1/26/2012

26 जनवरी स्‍पेशल: क्रांति कैसे आएगी...

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संबोधनों पर न जाएं, जो बात कही जा रही है उसमें वज़न है। गणतंत्र दिवस पर इस किस्‍म के प्रेरणादायक भाषण सुनना बहुत ज़रूरी है। शॉट फिल्‍म 'गुलाल' से है।


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1/24/2012

प्रेतलीला का वक्‍त हो चला है: अरुंधती रॉय

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अरुंधती रॉय
ये मकान है या घर? नए हिंदुस्‍तान का कोई तीर्थ है या फिर प्रेतों के रहने का गोदाम? मुंबई के आल्‍टामाउंट रोड पर जब से एंटिला बना है, अपने भीतर एक रहस्‍य और खतरे को छुपाए लगातार ये सवाल छोड़े हुए है। इसके आने के बाद से चीज़ें काफी कुछ बदल गई हैं यहां। मुझे यहां लाने वाला दोस्‍त कहता है, 'ये लो, आ गया। हमारे नए बादशाह को सलाम करो।'

एंटिला भारत के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी का घर है। मैं इसके बारे में पढ़ा करती थी कि ये अब तक का सबसे महंगा घर है, जिसमें 27 माले हैं, तीन हेलीपैड, नौ लिफ्ट, झूलते हुए बागीचे, बॉलरूम, वेदर रूम, जिम, छह फ्लोर की पार्किंग और 600 नौकर। लेकिन खड़े बागीचे की कल्‍पना तो मैंने कभी की ही नहीं थी- घास की एक विशाल दीवार जो धातु के विशालकाय जाल में अंटी हुई है। उसके कुछ हिस्‍सों में घास सूखी थी और तिनके नीचे गिरने से पहले ही एक आयताकार जाली में फंस जा रहे थे। कोई गंदगी नहीं। यहां ''ट्रिकल डाउन'' काम नहीं करता। हम वहां से निकलने लगे, तो मेरी नज़र पास की एक इमारत पर लटके बोर्ड पर पड़ी, उस पर लिखा था, ''बैंक ऑफ इंडिया''।       

हां, यहां ''ट्रिकल डाउन'' तो बेकार है, लेकिन ''गश अप'' कारगर है। पेले जाओ। यही वजह है कि सवा अरब के देश में सबसे अमीर सौ लोगों का देश के एक-चौथाई सकल घरेलू उत्‍पाद पर कब्‍ज़ा है।

हिंदुस्‍तान में हमारे जैसे 30 करोड़ लोग, जो आर्थिक सुधारों से उपजे मध्‍यवर्ग यानी बाजार की पैदाइश हैं, उन ढाई लाख किसानों की प्रेतात्‍माओं के साथ रहते हैं, जिन्‍होंने कर्ज के बोझ तले अपनी जान दे दी। हमारे साथ चिपटे हैं उन 80 करोड़ लोगों के प्रेत, जिन्‍हें बेदखल कर डाला गया, जिनका सब कुछ छीन लिया गया, जो रोज़ाना 25 रुपए से भी कम पर जि़ंदा हैं ताकि हमारे लिए रास्‍ते बनाए जा सकें।   

अकेले अंबानी की अपनी औकात 20 अरब डॉलर से भी ज्‍यादा की है। सैंतालीस अरब डॉलर की बाजार पूंजी वाली रिलायंस इंडस्‍ट्रीज़ लिमिटेड में उनकी मालिकाना हिस्‍सेदारी है। इसके अलावा दुनिया भर में इस कंपनी के कारोबारी हित फैले हैं। आरआईएल के पास इनफोटेल नाम की कंपनी का 95 फीसदी हिस्‍सा भी है, जिसने कुछ हफ्ते पहले ही एक मीडिया समूह में बड़ी हिस्‍सेदारी खरीदी थी। ये मीडिया समूह समाचार और मनोरंजन चैनल चलाता है। 4जी ब्रॉडबैंड का लाइसेंस अकेले इनफोटेल के पास है। इसके अलावा आरआईएल के पास अपनी एक क्रिकेट टीम भी है।

आरआईएल उन मुट्ठी भर कंपनियों में से एक है जो इस देश को चलाती हैं। इनमें कुछ खानदानी कारोबारी हैं। इसके अलावा दूसरी कंपनियों में टाटा, जिंदल, वेदांता, मित्‍तल, इनफोसिस, एस्‍सार और दूसरी वाली रिलायंस (एडीएजी) है जिसके मालिक मुकेश के भाई अनिल हैं। इन कंपनियों के बीच आगे बढ़ने की होड़ अब यूरोप, मध्‍य एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका तक फैल चुकी है।

मसलन, टाटा की अस्‍सी देशों में सौ से ज्‍यादा कंपनियां हैं। भारत में निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियों में टाटा सबसे बड़ी है।

''गश अप'' का मंत्र किसी कारोबारी को दूसरे क्षेत्र के कारोबार में मालिकाना लेने से नहीं रोकता है, लिहाज़ा आपके पास जितना ज्‍यादा है, आप उतना ही ज्‍यादा और कमा सकते हैं। इस सिलसिले में हालांकि एक के बाद एक इतने दर्दनाक घपले-घोटाले सामने आए हैं जिनसे साफ हुआ है कि कॉरपोरेशन किस तरह नेताओं को, जजों को, नौकरशाहों और यहां तक कि मीडिया घरानों को खरीद लेते हैं, इस लोकतंत्र को खोखला कर देते हैं। बस, कुछ रवायतें बची रह जाती हैं। बॉक्‍साइट, आइरन ओर, तेल, गैस के बड़े-बड़े भंडार जिनकी कीमत खरबों डॉलर में है, कौडि़यों के मोल इन निगमों को बेच दिए गए हैं। ऐसा लगता है कि हाथ घुमाकर मुक्‍त बाज़ार का कान पकड़ने की शर्म तक नहीं बरती गई। भ्रष्‍ट नेताओं और निगमों के गिरोह ने इन भंडारों और इनके वास्‍तविक बाज़ार मूल्‍य को इतना कम कर के आंका कि जनता की अरबों की गाढ़ी कमाई इनकी जेब डकार गई है।

इससे जो असंतोष उपजा है, उससे निपटने के लिए इन निगमों ने अपने शातिर तरीके ईजाद किए हैं। अपने मुनाफे का एक छटांक वे अस्‍पतालों, शिक्षण संस्‍थानों और ट्रस्‍टों को चलाने में खर्च कर देते हैं। ये संस्‍थान बदले में एनजीओ, अकादमिकों, पत्रकारों, कलाकारों, फिल्‍मकारों, साहित्यिक आयोजनों और यहां तक कि विरोध प्रदर्शनों व आंदोलनों को फंडिंग करते हैं। ये दरअसल धर्मार्थ कार्य के बहाने समाज में राय कायम करने वाली ताकतों को अपने प्रभाव में लेने की कवायद है। इन्‍होंने रोज़मर्रा के हालात में इस तरह घुसपैठ बना ली है, सहज से सहज चीज़ों पर ऐसे कब्‍ज़ा कर लिया है कि इन्‍हें चुनौती देना दरअसल खुद ''यथार्थ'' को चुनौती देने जैसा अजीबोगरीब (या कहें रूमानी) लगता है। इसके बाद तो इनका रास्‍ता बेहद आसान हो जाता है, कह सकते हैं कि इनके अलावा कोई चारा ही नहीं रह जाता।   

मसलन, देश के दो सबसे बड़े चैरिटेबल ट्रस्‍ट टाटा चलाता है (उसने पांच करोड़ डॉलर हारवर्ड बिज़नेस स्‍कूल को दान में दिया)। माइनिंग, मेटल और बिजली के क्षेत्र में बड़ी हिस्‍सेदारी रखने वाला जिंदल समूह जिंदल ग्‍लोबल लॉ स्‍कूल चलाता है। जल्‍दी ही ये समूह जिंदल स्‍कूल ऑफ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी भी खोलेगा। सॉफ्टवेयर कंपनी इनफोसिस के मुनाफे से बना न्‍यू इंडिया फाउंडेशन सामाजिक विज्ञानियों को पुरस्‍कार और वजीफे देता है। अब ऐसा लगता है कि मार्क्‍स का क्रांतिकारी सर्वहारा पूंजीवाद की कब्र नहीं खोदेगा, बल्कि खुद पूंजीवाद के पगलाए महंत इस काम को करेंगे, जिन्‍होंने एक विचारधारा को आस्‍था में तब्‍दील कर डाला है। ऐसा लगता है कि उन्‍हें सच्‍चाई दिखाई ही नहीं देती, सही गलत में अंतर करने की ताकत ही नहीं रह गई। मसलन, क्‍लाइमेट चेंज को ही लें, कितना सीधा सा विज्ञान है कि पूंजीवाद (चीन वाली वेरायटी भी) इस धरती को नष्‍ट कर रहा है। उन्‍हें ये बात समझ ही नहीं आती। ''ट्रिकल डाउन''  तो बेकार हो ही चुका था। अब ''गश अप'' की बारी है। ये संकट में है।

मुंबई के गहराते काले आकाश पर जब सांध्‍य तारा उग रहा होता है, तभी एंटिला के भुतहे दरवाज़े पर लिनेन की करारी शर्ट में लकदक खड़खड़ाते वॉकी-टॉकी थामे दरबान नज़र आते हैं। आंखें चौंधियाने वाली बत्तियां भभक उठती हैं। शायद, प्रेतलीला का वक्‍त हो चला है।

(साभार: फाइनेंशियल टाइम्‍स)
(अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव)

1/20/2012

कॉरपोरेट प्रायोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के खिलाफ एक अपील

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पिछले साल की तरह इस साल भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों और प्रतिभागियों ने बरबाद हो रहे पर्यावरण, मानवाधिकारों के घिनौने उल्लंघन और इस आयोजन के कई प्रायोजकों द्वारा अंजाम दिए जा रहे भ्रष्टाचार के प्रति निंदनीय उदासीनता दिखाई है। 2011 में जब इन बातों पर चिंता व्यक्त करते हुए बयान दिए गए, तब फेस्टिवल-निदेशकों ने कहा था कि पहले किसी ने इस ओर हमारा ध्यान नहीं दिलाया था और अगर ये तथ्य सामने लाये जायेंगे तब हम ज़रूर उन पर ध्यान देंगे, लेकिन 2012 में भी उन्होंने ऐसा नहीं किया।  

फेस्टिवल के प्रायोजकों में से एक, बैंक ऑफ अमेरिका ने दिसंबर 2010 में यह घोषणा की थी कि वह विकिलीक्स को दान देने में अपनी सुविधाओं का उपयोग नहीं करने देगा। बैंक का बयान था कि 'बैंक मास्टरकार्ड, पेपाल, वीसा और अन्य के निर्णय को समर्थन करता है और वह विकिलीक्स की मदद के लिये किसी भी लेन-देन को रोकेगा' क्या यह बस संयोग है कि रिलायंस उद्योग के मुकेश अम्बानी इस बैंक के निदेशकों में से हैं? फेस्टिवल में शामिल हो रहे लेखक और कवि क्या ऐसी हरकतों का समर्थन करते हैं? यह दुख की बात है कि विकिलीक्स की प्रशंसा करने वाले कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन और समाचार-पत्र भी इस बैंक के साथ इस आयोजन के सह-प्रायोजक हैं।   

अमेरिका और इज़रायल जैसी वैश्विक शक्तियों के रवैये को दरकिनार करते हुए मई 2007 से लागू सांस्कृतिक विविधता पर संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा कहती है कि शब्दों और चित्रों के माध्यम से विचारों के खुले आदान-प्रदान के लिये आवश्यक अंतर्राष्ट्रीय कदम उठाये जाने चाहिए। विभिन्न संस्कृतियों को स्वयं को अभिव्यक्त करने और आने-जाने के लिये निर्बाध वातावरण की आवश्यकता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, माध्यमों की बहुलता, बहुभाषात्मकता, कला तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान (डिजिटल स्वरूप सहित) तक समान पहुंच तथा अभिव्यक्ति और प्रसार के साधनों तक सभी संस्कृतियों की पहुंच ही सांस्कृतिक विविधता की गारंटी है।   

यूनेस्को द्वारा 1980 में प्रकाशित मैकब्राइड रिपोर्ट में भी कहा गया है कि एक नई अंतर्राष्ट्रीय सूचना और संचार व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें इन्टरनेट के माध्यम से सिमटती भौगोलिक-राजनीतिक सीमाओं की स्थिति में एकतरफा सूचनाओं का खंडन किया जा सके और मानस-पटल को विस्तार दिया जा सके।

याद करें कि 27 जनवरी 1948 को पारित अमेरिकी सूचना और शैक्षणिक आदान-प्रदान कानून में कहा गया है कि 'सत्य एक शक्तिशाली हथियार हो सकता है' जुलाई 2010 में अमेरिकी विदेशी सम्बन्ध सत्यापन कानून 1972 में किये गए संशोधन में अमेरिका ने अमेरिका, उसके लोगों और उसकी नीतियों से संबंधित वैसी किसी भी सूचना के अमेरिका की सीमा के अन्दर वितरित किए जाने पर पाबंदी लगा दी गयी है जिसे अमेरिका ने अपने राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये विदेश में बांटने के लिये तैयार किया हो। इस संशोधन से हमें सीखने की ज़रूरत है और इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिकी सरकार के गैर-अमेरिकी नागरिकों से स्वस्थ सम्बन्ध नहीं हैं।  

इस आयोजन को अमेरिकी सरकार की संस्था अमेरिकन सेंटर का सहयोग प्राप्त है। यह सवाल तो पूछा जाना चाहिए कि दुनिया के 132  देशों में 8000 से अधिक परमाणु हथियारों से लैस 702 अमेरिकी सैनिक ठिकाने क्यों बने हुए हैं?

हम कोका कोला द्वारा इस आयोजन के प्रायोजित होने के विरुद्ध इसलिए हैं क्योंकि इस कंपनी ने केरल के प्लाचीमाड़ा और राजस्थान के कला डेरा सहित 52 सयंत्रों द्वारा भूजल का भयानक दोहन किया है जिस कारण इन संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को पानी के लिये अपने क्षेत्र से बाहर के साधनों पर आश्रित होना पड़ा है।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की एक प्रायोजक रिओ टिंटो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी है जिसका इतिहास फासीवादी और नस्लभेदी सरकारों से गठजोड़ का रहा है और इसके विरुद्ध मानवीय, श्रमिक और पर्यावरण से संबंधित अधिकारों के हनन के असंख्य मामले हैं।

केन्द्रीय सतर्कता आयोग की जांच के अनुसार इस आयोजन की मुख्य प्रायोजक डीएससी लिमिटेड को घोटालों से भरे कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के दौरान 23 प्रतिशत अधिक दर पर ठेके दिए गए।

हमें ऐसा लगता है कि ऐसी ताकतें साहित्यकारों को अपने साथ जोड़कर एक आभासी सच गढ़ना चाहती हैं ताकि उनकी ताकत बनी रहे. ऐसे प्रायोजकों की मिलीभगत से वह वर्तमान स्थिति बरकरार रहती है जिसमें लेखकों, कवियों और कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता पर अंकुश होता है।

हमारा मानना है कि ऐसे अनैतिक और बेईमान धंधेबाजों द्वारा प्रायोजित साहित्यिक आयोजन  एक फील गुड तमाशे के द्वारा 'सम्मोहन की कोशिश' है।  

हम संवेदनात्मक और बौद्धिक तौर पर वर्तमान और भावी पीढ़ी पर पूर्ण रूप से हावी होने के षड्यंत्र को लेकर चिंतित हैं।  

हम जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने का विचार रखने वाले लेखकों, कवियों और कलाकारों से आग्रह करते हैं कि वे कॉरपोरेट अपराध, जनमत बनाने के षड्यंत्रों, और मानवता के ख़िलाफ़ राज्य की हरकतों का विरोध करें तथा ऐसे दागी प्रायोजकों वाले आयोजन में हिस्सा न लें।

हस्ताक्षर

#गोपाल कृष्ण, सिटिज़न फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज़ 

Mb: 9818089660, Email:krishna1715@gmail.com


##प्रकाश के. रे, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय शोध-छात्र संगठन

Mb: 9873313315, E-mail-pkray11@gmail.com


###अभिषेक श्रीवास्‍तव, स्‍वतंत्र पत्रकार

Mb: 8800114126, E-mail-guru.abhishek@gmail.com


पिछले साल की गई अपील के लिए यहां क्लिक करें

1/18/2012

कच्‍छ कथा-5: इस शहर को मौत चाहिए

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सरकारी एकाधिकार का बुलंद झंडा
अगली सुबह ठीक नौ बजे तैयार होकर हम निकल पड़े लखपत की ओर। सोचा सुबह की पेटपूजा रास्‍ते में कहीं कर लेंगे। नखतराणा से पहले एक मुस्लिम बहुल कस्‍बा पड़ा जहां हमने गाड़ी रोकी। एक छोटे से रेस्‍टोरेंट में बड़े अरमान से इडली सांभर का ऑर्डर दिया। सांभर का पहला चम्‍मच मुंह में जाते ही याद आया कि हम कच्‍छ में हैं। सांभर में चीनी थी। ज़ायका ठीक करने के लिए चाय पी और निकल पड़े। रास्‍ते में दो चीज़ें ध्‍यान देने लायक थीं। कदम-कदम पर माइनिंग की साइटें और हर आबादी मुस्लिम बहुल। ऐसा लगता था कि इस रूट पर गुजरात खनिज विकास निगम का कब्‍ज़ा है। लिग्‍नाइट की बड़ी-बड़ी खदानों के बीच पठानी पहनावे में नज़र आते  बकरी चराते इक्‍का-दुक्‍का स्‍थानीय लोग। शायद हम पाकिस्‍तान की सीमा के करीब थे। लखपत पहुंच कर पता चला कि वहां से पाकिस्‍तान की दूरी सिर्फ 50 किलोमीटर है।


बारह किलोमीटर में फैले लखपत शहर की प्राचीर

तकरीबन दिल्‍ली के तुग़लकाबाद की शैली में बना लखपत का किला दूर से ही दिख जाता है। बाहर एक चाय की गुमटी है। उसके अलावा दूर-दूर तक कुछ नहीं। शुरुआत चाय से हुई, जहां मिले दाढ़ी वाले दो गेरुआधारी बाबानुमा जीव। उन्‍हें नारायण सरोवर जाना था जो यहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। एक बाबा कच्‍छ के ही थे, दूसरे जूनागढ़ के। जब मैंने बताया कि मैं बनारस का हूं, तो उन्‍होंने तुरंत गांजे की मांग की। हमने असमर्थता ज़ाहिर की, तो चुनौती देते हुए एक बाबा ने अपनी पोटली खोली, बचा-खुचा स्‍टॉक निकाला और चिलम दगा दिया। कैमरे ने कमाल किया। बाबा अब ग्रिप में थे, लेकिन माल कमज़ोर निकला। बाबा ने जाते-जाते हिंगलाज के दो दाने दिए और उसे चांदी के जंतर में पहन लेने की सलाह दी। 


बाबाओं से विदा लेकर हम चल दिए मुख्‍य द्वार के भीतर, जहां ज़माने भर की हवा कैद होकर ऐसे चक्‍कर लगा रही थी मानो गाड़ी समेत उड़ा ले जाएगी। अब हम लखपत शहर के बीचोबीच थे।लखपत का किला बनाने का श्रेय कच्‍छ के राजा के सेनापति मोहम्‍मद ग़ौस को जाता है। इसी किले के भीतर उनका मक़बरा है। अब वो सेनापति नहीं, पीर हैं।


मुहम्‍मद ग़ौस का मक़बरा और उनके भतीजों की मज़ार

कहते हैं कि एक ज़माने में यहां सिर्फ समुद्री व्‍यापार से एक दिन में एक लाख कौडि़यों का कारोबार होता था। वक्‍त ने ऐसा बदला लिया कि 1819 में बड़ा भूकंप आया जिससे सिंधु नदी ने अपना रास्‍ता बदल दिया। पहले नदी इस शहर के बीच से गुज़रती थी, अब वो सीधे समुद्र में मिलती है। उसके बाद ये शहर अपनी मौत मर गया। करीब 50 परिवार अब भी इस शहर के भीतर हैं जो धीरे-धीरे अपनी मौत का इंतज़ार कर रहे हैं। मौत की दहलीज़ पर खडे ऐसे ही एक बुज़ुर्गवार पर तब नज़र पड़ी जब हम ग़ौस के मक़बरे की तस्‍वीरें उतार रहे थे। वे हमें देख कर भी नहीं देख रहे थे। चेहरे पर अन्‍यमनस्‍कता का ऐसा भाव था कि करीब जाने में संकोच हो रहा था, लेकिन हम गए।


पीर अली शाह
आप... यहीं रहते हैं... मैंने पूछा। उन्‍होंने मेरी ओर देखे बगैर सिर हिलाया। ये मक़बरा किसका है... ? पीर मोहम्‍मद ग़ौस का। और आप यहां कब से रह रहे हैं...? हम इनकी आठवीं पीढ़ी हैं। आपका काम कैसे चलता है...कोई खेती-वेती...? अब उन्‍होंने पहली बार मेरी ओर देखा। फिर उनकी ज़बान खुली तो रुकी नहीं, '';..पांच करोड़ रुपए दिए थे सरकार ने यहां के लिए... नीचे वाले सब खा गए। खेती क्‍या करेंगे इस बंजर में... कुछ नहीं है... भूखे मर रहे हैं। पिछले महीने दो मर गए भूख से। यहां से कुछ दूर 22 कारखाने खुले थे...हमारे लड़कों को नौकरी मिली थी। सरकार ने सब बंद करवा दिया। सबकी नौकरी चली गई...।' मैंने टोका, ''किसका कारखाना था...?'' ''सीमेंट फैक्‍ट्री थी...सब सरकार ने ले ली और बंद कर दिया। यहां सिर्फ जीएमडीसी की चलती है।'' जीएमडीसी यानी गुजरात खनिज विकास निगम। मैंने उनकी पीढ़ी के बारे में पूछा, और पूछा कि मक़बरे के बाहर किनकी मज़ारें हैं। उन्‍होंने बताया कि उनका नाम पीर अली शाह है। उनके वालिद हुआ करते थे परी मोहम्‍मद शाह, उनके वालिद पीर जहांगीर शाह... और ऐसे ही आठ पीढि़यां गुजर गईं। जो मज़ारें मक़बरे के साथ हैं, वे पीर ग़ौस के भतीजों की हैं।

इतनी देर की बातचीत में मुश्किल से उन्‍होंने दो बार मेरी ओर देखा होगा। पीर अली शाह की आंखें  शून्‍य में जाने क्‍या देख रही थीं। हमारे साथी इस बीच गाड़ी लेकर इधर आ गए। ग़लती से उनकी झोंपड़ी के बाहर लगे दो पत्‍थरों में से एक से पहिया छू गया...। पीर अली शाह गुस्‍साए, ''...गाड़ी चलाना भी नहीं आता...सरकारी पत्‍थर है... उठाओ इसको।'' हमने गुस्‍ताखी के लिए माफी मांगी, पत्‍थर को उठा दिया, वे सामान्‍य हो गए और बोलते गए, ''... यहां क्‍या है, कुछ नहीं। बॉर्डर का इलाक़ा है। सिर्फ बीएसएफ वाले हैं। वो देखो दूर एक खड़ा है किले पर, लगातार इधर देख रहा है।'' हमारी नज़र गई उस ओर। हम पर लगातार नज़र रखी जा रही थी। ''क्‍या मुख्‍यमंत्री कभी इधर आए हैं...'', मैंने पूछा। ''कभी नहीं, उसकी क्‍या गलती है, पैसा तो भेजता है, नीचे वाले सब खा जाते हैं।'' ''आप वोट देते हैं...?'' ''नहीं...।''

पीर अली शाह जैसे करीब चार सौ लोग इस भुतहा शहर के भीतर जि़ंदगी काट रहे हैं।  या कहें जि़ंदगी इन्‍हें काट रही है। सरकार की ओर से मिला हुआ मल्‍टीपरपज़ नेशनल आइडेंटिटी कार्ड है। ये सारे भारत के नागरिक होने का दावा कर सकते हैं, लेकिन इस नागरिकता का सिर्फ एक ही फ़ायदा है कि बीएसएफ की संगीनें इनकी ओर कभी नहीं  तनीं। बाकी मौत लगातार इन्‍हें घूरे जा रही है सही वक्‍त की तलाश में। बहरहाल, आगे बढ़ते हैं। सिर्फ इंसान नहीं, ढहती इमारतें भी हैं यहां।

गुरुद्वारा कोट लखपत, जहां गुरुनानक देव रुके थे

ग्रंथी सुखचंद जी
इन्‍हीं में से एक वो गुरुद्वारा है जिसे गुरुनानक के शिष्‍य ने बनवाया था। कहते हैं कि गुरुनानक मक्‍का की यात्रा पर जब गए थे तो रात इसी जगह पर उन्‍होंने गुज़ारी थी। गुरुद्वारे के ग्रंथी सुखचंद जी बताते हैं कि ये भारत का पहला गुरुद्वारा है। यहां गुरुनानक की पादुका और कई अन्‍य चीज़ें अब तक सहेज कर रखी हुई हैं। यहां रोज़ दो बजे लंगर खुलता है। अधिकतम पंद्रह लोग, कम से कम दो लोग शामिल होते हैं। आज इत्‍तेफ़ाक था कि हमारे अलावा एक सरदार जी और उनके न्‍यूजीलैंड से आए दो मित्र भी लंगर में शामिल थे। बड़े प्‍यार से रोटी सब्‍ज़ी हमने यहां खाई। खाना खाकर उठे बरतन धोने तो सुखचंद जी का बच्‍चा मेरे पैर से लिपट गया। मेरा पैर ही क्‍यों, पता नहीं। कहते-कहते भी उसने पैर नहीं छोड़ा। उसकी मां को आना पड़ा। वो बताती है कि यहां कोई नहीं आता, इसलिए आप लोगों को देखकर ये ऐसे कर रहा है।

निर्जन बचपन  
न्‍यूजीलैंड वाले सरदार जी ने पूछा कि ये बच्‍चा पढ़ता है या नहीं। सुखचंद जी दुखी हो गए। बोले, इसे पढ़ाने चंडीगढ़ ले जाऊंगा, यहां तो कुछ भी नहीं है। सरदार जी नसीहत देकर चले गए कि इसे ज़रूर पढ़ाना। मुझे समझ नहीं आया कि उनसे क्‍या कहा जाए, हम चुपचाप निकल लिए सत श्री अकाल कर के।

अब इस शहर में रुकना भारी हो रहा था। बाहर निकले और नारायण सरोवर के रास्‍ते पर चल दिए। करीब दो किलोमीटर की दूरी पर बीएसएफ की सीमा सुरक्षा चौकी दिखी। सोचा, सीमा भी देख लें। वहां पहुंचे तो संतरी ने अपने अधिकारी को बुलाया। एक जवान भी आया। उसने बताया कि वो हमें किले में दूर से आवाज़ दे रहा था। दूरबीन से उसने हमें देख लिया था। कुछ देर की बातचीत हुई जवानों के साथ। सामने एक बोर्ड पर लिखा था, 'करके रहूंगा।' मैंने पूछा आप क्‍या करते हैं यहां। यहां तो कुछ भी नहीं। एक जवान ने कहा, ''कब कौन आ जाए यहां, कुछ भी हो सकता है। जैसे देखिए, आप ही यहां आ गए...यही काम है हमारा।'' हमने सोचा, अच्‍छा हुआ, हम खुद मिलने आ गए। क्‍या जाने कब किससे राष्‍ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाए।

एक अजीब सा खालीपन भर गया लखपत हमारे भीतर। जाने अगली बार यहां आने पर पीर अली शाह मिलें या नहीं। भुज में नौकरी की तलाश में भटकते उनके लड़के नहीं जानते कि उनका बाप शून्‍य में क्‍या देखता रहता है। हम भी केवल अंदाज़ा लगा सकते हैं। अगर इस देश का नागरिक होना संगीनों से बच जाना भर है, तो इस शहर को तुरंत मौत का फ़रमान सुना दिया जाना चाहिए।  

न शिकन, न रुकन: पाकिस्‍तान से लगी सीमा की एक सड़क जिस पर इंसान नहीं चलते


पिछले अध्‍यायों के लिए नीचे दिए लिंक पर जाएं

कच्‍छ कथा: भाग 1
कच्‍छ कथा: भाग 2
कच्‍छ कथा: भाग 3
कच्‍छ कथा: भाग 4

टिप्‍पणी: इस पोस्‍ट को लिखने के बाद मैं अचानक लंबे समय तक अवसाद में घिरा रहा था। नतीजा ये हुआ कि कच्‍छ कथा के दो खंड अब भी बाकी हैं- एक मंडावी और दूसरा धौलावीरा का। चीज़ें दिमाग में अब भी ताज़ा हैं, डीटेलिंग भले मिट गई हो। किसी दिन सुर चढ़ने पर लिख डालूंगा। (12.05.2012)







1/17/2012

कच्‍छ कथा-4: रणछोड़ के देश में 'रणवीर'

1 टिप्पणी:
इसी पाइप ने हमें रण की झुलसाती धूप से बचाया
तो साहब, रण के बीच चटक दुपहरी में एक पाइपलाइन के भीतर दिन बिताने के बाद हमने शाम का जो नज़ारा देखा, तो सारे शब्‍द भूल गए। जैसे-जैसे सूरज उतरता, वैसे-वैसे चांद चढ़ता जाता। एक बढि़या ज़ूम लेंस की कमी अखरने लगी। बहरहाल, जइसे तइसे फोटो लेके फारिग हुए। दोबारा पंडाल में पहुंचे जहां साढे सात बजे से सांस्‍कृतिक कार्यक्रम होना तय था। एक सज्‍जन मंच पर खड़े होकर गुजराती में कुछ-कुछ बोल रहे थे और सामने मुश्किल से दस लोग बैठे हुए थे। तय हो गया कि सरकारी रण महोत्‍सव इस बार पूरी तरह से फ्लॉप है। हम कट लिए वापस भुज की ओर।

मदीना रेस्‍टोरेंट में हरींद्र गिरि
दो दिन से नमकीन पानी और मीठी सब्‍ज़ी-दाल खाकर मन भिनभिना गया था। सोचे, आज रात बढि़या भोजन लेना ही होगा। इसी तलाश में भुज से बाहर ही एक मुस्लिम इलाके में हमने गाड़ी रोकी। रात के करीब दस बज रहे थे। हमारे सामने था मदीना होटल। उम्‍मीद थी कि यहां नमक में चीनी की मिलावट नहीं होती होगी। जैसे ही उतरे, एक सज्‍जन ढाबे के भीतर से भागते हुए आए। एम्बियंस में गुड्डू रंगीला का एक गाना बज रहा था। गले में पड़े लाल गमछे का कमाल था कि बिना बताए उन्‍होंने भांप लिया कि हम यूपी-बिहार के लोग हैं। हालांकि, हमें ये बात पूछ कर ही पता चली कि वे भी बिहार के थे। पहले तो इससे सुकून मिला, फिर भगोने के भीतर झांक कर देखा तो शोरबे का रंग  बता रहा था कि खाना खाया जा सकता है। हम बैठ गए। उसके बाद भाई रवींद्र गिरि और हरींद्र गिरि से जो बातचीत आगे बढ़ी, तो कई अनजानी परतें खुलीं।

बात-बात में छह इंच करने वाले रवींद्र गिरि
आज से करीब दस साल पहले गिरि बंधु बिहार के जहानाबाद से भुज आए थे, जब यहां भूकंप आया था। रवींद्र बताते हैं कि उनके जैसे करीब साढ़े पांच सौ बिहारी भुज में काम करते हैं। सभी को अच्‍छी तनख्‍वाह मिलती है। रवींद्र के पास मालिक की दी हुई एक कार है, फ्री में रहने के लिए एक मकान और खाना भी मुफ्त। रवींद्र यहां उस्‍ताद हैं। मांस, मछली, मुर्गा पकाते हैं। हरींद्र उनके छोटे भाई हैं। वेटर का काम करते हैं। रवींद्र को दस हजार और हरींद्र को छह हजार तनख्‍वाह मिलती है। दोनों अगले महीने तीन माह की छुट्टी पर अपने गांव जाएंगे, लेकिन उनकी तनख्‍वाह बनती रहेगी। यानी तीन महीने की तनख्‍वाह मुफ्त। रवींद्र कहते हैं, 'ऐसी नौकरी और कहां मिलेगी।'

हरींद्र बड़े प्‍यार से गरम गरम रोटी लाते हैं और बैकग्राउंड से रवींद्र की आवाज़ आती है, 'जहानाबाद का नाम सुने हैं न साहब।' हम हां में सिर हिलाते हैं। हरींद्र कहते हैं, 'वही, छौ इंच वाला जगह...।' हम ठहाका लगा देते हैं। अगल-बगल एकाध कच्‍छी बंधु भी हैं। वो बात को पकड़ने की कोशिश में लगे दिखते हैं। हमारे लिए ये एक सुखद आश्‍चर्य है कि भुज जैसी सुदूर जगह पर बिहार का आदमी क्‍या और क्‍यों कर रहा है। कारण पता लगाने की कोशिश में दो बातें समझ में आती हैं।

सन 2000-2001 का दौर ऐसा था जब बिहार में जाति सेनाओं का दमन अपने चरम पर पहुंच चुका था। रणवीर सेना ने उस वक्‍त एक बड़े हत्‍याकांड को अंजाम दिया था। उसके बाद से ही लालू प्रसाद यादव की सरकार ने दमन का दौर शुरू किया। जाति सेनाओं के कमांडरों की गिरफ्तारियां हुईं, भगदड़ मची और इसकी परिणति हुई ब्रह्मेश्‍वर मुखिया की गिरफ्तारी में। ये बात अगस्‍त 2002 की है। पिछले दिनों मुखिया रिहा हुए, तब हमने देखा और सुना कि किस तरह सैंकड़ों बंदूकों की सलामी से उनका स्‍वागत किया गया। ऐसा नहीं है कि जाति सेनाओं के तमाम कार्यकर्ता उस दौर में वहीं रह गए। जानने वाले बताते हैं कि खासकर जहानाबाद और गया से बड़े पैमाने पर भगदड़ मची। 2001 में भुज में भूकंप आया और तकरीबन नब्‍बे फीसदी भुज तबाह हो गया। चारों ओर से मानवीय राहत आई। इसी धकापेल में यहां एक जगह बनी बाहरी लोगों के लिए।

बरकरार है सामंती ठसक कच्‍छ की धरती पर
दस साल पहले भुज में,या कहें गुजरात में दो किस्‍म का पलायन शुरू हुआ। पहला गांव से शहरों की ओर पलायन और दूसरा, दूसरे राज्‍यों से गुजरात की ओर। इसी जटिल समीकरण में भुज के नवनिर्माण के लिए बड़े कार्यबल की जरूरत पड़ी। जिन्‍हें खुद भागने की जरूरत थी, वे अपने आप कच्‍छ आ गए। बाकी मजदूरों को यहां के सेठिया उठा लाए। बिहार और उड़ीसा से काम की तलाश में लोग लाए गए। ऐसे में सरकारी दमन से बचने के लिए तमाम रणवीरों के लिए रण से बेहतर जगह कोई नहीं हो सकती थी। रवींद्र, हरींद्र और उनके जैसे जहानाबाद के कई सवर्ण इसी प्रक्रिया के नतीजे में यहां तक पहुंचे। आज भी उनकी सामंती ठसक बातचीत और काम करने के तरीकों में साफ दिखती है।
और ये रहे द्वारकाधीश रणछोड़जी
इस कहानी में कई झोल हो सकते हैं। ये तथ्‍यात्‍मक रूप से अपुष्‍ट भी हो सकती है। लेकिन मेटाफर यानी मुहावरे में चीज़ें बड़ी फिट बैठती हैं। कहते हैं कि गुजरात के द्वारका में कृष्‍ण का जो जग प्रसिद्ध मंदिर है, उसमें उनके रणछोड़ स्‍वरूप की पूजा की जाती है। कहानी कुछ यूं है कि जरासंध से युद्ध में डर कर अपने अनुचरों की प्राण रक्षा के लिए कृष्‍ण भागकर द्वारका आ गए थे। उन्‍हीं के साथ अहीर भी गुजरात में आकर बस गए थे। पूरब के लोग कृष्‍ण के जिस रूप की उपासना करते हैं, गुजरात में उसके ठीक उलट मामला है। हम मानते हैं कि कृष्‍ण ने अर्जुन को युद्ध का धर्म सिखलाया, लेकिन गुजरात में युद्धभूमि से भाग आए रणछोड़ की स्‍थापना है। रवींद्र और हरींद्र गिरि की कहानी भी रणभूमि को छोड़ आए रणवीरों की आधुनिक दास्‍तान है।

बहरहाल, मेटाफर अपनी जगह, लेकिन सच्‍चाई ये थी कि दो दिन बाद बढि़या खाना खाकर मन प्रसन्‍न हो गया। कच्‍छ में गुड्डू रंगीला सुनने को मिला, भोजपुरी की मिठास महकी और दिन का अंत हुआ पान से। जी हां, उस मुस्लिम बहुल इलाके में पान का एक ठीया खुला मिल गया। एक मौलाना बैठ कर करीने से पान लगा रहे थे1 बढि़या बनारसी पत्‍ता था। सब कुछ ठीक था, बस सुपारी गीली नहीं मिली। यहां के लोग यानी मुस्लिम बरछी सुपारी खाना पसंद करते हैं, वो भी सूखी। बाकी हिंदू कच्‍छी तो पान खाते नहीं। पहली बार नगालैंड में ऐसा सुपारी कट मैंने देखा था। उसके बावजूद एक-एक पान खाकर हम चल दिए अपने गेस्‍ट हाउस की ओर। उसी गेस्‍ट हाउस की ओर, जहां एक रात पहले काफी अपमानित हुए थे हम।

खैर, अगले दिन सुबह निकलना था एक ऐसे मुक़ाम पर जहां कोई नहीं रहता। कोई नहीं, मतलब कोई नहीं। विकीपीडिया पर इसे 'गोस्‍ट सिटी' का दर्जा मिला हुआ है यानी भुतहा शहर। भुज से कोई 150 किलोमीटर की दूरी पर बसा ये शहर अब उजाड़ है। कभी सिंधु नदी के रास्‍ता बदल लेने के बाद एक दौर का सबसे व्‍यस्‍त और अमीर बंदरगाह आज पर्यटक मानचित्र पर ही बचा रह गया है। यहां एक दिन में एक लाख कौड़ी का करोबार हुआ करता था, लिहाजा नाम पड़ा लखपत। अगले अध्‍याय में करेंगे लखपत की सैर। फिलहाल बस एक झलक नीचे।

भुतहा शहर कोट लखपत जिसके भीतर छिपा है
समृद्धि और तबाही का एक इतिहास
एक बात और... अभी हम रण छोड़ कर नहीं जा रहे। दरअसल, हमारी समूची यात्रा ही कच्‍छ के रण के इर्द-गिर्द प्रस्‍तावित है। लखपत भी रण के किनारे है। और हां, रण छोड़ कर जाना एक भ्रम के अलावा कुछ नहीं। कृष्‍ण हों या गिरि बंधु, एक रण छोड़ के आए तो दूसरे में फंस गए। इसलिए रणछोड़ की पूजा कर लेने भर से कोई अहिंसक नहीं हो जाता, जैसा कि गुजरातियों के बारे में आमफ़हम भ्रांति है। गुजरात के समाज में रणछोड़ की पूजा और हिंसा के बीच एक गहरा संबंध है, लेकिन ये सब भारी बातें कभी और।
कच्‍छ कथा-5: इस शहर को मौत चाहिए
कच्‍छ कथा-1 : थोड़ा मीठा, थोड़ा मीठू
कच्‍छ कथा-2 : यहां नमक मीठू क्‍यों है
कच्‍छ कथा-3 : कच्‍छी समाज की घुटन के पार




1/16/2012

कच्‍छ कथा-3: कच्‍छी समाज की घुटन के पार

1 टिप्पणी:
बिन छाछ सब सून 
... तो अपने सफ़र की पहली रात हमने लालजी के परिवार के साथ गुज़ारी। रात के खाने में लालजी की घरवाली ने बाजरे की रोटी, डोकरा (मेथी के पकोड़े), सब्‍जी, खिचड़ी, मिर्च की भुजिया खिलाई और साथ में अनलिमिटेड छाछ की व्‍यवस्‍था थी। बताते चलें कि कच्‍छ में छाछ इकलौती ऐसी चीज़ है जो कभी मुफ्त मिला करती थी, लेकिन पिछले दस साल के अंधाधुंध औद्योगिक विकास और शहरीकरण ने इसे भी बिकाऊ बना दिया। हम आगे बात करेंगे  इस बारे में विस्‍तार से, लेकिन पहले लालजी के घर से लेते हैं विदा।
हमसफ़र छोटू, चंद्रमणि और अरविंद
अगली दोपहर हम वापस निकल पड़े। हां, दोपहर का भोजन लालजी के यहां से कर के ही निकले। मेरे साले साहब को अहमदाबाद लौटना था और मेरे मित्रों को, जिनके साथ सफ़र की योजना बनी थी, उन्‍हें मुझको लेने गाड़ी से पाटड़ी तक आना था। पाटड़ी के बाज़ार में करीब तीन घंटा मुझे उनका इंतज़ार करना पड़ा। शाम साढ़े तीन के आसपास बीएचयू के पुराने मित्र अरविंद, चंद्रमणि और उनका छोटा भाई छोटू एस्‍टीम गाड़ी से पाटड़ी में मिले। यहां से हम लोग समाख्‍याली का हाइवे पकड़ कर भुज के लिए निकले।

भुज कच्‍छ का जिला मुख्‍यालय है। ये वही शहर है जहां आज से ग्‍यारह साल पहले 2001 में 26 जनवरी को विनाशकारी भूकंप आया था। पूरा शहर तबाह हो गया था। करीब 200 बच्‍चों की जान चली गई थी। सबसे ज्‍यादा नुकसान अंजार और भचाऊ के  आसपास हुआ था। समाख्‍याली हाइवे से भुज की ओर बढ़ते हुए हालांकि भूकंप के कोई निशान नहीं दिखते। चकाचक चौड़ा हाइवे, रास्‍ते में चाय की दुकानें और गुजराती ढाबे। गाड़ी की गति बहुत आराम से 100 रखी जा सकती है। रास्‍ते भर आपको तमाम कारखाने, गुजरात खनिज विकास निगम की माइनें और चिमनियां धुआं छोड़ती दिखती हैं।


विकास की रोशनी में ढलती परंपरा की शाम


भचाऊ से भुज का रास्‍ता खराब है। यहां रफ्तार धीमी पड़ जाती है। रात 11 बजे के करीब  हम भुज के बाहरी इलाके में पहुंचे। खाना खाने के लिए एक गुजराती होटल में रुके। यहां का मेन्‍यू देख कर समझ में नहीं आया क्‍या खाएं, क्‍या नहीं। नमक वाली हर चीज़ में चीनी थी। बड़ी मुश्किल से चने की दाल मिली जिसे आराम से खाया जा सकता था।  साथ में 5 रुपया गिलास छाछ भी। पेट तो भर गया, लेकिन मन खराब हो गया। करीब 12 बजे हम पहुंचे कच्‍छी समाज के गेस्‍ट हाउस, जहां हमारे रुकने की व्‍यवस्‍था वहां के ट्रस्‍टी मुकेश छेड़ा के माध्‍यम से हुई थी।

कहते हैं कि कच्‍छ के लोग बहुत आतिथ्‍य करते हैं, हॉस्पिटेबल होते हैं। छोटे रण में लालजी के यहां तो ये बात सही साबित हुई थी, लेकिन कच्‍छी समाज के गेस्‍ट हाउस में बड़ा झटका लगा। सबसे पहले तो हमें इस बात का अहसास दिलाया गया कि हमें ये कमरा नहीं मिलता अगर हमने ट्रस्‍टी से नहीं कहलवाया होता। रिसेप्‍शन पर बैठे एक कच्‍छी बाबू ने बहुत खराब लहजे में बात की। उसने हमारे धर्म, राज्‍य, जाति से लेकर तमाम जानकारियां ले लीं। उसने साफ लहजे में कहा कि आप हिंदू हैं ता क्‍या हुआ, कच्‍छी नहीं हैं। अगर आपके नाम के आगे कच्‍छी सरनेम नहीं लगा हो, तो भुज में कमरा मिलना मुश्किल है। उसके कहने का लब्‍बोलुआब ये था कि वो हमें कमरा देकर अहसान कर रहे हैं। सब कुछ तब तक सहनीय था जब तक कि उसने आई कार्ड  का फोटोस्‍टेट लाने को नहीं कहा। हमने पूछा कि रात में बारह बजे एक अनजान शहर में कहां से फोटोस्‍टेट कराएं, तो उसका जवाब बिल्‍कुल बेहूदा था। उसने कहा कि इसीलिए हम चार बजे के बाद कमरा नहीं देते। वो तो आप कहलवा कर आए हैं इसलिए शुक्र मनाइए। हमारा स्‍वार्थ न होता तो पता नहीं उसे कितनी मार पड़ती, लेकिन हम गुस्‍सा सह कर चुप रह गए।

बताते हैं कि भुज में या कहें पूरे कच्‍छ में आज से दस साल पहले ऐसा नहीं था। लोग बड़े प्रेमी किस्‍म के हुआ करते थे। भूकंप के बाद जिस बड़े पैमाने पर यहां पैसा आया, जिस तरीके से कारखाने लगे और लोग अमीर हुए, यहां की संस्‍कृति और परंपरा से उन्‍होंने उतनी ही तेजी से हाथ धो लिया। ऐसा नहीं है कि इस विकास ने लोगों को मानसिक रूप से प्रगतिशील बनाने का काम किया। वे और ज्‍यादा अपनी रूढि़यों में धंसते चले गए। इसी का नतीजा है कि भुज और इसके बाहर के इलाकों में एक हाफ कटिंग चाय यानी हमारी भाषा में आधा गिलास चाय का दाम दस रुपए तक ले लिया जाता है और आप कुछ कह नहीं पाते।

भुज: भूकंप की गर्द से उठा एक चमचमाता शहर
बहरहाल, सवेरे शहर के दर्शन हुए। भुज के बारे में जैसी कल्‍पना थी, उससे उलट ये शहर काफी विकसित है। बड़ी बड़ी बिल्डिंगें, अपार्टमेंट और बाज़ार में दुनिया भर के सारे ब्रांड यहां मौजूद हैं। लगता है कि भूकंप यहां के लिए एक अदृश्‍य वरदान के रूप में आया था जिसने हर पुरानी चीज़ को झाड़-पोंछ दिया। एक बड़ी दिलचस्‍प चीज़ ये देखने को मिली कि पूरे शहर में नरेंद्र मोदी के अलग-अलग किस्‍म के होर्डिंग और बोर्ड लगे थे। सद्भावना यात्रा से लेकर रण महोत्‍सव तक हर चीज़ नरेंद्र मोदी के रास्‍ते ही संपन्‍न हो रही थी। ये स्थिति पूरे गुजरात में है।

भुज से हमारा सफ़र अब नमक के सफेद रेगिस्‍तान की ओर था, जहां रण महोसव 14 जनवरी तक मनाया गया। जिस गांव में ये महोत्‍सव मनाया जा रहा था, उसका नाम है धोरडो। ये गांव भुज से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर है। भचाऊ से भुज क रास्‍ते में इस गांव का काफी विज्ञापन किया गया है। भुज से धोरडो के बीच हर दस किलोमीटर पर औसतन एक तोरण द्वार लगा है जो आपका स्‍वागत करता है।

भुज से करीब 30 किलोमीटर आगे एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है कि आप ट्रॉपिक ऑफ कैंसर यानी कर्क रेखा से गुज़र रहे हैं। इसे देखकर समझ में आता है कि यहां तन जलाने वाली गर्मी और हांड़ कंपाने वाली ठंड क्‍यों पड़ती है। फिलहाल, मौसम का हाल ये था कि आप धूप में बगैर चश्‍मे और गमछे के खड़े नहीं हो सकते, और छांव में ठंडी हवा से कंपकंपी महसूस होती थी। सड़क के दोनों ओर क्रीक का इलाका है जहां समुद्र का पानी भरा है। कहीं-कहीं ये ज़मीन दलदली भी हो जाती है। सौ किलोमीटर पार कर के हम पहुंचते हैं धोरडो गांव, जहां गुजरात का सरकारी रण महोत्‍सव चल रहा है।

रण महोत्‍सव की साइट पर हमसे पास मांगा जाता है। हमने पास नहीं लिया है। हमें इसकी जानकारी भी नहीं थी। हमें बताया जाता है कि बीस किलोमीटर पीछे वाले तोरण द्वार पर पास मिलता है। पता चलता है कि उसकी सूचना गुजराती में लिखी थी, इसलिए हम मिस कर गए। हमने बताया कि हम सब पत्रकार हैं। तब कहीं जाकर हमें भीतर घुसने दिया गया। रण के खुले मैदान में महोत्‍सव के लिए अस्‍थायी ढांचे बनाए गए हैं। तकरीबन न के बराबर जनता दिखती है। एक भी विदेशी नहीं। कुछ स्‍कूली बच्‍चे मास्‍टरनी के साथ झांकी देखने आए हुए हैं। अधिकतर बच्‍चे मुस्लिम हैं, ऐसा उनके पहनावे और एकाध से नाम पूछने पर पता चलता है। इन्‍हें राज्‍य की समृद्ध विरासत और उसके रखवाले नरेंद्र मोदी के बारे में ज्ञान देने के लिए यहां लाया गया है। अधिकतर कुछ समझ नहीं पा रहे हैं, मास्‍टरनी जहां हांक दे रही है, उधर चले जा रहे हैं।
इन्‍हें वाइब्रेंट गुजरात दिखाने यहां लाया गया है
इस बीच मुख्‍य हॉल में बड़ी सी स्‍क्रीन पर अमिताभ बच्‍चन का विज्ञापन लगातार चल रहा है, '...कुछ दिन तो रहो गुजरात में...।' बहुत समझदारी के साथ इस झाकी में सिर्फ उन्‍हीं जगहों का प्रचार किया गया है जो तटीय इलाके में यानी पाकिस्‍तान की सीमा से सटे हुए बसे हैं। मांडवी तट, धोलावीरा, गिर के जंगल, कोटेश्‍वर, नारायण सरोवर, कच्‍छ का रण आदि। इसके पीछे भी एक राजनीति है जिस पर हम आगे बात करेंगे।


रण महोत्‍सव: असल की बेहूदा नकल
बहरहाल, यहां चारों ओर एलसीडी स्‍क्रीन पर या तो अमिताभ बच्‍चन दिखते हैं या फिर नरेंद्र मोदी। खाने के स्‍टॉल पर बासी आइटम भरे पड़े हैं। एक पवेलियन गुजराती शिल्‍पकारी और एम्‍ब्रॉइडरी का  भी है, जहां कुछ स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं की दुकानें चल रही हैं। एक भी आइटम ऐसा नहीं है जिसे आप खरीद सकें। हमने मेले में तीन अधिकारियों से धोलावीरा जाने का रास्‍ता पूछा। तीनों ने अलग-अलग जवाब दिया, जिससे ये समझ में आया कि यहां के स्‍थानीय लोगों को अपनी धरोहरों की कोई जानकारी नहीं। कुल मिलाकर दिन के वक्‍त रण महोत्‍सव सुपर फ्लाप शो नज़र आया।


यहां से हम गाड़ी लेकर चल दिए 6 किलोमीटर दूर अनंत तक फैले नमक के मैदानों की ओर। करीब एक किलोमीटर पर बीएसएफ की सीमा सुरक्षा चौकी पर हमें रोका गया और सलामी ठोंकी गई। सलामी का कारण ये था कि हमारे मित्र चंद्रमणि की फ्लाइंग मशीन टीशर्टपर एयफोर्स का लोगो बना था जिससे वे हमें वायुसेना का अधिकारी समझ बैठे थे। फिर बताना पड़ा कि हम लोग पत्रकार हैं और महोत्‍सव देखने आए हैं। प्रवेश की अनुमति मिल गई। करीब पांच किलोमीटर दूर बोर्ड लगा था, 'ईको सेंसिटिव ज़ोन'। पहले ही हिदायत मिल गई थी कि यहं बोतल और पैकेट आदि लेकर जाना वर्जित है। सिर्फ एक बिसलेरी की बोतल लेकर हम उतरे और वादा किया कि इसे वहां नहीं फेंकेंगे। गाड़ी से उतरते ही जो देखा तो बस ऐसा लगा कि जैसे ये दुनिया का अंत हो।

धरती पर चांद:  कच्‍छ का महान रण

आप इस जगह को उत्‍तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव, चांद, शुक्र, मुगल, अंतरिक्ष कुछ भी कह सकते हैं और नहीं जानने वाला कभी नहीं जान पाएगा कि आप कहां गए थे। सिर्फ एक ही रंग था... चमकदार सफेद रंग। नीचे, ऊपर, आगे, पीछे सिर्फ और सिर्फ चमकदार सफेद। पैरों के नीचे ठोस सफेद नमक। आंखें खुली रखने की जिम्‍मेदारी अगर आपने निभा ली, तो मरने तक इस जगह से वापस जाना आपको स्‍वीकार नहीं होगा। अमिताभ बच्‍चन के कहे पर मत जाइए, खुद हो आइए। ये है कच्‍छ का महान रण। आपके देश में इतना करीब कोई ऐसी अद्भुत चीज़ हो सकती है, और आप यहां जा सकते हैं इतनी आसानी से, ये बात ही अपने आप में लाजवाब है। कोई कल्‍पना नहीं, कोई गल्‍प नहीं। कुछ देर ठहरिए इस रण में, अगला अध्‍याय खुलेगा जल्‍द।

यहां आंखें खुली रखना ही चुनौती है

कच्‍छ कथा-4: रणछोड़ के देश में 'रणवीर'

कच्‍छ कथा-2: यहां नमक मीठू क्‍यों है?
कच्‍छ कथा-1: थोड़ा मीठा, थोड़ा मीठू



 

1/15/2012

कच्‍छ कथा-2: यहां नमक मीठू क्‍यों है?

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... तो लालजी के घर चाय पीने के बाद हम जान गए कि कच्‍छ में नमक को मीठू कहते हैं। हमारे अहमदाबाद के एक पत्रकार मित्र जिन्‍होंने दो दिन बाद हमें रास्‍ते में ज्‍वाइन किया, बताते हैं कि अहमदाबाद जैसे मेट्रो में भी अगर आप मीठा मांगेंगे तो सामने वाला आपको नमक डाल कर दे देगा। मीठे के लिए आपको शक्‍कर बताना होगा। बहरहाल, ये बड़ी अजीब बात है कि किसी वस्‍तु के गुण के ठीक उलट उसका नाम है। आखिर इसकी वजह क्‍या हो सकती है?
कच्‍छ के रण में नमक का खेत: पानी पर जमी बर्फ की परत को तोड़ता मजदूर

दरअसल, कच्‍छ के रण में, यानी छोटे कच्‍छ और बड़े कच्‍छ दोनों को मिलाकर कुल 80,000 के करीब नमक मज़दूर काम करते हैं। साल्‍ट कमीशन की रिपोर्ट में ये संख्‍या 45000 बताई जाती है, लेकिन इस संख्‍या की सच्‍चाई हमें लालजी के घर पहंच कर ही पता चलती है। लालजी और उनके पिता दोनों नमक बनाते हैं। अगर इस प्रक्रिया में हम लालजी की मां और पत्‍नी समेत बच्‍चों के सक्रिय सहयोग को छोड़  भी दें, तो एक परिवार में बाप और बेटे को मिला कर औसतन दो नमक मजदूर होंगे। चूंकि नमक बनवाने वाली कंपनी का ठेकेदार लालजी के पिता को मदूर के रूप में नहीं गिनता क्‍योंकि उनका अनुबंध बढ़ाया नहीं गया, लिहाजा परिवार में ऑफिशियली एक ही मजदूर हुआ। यानी औसतन हर परिवार में एक आदमी मुफ्त में नमक बना रहा है। ये एक अलग बात है कि दो व्‍यक्तियों के काम करने से नमक बनाने की दर दोगुनी हो जाती है और एक परिवार द्वारा भरे गए बोरों की संख्‍या बढ़ जाती है।
दो खेतों के बीच की मेड़ और उस पर जमा नमक

अब आते हैं कच्‍छ के सेठिया कहे जाने वाले नमक ठेकेदारों की मनमानी पर। खाराघोड़ा में इकलौती सरकारी कंपनी जो नमक बनाती है, उसका नाम है हिंदुस्‍तान साल्‍ट लिमिटेड। लालजी का परिवार पीढि़यों से एचएसएल के लिए काम करता रहा है, लेकिन उसे तनख्‍वाह कंपनी नहीं देती। कच्‍छ के 80,000 मजदूरों यानी एक परिवार में औसतन पांच आदमी मानने पर चार लाख लोगों की किस्‍मत तय करते हैं सेठिया। ये सेठिया नमक कंपनी के ठेकेदार होते हैं। इनमें अधिकतर पाटड़ी और आसपास के इलाकों के रहने वाले हैं और अगड़ी जाति के हैं। सरकारी और निजी कंपनियों के बीच छोटे रण की ज़मीन बंटी हुई है (बड़ा रण ईको सेंसिटिव क्षेत्र है, लिहाजा यहां नमक का कमर्शियल उत्‍पादन तकरीबन नहीं के बराबर होता है)। इसी ज़मीन पर कई-कई किलोमीटर के फासले पर आपको नमक मजदूरों के झोंपड़े दिख जाते हैं। पीढि़यों की बरसात और तूफान झेल कर खड़े इन झोंपड़ों का एक आपसी रिश्‍ता होता है, ठीक वैसे ही जैसे सेठियों के बीच मुनाफे का रिश्‍ता होता है। यही वजह है कि आज तक सेठियों और मजदूरों के बीच ऐसी आपसी समझ कायम है कि मजदूर सरकार को तो गाली देता है, लेकिन सेठिया के खिलाफ एक शब्‍द नहीं बोलता।
सेठिया यानी नमक कंपनी का ठेकेदार मजदूरों को एक बोरा नमक बनाने पर (एक बोरा बराबर 100 किलो) 18 रुपए देता है। एक मजदूर परिवार साल में आठ महीने काम करता है क्‍योंकि मानसून के चार महीनों में रण में पानी भर जाता है और इन्‍हें पलायन करना पड़ता है। आठ महीने में एक मजदूर औसतन 800 किलो नमक पैदा करता है। इसक कीमत हुई 144 रुपए। अब इसमें आप क्रूड ऑयल का दाम जोड़ लीजिए जो ठेकेदार इन्‍हें जेनसेट चलाने के लिए देता है। एक दिन में करीब दस से बारह घंटे पानी पंप करने के लिए जेनसेट चलाना होता है। अधिकांश मजदूर परिवारोंके पास कोई खेती नहीं है, इसलिए खाली के चार महीनों में वे रण के बाहर जाकर नमक के ठेकेदारों के यहां नमक भरने का काम करते हैं। हालांकि लालजी के मुताबिक ये चार महीने बैठकर खाने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते क्‍योंकि काम मांगने वाले ज्‍यादा होते हैं और काम कम।
तीन पीढ़ी पुरानी राजदूत अब भी
यहां की लाइफलाइन है
जो नमक सेठिया इनसे खरीदता है, उसे प्रति बोरा (एक बोरा बराबर 100 किलो) 92 रुपए की दर से कंपनी को बेचता है। मार्जिन हुआ हर सौ किलो पर 74 रुपए। एक मजदूर अगर आठ सौ किलो नमक बनाता है तो प्रति मजदूर मार्जिन हुआ करीब 600 रुपए और 80,000 मजदूरों के हिसाब से कुल मार्जिन पांच करोड़ के आसपास बैठता है। अगर सरकारी आंकड़ा 45000 मजदूरों का भी मानें तो मामला करोड़ों में ही है। तो एक ओर जहां 18 रुपए में पांच लोगों का परिवार चलना है, वहीं इस 18 रुपए से करोड़ों का कारोबार फल रहा है।

अब आइए हमें मिलने वाले नमक पर। हमें जो नमक मिलता है, उसकी औसत कीमत 13 रुपए किलो है। ये नमक कंपनी में प्रोसेस्‍ड होता है, इसमें आयोडीन मिलाई जाती है और पैक कर के बेचा जाता है। माना कि इस नमक से हर सौ किलो पर कंपनी को मिलते हैं 1300 रुपए, तो ठेकेदार की पेमेंट काट कर बचा 1208 रुपया। अगर 1208 रपए सिर्फ नमक को प्रोसेस करने और आयोडीन डालने के बनते हैं, तो सवाल उठता है कि कच्‍छ के करीब एक लाख मजदूर बिना आयोडीन वाला नमक खाकर पीढि़यों से कैसे जिंदा हैं...? और सिर्फ जिंदा भर नहीं, वे संतुष्‍ट भी हैं और नमक को मीठू भी कहते हैं...?
थोड़ी सी ज़मीं, थोडा आसमां: जि़ंदगी का मीठा नमक
दरअसल, सेठिया के करोड़ों और कंपनी के  अरबों के मार्जिन के बावजूद उनके लिए नमक बस नमक ही रह जाता है, जबकि सिर्फ 18 रुपए क्विंटल पर अपना परिवार चलाने वाले लालजी जैसे हजारों परिवारों के लिए नमक मीठू हो जाता है। जि़ंदगी में असली नमक यहीं देखने के मिलता है... न कोई आयोडीन, न पैकेजिंग, ना ही लाग लपेट। सीधा और साफ सफेद नमक... बगैर किसी मार्जिन का। ज़ाहिर है, ऐसे नमक को मीठू नहीं तो और क्‍या कहेंगे, तो अनंत खारेपन के बीच जि़ंदगी में मिठास घोले हुए है... सोचिए, और अगले अध्‍याय का कीजिए इंतज़ार...



1/14/2012

कच्‍छ कथा-1: थोड़ा मीठा, थोड़ा मीठू

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गुजरात की सरकार पिछले कई दिनों से एक विज्ञापन कर रही है जिसमें परदे पर अमिताभ बच्‍चन कहते हैं, ''जिसने कच्‍छ नहीं देखा, उसने कुछ नहीं देखा''। आप अमिताभ बच्‍चन और नरेंद्र मोदी की आलोचना करने को आज़ाद हैं, लेकिन विज्ञापन में वाकई दम है। ये एक अलग बात है कि विज्ञापन देखने के बाद मैंने कच्‍छ यात्रा का मन नहीं बनाया, बल्कि कच्‍छ के रण में घूमने की योजना करीब तीन साल पहले देव बेनेगल की फिल्‍म ''रोड, मूवी'' देखने के कारण बनी।
ऐसा ही दिखता था 'रोड मूवी' में अभय देओल का ट्रक
सात जनवरी की सुबह गुजरात के साबरमती स्‍टेशन पर उतरने के बाद सीधे वहां से निकल पड़ने को मन हो रहा था, हालांकि मुझे करीब पांच घंटे इंतज़ार करना पड़ा। मेरे साले साहब का ऑफिस था एक बजे तक, जिनके साथ बाइक से मुझे सफ़र करना था। करीब डेढ़ बजे हम अहमदाबाद की चौड़ी सड़कों से होते हुए साणंद की ओर निकले, जहां टाटा कंपनी ने नैनो की फैक्‍ट्री लगाई है। मोबाइल के स्‍क्रीन पर गूगल मैप और नोकिया मैप लगातार खुले हुए थे। आगे जाकर रास्‍ता चौड़ा हो गया और कुछ-कुछ हॉलीवुड फिल्‍मों का आभास देती रेल की पटरी सड़क के समानांतर चलने लगी। करीब 35 किलोमीटर हाइवे पर चलने के बाद हमें बाएं जाना था, जहां पहला रिहायशी इलाका था विरमगांव।

घुघरा: बाहर से गुझिया, भीतर से समोसा
यहां की अधिकांश आबादी मुस्लिम है। यहां ठहर कर एक ठेले पर हमने दाबेली और घुघरा का स्‍वाद लिया। दाबेली को आप बर्गर का कच्‍छी संस्‍करण मान सकते हैं। इसका आविष्‍कार कच्‍छ के मांडवी जि़ले में हुआ था, और दिल्‍ली के छोले-कुल्‍चे की तरह ये आज पूरे गुजरात की लाइफलाइन बना हुआ है। ब्रेड पकोड़े, दाबेली, घुघरा और वड़ा पाव सबमें मीठे का स्‍वाद आया, तो हम समझ गए कि कच्‍छ करीब है। हालांकि अब भी नमक बनाने वालों के गांव और रण के इलाके से हम साठ किलोमीटर दूर थे। करीब पैंतालीस मिनट में फुलकी और पाटड़ी होते हुए हम उस गांव के साइन बोर्ड के सामने पहुंचे, जिसकी खोज मैंने तीन दिन पहले ही गूगल पर की थी।
खारा बच गया, घोड़ा भाग गया
अगर कभी आपने कोई इलाका नक्‍शे पर देखा हो, वहां जाने की इच्‍छा की हो और अगले ही पल खुद को वहां पाया हो, तो आप उस सुख का अहसास कर सकेंगे जो मुझे अहमदाबाद से करीब 120 किलोमीटर दूर यहां पहुंच कर मिल रहा था। ये था खाराघोड़ा। नमक बनाने वालों का गांव। करीब दस हज़ार की आबादी है इस जगह की। पहले अहमदाबाद जि़ले में ही आता था, अब सुरेंद्रनगर जि़ले का हिस्‍सा है। गांव में घुसते ही आपको नमक के पहाड़ दीख जाते हैं। छोटे-बड़े पहाड़ और उनमें काम करते मजदूर। स्‍कूल बंद। सड़कों पर सन्‍नाटा। ग्राम पंचायत का दफ्तर भी बंद। तेज़ धूप और राहत भरी हवा के बीच हम नमक से पटे हुए रास्‍ते पर बाइक दौड़ाते रहे। अधिकांश मुस्लिम आबादी वाला एक छोटा सा इलाका पार करने के बाद आगे खुला मैदान था और दूर क्षितिज पर समुंदर दिख रहा था। हमने गति बढ़ा दी।
कच्‍छ के छोटे रण में ऐसे हुआ अंधेरा
शाम हो रही थी, सूरज नीचे ढल रहा था और समुंदर चमकदार होता जा रहा था। बीच-बीच में एकाध ट्रक दिख जाते थे धूल उड़ाते, वरना चारों दिशाएं सुनसान थीं। इसी तरह हम करीब बीस मिनट चलते रहे। रास्‍ता खत्‍म नहीं होता था और समुंदर चमकदार होता जाता। बीच में सोचा कि ढलते सूरज की एकाध तस्‍वीरें उतार ली जाएं। मोटरसाइकिल खड़ी की और अंगड़ाई ली, तो देखा कि अपने पीछे जो आबादी हम छोड़ आए थे, वो ओझल हो चुकी थी। उसकी जगह एक विशाल और चमकदार समुंदर दिख रहा था।

पहले तो कुछ समझ में नहीं आया। फिर लगा कि शायद हम दूर निकल आए हैं। रण की फटी हुई धरती और डराने वाली हवा की आवाज़ के बीच सिर्फ मैं और मेरा साला। चारों ओर के क्षितिज पर चमकदार समुंदर। हमने दिमाग नहीं लगाया। चुपचाप तस्‍वीरें खींचीं, पानी पिया और फिर एक्‍सीलेटर दबा दिया। ये अलग बात है कि समुंदर को लेकर एक आशंका ज़रूर मन में घर कर गई थी,फिर भी इस तर्क में दम था कि अगर यही रण है, यहीं नमक है तो समुंदर भी सामने ही होगा। अगर आधे घंटे बाद एक झोंपड़ा न आया होता तो सच मानिए, गाड़ी का तेल खत्‍म हो जाता समुंदर की आस में।


अनंत तक फैली कच्‍छ की धरती
लालजी का मोबाइल जिसे चार्ज करने
12 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है
झोंपड़े के बाहर एक नौजवान खड़ा था। तर्कबुद्धि ने काम किया। हमने उससे समुंदर की दूरी पूछी। वो मुस्‍कराया। गुजराती में उसने जो कुछ भी कहा, उसका एक ही मतलब समझ में आया कि आगे समुंदर नहीं है। बात आगे बढ़ी, तो एक अर्थ और निकला कि आगे पाकिस्‍तान की सीमा है और बीएसएफ की चौकी है। हिंदी और गुजराती के संघर्ष में तीसरा अर्थ यह निकला कि अगर अब हम लौटे तो रास्‍ता भूल जाएंगे क्‍योंकि रण में सूर्यास्‍त के बाद रास्‍ते गुम हो जाते हैं। चौथा अर्थ हमने खुद निकाल लिया- रात इसी झोंपड़े में बितानी है।
बच्‍चों के साथ लालजी की घरवाली
तो लालजी नाम है नौजवान का, जिसके झोंपड़े में हमें रात बितानी है। वो अपनी पत्‍नी, तीन बच्‍चों और मां-बाप के साथ यहां रहता है। बाप-बेटा दोनों नमक मजदूर हैं। इनके पूर्वज भी नमक बनाते थे। परिवार में सबसे हमारी मुलाकात कराई गई। आतिथ्‍य सत्‍कार किया गया एक काले पेय से, जिससे हम ब्‍लैक टी कहते हैं। पीने पर मामला कुछ नमकीन टाइप लगा। हमने पूछा, इसमें नमक पड़ा है क्‍या। लालजी ने कहा, ''ना, पानी में मीठू है।'' रण के पानी में अगर मीठू है, तो फिर चाय नमकीन कैसे...?  हमने लालजी से पूछा। लालजी के पिता कुछ-कुछ हिंदी बोल लेते हैं। उन्‍होंने ठहाका लगाया और कहा, ''यहां के पानी में मीठू होता है, इसीलिए चाय ऐसा लगता है।''
क्‍या आपको ये जवाब समझ में आया... नहीं? कच्‍छ के छोटे रण में मीठा-मीठू के इस खेल का दर्दनाक सच खुलेगा अगले अध्‍याय में।
कच्‍छ का काला जादू: अंदर मीठू, बाहर नमकीन