो और निरंतर विस्तृत होते लक्षित वर्ग को संबोधित करती हो। भारतीय जनता किसी स्वीकृत भाषा की कम से कम सैकड़ों बोलियां इस्तेमाल करती हैं। इसीलिए एक ऐसी शब्दावली की आवश्यकता है जो ज़ुबान के आसपास ठहरती हो, जिसे सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि व्यापक भूभाग में इस्तेमाल किया जाता हो। इस वजह से मीडिया और आम आदमी, दोनों की जरूरत है कि भाषा संबंधी जागरूकता का सवाल प्राथमिक हो। और ऐसी जागरूकता एक निश्चित मात्रा में 'एक्टिविज्म' के बगैर संभव नहीं है। बस ज़रूरी यह है कि ऐसा प्रयास कठमुल्लापन और रूढ़िवादिता में न जकड़ जाए।

अपने मामले को समाप्त करने से पहले मैं कहना चाहूंगा कि मेरे ऊपर लगाए गए वर्नैक्युलर स्तालिनवादी होने के आरोप के बारे में मुझे कोई ग्लानि नहीं है। जैसा कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी मेरे विद्वान मित्र धोड़पकर बताते हैं, स्तालिन की अवधारणा थी कि दुनिया की सभी भाषाएं एक दिन लुप्त हो जाएंगी और एक वैश्विक भाषा बचेगी। क्या यह उनकी भविष्यवाणी थी या वह गलती पर थे? यह सोच कर मैं कांप उठता हूं। लेकिन एक चीज के बारे में मैं निश्चित हूं। भाषा के वे नियंता जो हमारे जैसों को 'वर्नैक्युलर शावनिस्ट' का दर्जा देते हैं और भारतीय भाषाओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं, इस मामले में खुद स्तालिनवादी हैं, चूंकि वे काफी हर्षोल्लास से एक ऐसी साम्राज्यवादी वैश्विक भाषा की विजय का जश्न मनाएंगे जो छोटी मछलियों को अपना ग्रास बना लेती हो।

तात्कालिक तौर पर त्रिलोचन मुझे ऐसे नोह की तरह दिखते हैं जो अपनी नाव में सभी भाषाई प्रजातियों को बचा ले जाने के इच्छुक हों। फिर से गलत मुहावरा! यह व्यक्ति सारी परिभाषाओं को चुनौती देता है। इसमें मेरी कम से कम सारी सीमित परिभाषाएं शामिल हैं। मैं इसे विद्वानों के ऊपर छोड़ता हूं। अब मैं उनके यहां से चलना चाहता हूं। यह जानते हुए कि वह मेरी नम्रता को अनदेखा कर देंगे, मै कहता हूं, 'अब आपको आराम करना चाहिए।' उन्होंने मेरा धन्यवाद किया। लेकिन वह पेड़ों की बात क्यों करते हैं? वह बताते हैं, 'मैंने उन सभी फलदायी और अन्य प्राचीन पेड़ों के बारे में लिखा जो मेरे हृदय से निकला।' वह क्यों नहीं सरकारी पुरस्कारों, अनुदानों और सम्मान की बात करते हैं? अपने जीवन की इस अस्त होती सांझ में भी यह व्यक्ति क्यों शब्दों, व्याकरण और विभिन्न भारतीय भाषाओं में काव्य की बात करता है? ठीक है, चूंकि मैं वर्नैक्युलर शावनिस्ट हूं, भारतीय भाषाओं के बारे में उनकी इस पीड़ा को समझ सकता हूं। लेकिन वह क्यों अरब, यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों की भाषाओं की बात करते हैं? वे अंग्रेजी के बारे में भी बोलते हैं और आपको सॉनेट के काव्यात्मक तत्वों के बारे में बताते हैं। और उसी एक सांस में वे अवधी संगीत के बारे में भी बोल जाते हैं, जैसा कि उनके गांव चिरानीपट्टी के लोग गाया करते हैं। मैं ब्रह्मांड की भाषाओं के बारे में इस व्यक्ति के सरोकारों का अर्थ एरिक फ्रॉम के आलोक में ही लगा सकता हूं। उन्होंने कितने बेहतरीन ढंग से बताया था कि आत्मप्रेम संपूर्ण ब्रह्मांड, मित्रों और अजनबियों के प्रति हमारे प्रेम का ही विस्तार है।

मैं थक कर टीवी पर चैनल बदलने लगता हूं। लेकिन यहां पर भी वर्नैक्युलर शावनिस्टों ने दखल दे दिया है। क्या वे हर जगह मौजूद हैं? यह तो मंगलवासियों के हमले जैसा है। क्या सभ्य समाज ने अभी तक इन आदिम जातियों को अपना उपनिवेश बना नहीं छोड़ा है? ये आवाजें निश्चित ही किसी दूसरे ग्रह से आ रही होंगी।

बीबीसी पर एक माओरी लेखक का लंबा साक्षात्कार प्रसारित हुआ। ये माओरी क्या है? खैर, यह न्यूजीलैंड की एक आदिम भाषा है जो दुनिया की अन्य 97 फीसदी भाषाओं की तरह ही लुप्त होने के कगार पर थी। इसके बावजूद कि माओरी जाति की संस्कृति अमूमन वहां सह-अस्तित्व में ही थी, उन्होंने अपनी मौजूदगी दावे के साथ स्थापित कराने का निश्चय किया। सिर्फ भाषा के ही संदर्भ में नहीं, बल्कि अपनी समूची सांस्कृतिक अस्मिता को बचाए रखने के लिए। अब 'श्वेत आत्माएं' आसानी से उन्हें समाप्त नहीं कर सकतीं चूंकि उनकी संस्कृति एक प्रवहमान ताकत है। अब गौरव और प्रेम के साथ इस संस्कृति के सभी पहलुओं पर लोग वापस लौटने को मजबूर हैं। आदिम सभ्यता का संगम अब आधुनिक पहनावे के साथ हो गया है। घरों में कला विराजमान है, पाककला को एक नया आयाम मिला है, वैवाहिक रीतियों का फिर से पालन किया जा रहा है और इन सबके साथ सबसे महत्वपूर्ण यह है कि माओरी भाषा फिर से खिल उठी है। लोगों ने माओरी भाषा के शिक्षण केंद्र बना लिए हैं जहां बुजुर्ग अपने बच्चों को खेल-खेल में ही भाषा के संस्कार दे रहे हैं। एक प्रमुख माओरी लेखक विति इहिमेरा ने अपनी ही कहानियों पर अंग्रेजी में काम किया है जिससे उन्हें फिर से माओरी संदर्भों में स्थापित किया जा सके। टीवी पर अपने साक्षात्कार में वह कहते हैं कि हो सकता है माओरी संस्कृति प्राचीन मिस्र जितनी महान न हो, लेकिन वे उसे मरने नहीं देंगे, चूंकि उसके साथ उनकी पहचान ही समाप्त हो जाएगी और समूची दुनिया इसके सौंदर्य से वंचित हो जाएगी। शावनिस्ट कहीं के!

हमारे साथी वर्नौक्युलर शावनिस्ट और एक सचेतन पत्रकार प्रताप सोमवंशी, जिन्होंने त्रिलोचन को हरिद्वार से देहरादून ले जाकर उनके चिकित्सा का इंतजाम किया, रोज मुझे फोन करते हैं। मेरी ही तरह उनका भी ख्याल है कि त्रिलोचन अपने नाम और बीमारी से कहीं ज्यादा बड़े व्यक्ति हैं। कुछ चिकित्सकीय पहलुओं के बारे में बात करने के बाद उनके पास जीवन के कई क्षेत्रों से तमाम लोगों के अनेक किस्से सुनाने को होते हैं और वे बातें जो त्रिलोचन ने उनसे कहीं। ठहाका लगाते हुए एक घटना से दूसरी सुनाते वक्त वह उस जिजीविषा का संचार करते हैं जो उन्हें उस 'ग्रैंड ओल्ड मैन' से प्राप्त हुई। वह अक्सर इसी किस्म के वाक्यों से अपनी बात खत्म करते हैं, जैसे 'क्या आदमी है सर, मजा आ गया, शुध्द हो गए सेवा करके।'

मेरे अजनबी मित्रो, क्या फूल, पशु और हवा बचे रह सकेंगे? आप जो कोई भी हों, जहां कहीं भी हों, मुझे बताने के कृपा करें। कुछ मौन आवाजें मुझे आश्वासन देती हैं, 'कोई चिंता नहीं, हमारे साथ आओ। हम इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि अगर ये समाप्त हो गए तो हम भी खत्म हो जाएंगे।' जाने कितनी स्त्रियां दुनिया भर में इसी क्षण अपनी बालकनी में पौधों को पानी दे रही होंगी, कितने बच्चे अपने पालतू पशुओं के साथ खेल रहे होंगे और कितने प्रेमी युगल ताजा फूलों से एक दूसरे को संवार रहे होंगे।

कम से कम इस वक्त तो हुजूर वर्नैक्युलर के पैरोकारों की जीत ही नजर आती है। अब स्पाइडरमैन हिंदी बोलने लगा है, बॉण्ड भोजपुरी बोल रहा है, मोबाइल फोन में द्विभाषी कीपैड आने लगे हैं, भाषाई अखबारों ने उस इकलौते अंग्रेजी अखबार को प्रसार युध्द में पीछे छोड़ दिया है जिसका नाम सर्वोच्च दस अखबारों की सूची में आता है और अब तो टेलीविजन भी देसी हो चला है।

लेकिन हुजूर, आप तो पुनर्उपनिवेशित मस्तिष्कों की कमजोरियों और आकांक्षाओं से अच्छी तरह परिचित होंगे। आप तो जानते ही हैं कि हम में से कई आधुनिक बनने के चक्कर में अपने बेडरूम में भी अपनी भाषा बोलने से कतराते हैं। संभव है कि वर्नैक्युलर के पैरोकार लोग ही भाषा संबंधी आत्मसम्मान को जगा सकें। जबकि, आप स्तालिन जैसे लोग यह सोचते हैं कि यह सिर्फ वक्त की बात है और अंतत: वर्नैंक्युलरवादियों की हार होगी। वर्नैक्युलर शावनिस्ट अभी जिंदा हैं। हम जीतें या खत्म हो जाएं, मैं आपके हर कदम पर आपकी बौध्दिक हार का वादा करता हूं, और एक ऐसी लड़ाई का जिसे अंजाम तक हम पहुंचाएंगे।

प्रताप ने फिर से मुझे फोन किया। उन्होंने बताया कि अस्पताल के जिस कमरे में त्रिलोचन भर्ती थे वहां उन्होंने भारतीय भाषाओं के बारे कुछ लोगों को बातचीत करते सुना। वह अचानक अपने बिस्तर पर उठ बैठे और बोले, 'मत घबराओ, बस ऐसी बोलियों को विकसित करो जिनके बारे में लिखा नहीं गया है। मल्लाह, किसान और गड़रिये की भाषा खोजो, अपढ़ और धोबियों की भाषा खोजो। उनके शब्दों को अपनी भाषा की मुख्यधारा में ले आओ। फिर देखो, तुम्हारी भाषा इतनी मधुर हो जाएगी कि उसके संगीत की विजय होगी।'

मैं जानता हूं कि वह माओरी लेखक किस चीज को लेकर इतना प्रसन्न था। वह उसकी जड़ों से उसका जुड़ाव है। अक्सर इस धरती पर यात्रा के दौरान मैं उसके और एक साधारण किसान या साधु के बीच दिखने वाली समानताओं को लेकर चकित हुआ हूं। त्रिलोचन मुझे हर जगह दिखाई देते हैं, कम से कम हमारे देश के बड़े शहरों के बाहर।

उम्मीद है कि नए तरीके ईजाद किए जाएं, बोलियों के लिए नया व्याकरण और शैली बने, शब्दकोश तथा कंप्यूटर की सहायता ली जाए, लेकिन इन सबसे बढ़ कर नई अस्मिताएं पनपें। यह हमारे वक्त में एक ऐसा क्षण है जब, रुस्तम की कविता के शब्दों में हमें 'अपने पुरखों पर ध्यान लगाना होगा।'

हरिद्वार में वह शाम जैसे-जैसे गहराती गई, मेरे हमसफर एक युवा फिल्मकार तुषार त्रिलोचन के पास उनका ऑटोग्राफ लेने वापस गए। मैंने खुद से वादा किया कि अगली बार अपनी यात्रा के दौरान मैं पास में ही स्थित कलियार पीर की दरगाह पर जाऊंगा। उसके बाद हम सड़क किनारे एक नदी के पास कुछ देर के लिए रुके। मेरे जैसे छद्म-धार्मिक, छद्म-वामपंथी, छद्म-बौध्दिक और निश्चित तौर पर एक अछद्म वर्नैक्युलर शावनिस्ट ने हाथ जोड़ कर गंगा मैया से शाम की आरती में शामिल न होने के लिए माफी मांगी।

दास कबीर ने कहा था, 'तीरथ ना करिए...।' मेरे लिए त्रिलोचन तीर्थ हैं। चारों ओर से घेरती शाम के साये में हम गंगा किनारे खड़े थे, मुझे उस समय उसके प्राचीन जल की गहरी बुदबुदाहट सुनाई दी। उसके साथ ही मैंने उसी शाम को कुछ देर पहले अपने सिर पर त्रिलोचन के हाथों के स्पर्श को फिर से महसूस किया।