
मार्च में पिछली पोस्ट से लेकर अब तक जनपथ सूना पड़ा रहा। इसकी एक नहीं, कई वजहें गिनाई जा सकती हैं। बहरहाल, साल बीतने को है और पिछले नौ महीनों में चीजें देखते-समझते ही वक्त गुज़र गया। बच्चन की पंक्तियां सटीक बैठती हैं इस मौके पर.... जीवन की आपाधापी में/कब वक्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी ये सोच सकूं/जो किया, कहा, सुना/ उसमें क्या बुरा, क्या भला...। खैर, साल के अंत में कम से कम यह भाव न आए कि जनपथ परित्यक्त है और सांड़ गायब हो गया है, इसलिए एक ईयर एंडर से बीते साल को श्रद्धांजलि और नए साल का आरंभ...।
यह साल भी खत्म होने को है ।
देख रहा हूं
अखबारों में ईयर एंडर
बदलते पन्नों में बदलते विषय कह रहे हैं चीख-चीख कर
साल, खत्म होने को है।
सोचता हूं क्या किया इस साल, कि औचक
याद आती है किसी की सूक्ति
एक समझदार व्यक्ति वही है जो 30 तक कम्युनिस्ट न रह जाए।
बिखर रहे हैं संदर्भ/ याद रह गई हैं सूक्तियां बस
दिमाग में रोशनी की किरचियां बमबार्डिंग करती हैं
लगता है, जैसे चढ़ती सर्दी में ही विचार सब्लाइम होते हैं।
उलटी गिनती में याद आता है सबसे पहले
मुंतदिर का जूता- साम्राज्यवाद के विरोध का प्रतीक
और 48 करोड़ डॉलर उसकी कीमत
मुकदमा... अभी बाकी है।
सबकी लगा दी गई है बोली
समर्थन की, विरोध की, विरोध के प्रतीकों की
और उसकी भी, जो नट बोल्ट की भांति फिट
कभी-कभार शिकार हो जाता है उलटी धारा का
जैसे, अपना करकरे।
साध्वी जेल में है- खुश है ।
पांडे जेल में है- खुश है।
और अफजल...
उसे लटकाने की हो चुकी है तैयारी मुकम्मल
क्योंकि यह राष्ट्र येन-केन-प्रकारेण हिंदू है
और हिंदू
आतंकवादी हो नहीं सकता
यह पर्याय तो मुसलमान, पारसी, ईसाई, यहूदी के लिए है।
बढ़ा दी गई है सुरक्षा
मेटल डिटेक्टर टटोल रहा है हिंदू राष्ट्र की नब्ज़
खड़ी हैं सेनाएं अपनी-अपनी सीमाओं पर
जोहती आदेश आकाओं का, कि
और नहीं लगने देनी है परमाणु ज़खीरे को ज़ंग।
एक बार, बस एक बार
बिखर जाए खून अबकी ब्रह्मांड की शिराओं में
बन जाए पहाड़ लाशों का, छू ले चांद की सतह।
एक भूखे-नंगे-युद्धोन्मादी देश को देख
हंस पड़े अरबों का चंद्रयान
अपनी आधुनिक बरतानी आंखों से
यूरेका...यूरेका।
और बज पड़े गृह मंत्रालय का भोंपू
इसी की चांदनी में हुआ था 26/11
यूरेका...यूरेका।
हम नहीं कहते
ताज-ओ-तख्त जलाने वाले हिंदू थे...ना।
उन्हें तो सिर्फ फायदा मिला है, और
फायदे का हत्या से जोड़ना
कॉन्सपिरेसी की थियरी है, बल्कि
खुद
कॉन्सपिरेसी है।
जनता फाड़ देगी कपड़े
मांगेगी फांसी तुम्हारे लिए अपने-अपने राम से।
ईश्वर सब देख रहा है
बोलना भी मत।
उसी की भेजी आ रही हैं नेमतें आधुनिक विज्ञान की
राष्ट्र की रक्षा करने
इजराइल से
अमेरिका से
ब्रिटेन से।
यह सब तुम्हारे लिए ही हो रहा है,
भूलना भी मत।
और कर भी क्या पाओगे
जंतर-मंतर जाओगे,
फाड़ोगे सुरक्षा कानूनों की प्रतियां, या
नोंचोगे साम्राज्यवाद का खंबा।
जूता तो बिक गया
तुम्हारी क्या कीमत है भाई।
ओह...
देखो-देखो
चमका है इस अंधेरे में एक हीरा
लूथर किंग का अवतार
कहते हैं, उसके वोट बैंक में किसान नहीं आते।
तुम लगा सकते हो उससे उम्मीद
कहता है, देगा नौकरियां दो लाख।
हमारे यहां तो खैर आजकल मंदी है।
जिस देश के सत्तर फीसद नौजवान नहीं जानते
क्या है ग्लोबलाइजेशन
वहां काहे की मंदी।
मंदी है...
मंदी है साहस की (कह दे कोई कि ताज जलाने वाले अपने थे)
मंदी है विवेक की (बोल कर देखो कि युद्ध गलत है)
मंदी है ज़बान की (लिख दो कि अपने 80 फीसदी की मंदी तो सनातन है)
मंदी है विरोध की (बस सोच कर देखो कि हिंदू आतंकवादी हो सकता है)।
कहती है सरकार
मंदी है पैसे की
समझ नहीं आता।
इसी नासमझी में
चीजों को देखते, समझते, सहते
यह साल भी खत्म होने को है।
हमने की नौकरी डट कर
बने रहे गृहस्थ बारहों मास
रमे रहे दवा-दारू, मिर्च धनिये में।
और अब, जब विचारों के सब्लाइम होने का आया मौसम
तो देखते क्या हैं
एक महाजलूस तोड़ने में लगा है हमारे छंद
भूखे-नंगे-बीमार-अपंग और खुदकुशी करते लोगों की जमीन पर
रातोरात पैदा हो गई है एक कौम।
सब इकट्ठा हैं गेटवे ऑफ इंडिया पर
हाथों में लिए मोम की बत्तियां
आ रही है लाइव फीड- आपका स्वागत है, आज से खुल गया है ताज।
उठ गए हैं हज़ारों कुबेरों के गुदगुदे हाथ
पहली बार बंधी हैं इनकी मुट्ठियां
भभक रही है लौ
अकड़ रही है गरदन
चांद की साजिशी छाया में
बदल गई है इंसानी आवाज़।
एक साथ हुंकारते हैं सहस्र हुंड़ार...
युद्ध।
युद्ध।
युद्ध।