पहली तस्वीर बनारस के कैंट विधानसभा क्षेत्र से खड़े समाजवादी जन परिषद के उम्मीदवार अफलातून की है। अफलातून अपने ज़माने में बीएचयू के प्रखर छात्र नेता रहे हैं। अपने समकालीनों के मुकाबले वे सोशल मीडिया पर कहीं ज्यादा सक्रिय रहते हैं। उनके साथ एक समृद्ध विरासत उनके दादा महादेव देसाई की जुड़ी हुई है जो महात्मा गांधी के पीए थे।
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| अफला अफला अफला अफलातून... |
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| टंडनजी की अड़ी पर अफलातून का प्रचार |
बनारस पहुंचने के दूसरे दिन 12 फरवरी की शाम साथी रोहित प्रकाश को मछली खाने का मन हुआ, तो हम लोग बढि़या मछली की खोज में गोदौलिया से बंगाली टोला की ओर निकले। रात के साढ़े नौ बज रहे होंगे। मछली तो नहीं मिली, लेकिन हम जैसे ही सोनारपुरा चौमुहानी पर पहुंचे, देखा कि अफलातून एक बैनर और कविता के दो पोस्टर टांगे एक चौकी पर खड़े हैं और एक माइक हाथ में लिए ज़ोर-ज़ोर से भाषण दे रहे हैं। मैंने स्कूटर रोक दिया। सोचा कुछ सुन लिया जाए। ध्यान से देखा तो मंच पर तीन लोग थे और मंच के नीचे लगी कुर्सियों पर मात्र चार लोग, जिनमें अफलातून जी की पत्नी भी शामिल थीं। बड़ी महत्वपूर्ण बातें कर रहे थे अफलातून, लेकिन बनारस की गलियों का जनजीवन एक बुद्धिजीवी की गुहार से बेखबर अपनी मस्ती में डूबा हुआ था। लोग आ-जा रहे थे लेकिन किसी ने भी पलट कर देखने की ज़हमत नहीं उठाई। ठीक एक किलोमीटर पीछे मदनपुरा में दिग्विजय सिंह आए हुए थे और वहां लोगों का हुज़ूम उमड़ा पड़ा था।
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| समाजवादी कविता से कैसे भरेगा पेट...? |
बनारस के एक सम्मानित पत्रकार हैं सुफल जी, जो आजकल लंबे समय से यूनीवार्ता दिल्ली में हैं। उनके यहां से मेरा बचपन का पारिवारिक संबंध है। वहीं बैठा हुआ था तो अफलातून जी की बात उठी। उनके बड़े भाई गोपाल जी ने उम्मीद जताई कि अफलातून पांच हज़ार वोट तो ले ही आएंगे। नुक्कड़ सभा में अफलातून जी की पत्नी भी भरोसा जताती हैं कि सीपीआई-एमएल ने उन्हें समर्थन दे दिया है। समर्थन? वो भी एमएल का? क्या पिद्दी, क्या पिद्दी का शोरबा? लखनउवा कहावत है जो बनारस में फिट बैठ रही है।
बहरहाल, उधर लखनऊ में तो बुद्धिजीवियों ने एक पूरी पार्टी ही बना डाली है। नाम है नैतिक पार्टी। नैतिक पार्टी के पांच सिद्धांतों पर गौर कीजिए-
- जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, आगे बढ़ना है।
- जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, हक़ से जीना है।
- जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, साथ-साथ जीना है।
- जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, खूब जीना है।
- जि़ंदगी का मतलब केवल जीना नहीं, नैतिकता से जीना है।
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| तलवार और कलम की लड़ाई में ये नामाकूल झाड़ू कहां से आया? |
न्यायाधीश रहते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश पर उन्होंने भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाया था और तमाम न्यायाधीशों के द्वारा माफी मांगने के सुझाव को नकारते हुए अपने बयान पर डटे रहे। ‘चालीस साल’ लिखने पर उन्हें उच्च न्यायालय की यंत्रणा झेलना पड़ी। न्यायालय पर टिप्पणी करने पर अनेक बार मानहानि का मुकदमा लड़ना पड़ा और उच्च न्यायालय द्वारा उनका इस्तीफा मंजूर न करके उन्हें नौकरी से बर्खास्त करके पेंशन आदि बन्द कर दिया गया। जब वह बुरी तरह बीमार थे, अस्पताल में भर्ती थे, नाक में, मुंह में नली लगी हुई थी, तभी उच्च न्यायालय ने लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज कर बर्खास्तगी का आदेश तामील कराया, ताकि वह इस सदमे को झेल न पाएं, लेकिन पांडे जी ने हार नहीं मानी। फिलहाल वह उत्तराखंड सरकार में अपर महाधिवक्ता हैं।
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| नैतिकता है तो नाना भी मांगता... बोले तो नाना पाटेकर... |
नैतिक पार्टी ने लखनऊ पूर्वी 173 से अपना उम्मीदवार प्रो. डॉ. इंद्र सेन सिंह को बनाया है। सिंह साहब हॉर्टिकल्चर वैज्ञानिक हैं। कैलिफोर्निया से पढ़े हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दस पुरस्कार पा चुके हैं। हमने सोचा कि जब तक सिंह साहब के बोलने की बारी आएगी, चल कर सामने बैठ कर कुल्फी खाते हैं, फिर उन्हें सुनने आएंगे। मुश्किल से दस मिनट बाद जब हम बाहर निकले, तो नज़ारा बदला हुआ था। लगा ही नहीं कि दस मिनट पहले वहां जनसभा हो रही थी। सब साफ। चारों ओर सिर्फ़ बाज़ार।
कबीर वाणी याद आने लगी- कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ। आज न कोई घर फूंकने को तैयार है न ही जरा सा भी दाएं या बाएं देखने को। सब अपनी सीधी लकीर में बेखबर चले जा रहे हैं। कबीर रहते तो पागल ही हो जाते ये देख कर। कहीं ये कोई गहरी साजि़श तो नहीं...
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| न दाएं न बाएं, गरदन बिल्कुल सीधी रखने का लोकतांत्रिक अभ्यास |
पांडे जी, सिंह साहब या अफलातून को ये सवाल खुद से पूछना चाहिए कि जिस जनता के लिए वे लड़ रहे हैं, वो उन्हें भाव क्यों नहीं देती। कहीं जनता ही तो गलत नहीं हो गई। अगर ऐसा ही है, तो यही सही। लेकिन लोकतंत्र जब तक काग़ज़ पर भी है, हम कैसे मान लें कि जनता गड़बड़ है। गड़बड़ी कहां है? क्या आप बता सकते हैं?














