5/07/2012

ये डरे हुए लोग हैं, अंत तक कहेंगे आप नकली हैं: रंजीत वर्मा

(प्रियदर्शन जी के जवाब पर रंजीत वर्मा ने टिप्‍पणी भेजी है और मेरे द्वारा उठाए गए क्रोनी जर्नलिज्‍म के सवाल को इस बहस से हटाने की बात कही है। बहस मूल विषय यानी कविता की राजनीति और राजनीतिक कविता पर रहे, इसमें मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है। मैं भी यही चाहता हूं, लेकिन 'क्रोनी जर्नलिज्‍म' के प्रयोग के बाद एक अजीब सा विरोधाभास उभर कर सामने आया है जिसे रखना यहां ज़रूरी है। जिस लेखक के विचार को संपादित किया गया (रंजीत वर्मा) उसने तो अपनी विनम्र उदारता में या कहें विषय पर बने रहने के आग्रह के चलते भास्‍कर के संपादक को बरी कर दिया, लेकिन दिलचस्‍प ये है कि जिससे जुड़ा प्रसंग हटाया गया है (प्रियदर्शन) उसने मुझे भेजे एक निजी मेल में खुद संपादक को जि़म्‍मेदार ठहरा दिया है और अपने जवाब में स्‍वीकार किया है कि यह उनके साथ अन्‍याय है। पाठक खुद तय करेंगे कि 'क्रोनी' संपादन का पलड़ा कैसे ऊपर-नीचे हो रहा है और संपादन के भुक्‍तभोगी द्वारा संपादक को बरी किए जाने व इसका लाभ पाए लेखक द्वारा संपादक को जि़म्‍मेदार ठहराए जाने के पीछे आखिर कौन सी मंशा काम कर रही है।)

रंजीत वर्मा
मेरे आलेख का जवाब देने में प्रियदर्शन जी ने जो मेहनत की है उसका सम्मान करते हुए मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उसका नोटिस लूं और एक मुकम्मल सा जवाब दूं। बात मुद्दे पर हो यानी कि राजनीतिक कविता पर ही हो, इसलिए जरूरी है कि 'क्रोनी जर्नलिज्म' के सवाल को इस बहस से हटा दिया जाए क्योंकि लेख को लेकर भास्कर में जो भी काट-छांट किये गए, मेरा ऐसा मानना है कि वह अखबार की नीति के तहत किये गए होंगे न कि किसी से मित्रता निभाने की वजह से। अगर मित्रता वाली ही बात होती तो विमल झा, प्रियदर्शन के ही नहीं मेरे भी मित्र हैं। किसी भी अखबार का दृष्टिकोण व्यावसायिक होता है और उसे राजनीतिक पार्टी का मुखपत्र समझना भूल है। इसके बावजूद इस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तमाम काट-छांट के बावजूद लेख का जो मूल स्वर था उसे उसकी पूरी मौलिकता के साथ बचाये रखा गया है। इसलिए अखबार के संपादक से मेरी कोई शिकायत भी नहीं है। इस संदर्भ में अभिषेक श्रीवास्तव ने जो भी टिप्पणी अपनी ओर से की है मैं उससे इत्तेफाक नहीं रखता और न ही लेख पर लगाये गए उनके शीर्षक से मैं सहमत हूं क्योंकि वे मुद्दे से भटकाते हैं। उदाहरण के तौर पर प्रियदर्शन के जवाब को ही आप देख सकते हैं। शीर्षक में ही उलझ कर रह गए वे। उन्हें लगा कि मेरा पूरा लेख उन पर केंद्रित है जबकि मैंने भास्कर में छपे उनके लेख से सिर्फ एक उद्धरण भर लेकर यह बताने की कोशिश की थी कि कितने स्तर पर यह विरोध चल रहा है। मेरे लेख के केंद्र में वह प्रवृत्ति है जो हमेशा जनवादी और प्रगतिशील साहित्य के खिलाफ सर उठाती दिखती है। अशोक वाजपेयी को मैं इस प्रवृत्ति के अगुवा के रूप में देखता हूं। प्रियदर्शन को मैं एक छोटे से मोहरे के तौर पर देखता हूं।



मैंने अपने लेख में यह कहीं नहीं लिखा है कि अशोक वाजपेयी और प्रियदर्शन मिलकर कोई साजिश कर रहे हैं। प्रियदर्शन के साथ मिल कर अशोक वाजपेयी आखिर कौन सी साजिश रच लेंगे। उनके पास एक से एक महारथी हैं, उन्हें भला प्रियदर्शन से क्या काम जो साहित्य की दुनिया में कब आते हैं और कब चले जाते हैं किसी को पता भी नहीं चलता। अपने लेख में साजिश वाली बात जो मैंने लिखी है वह यों है- 'यह कह कर कि जो क्लास मुक्तिबोध में है वही अज्ञेय में भी है इसलिए दोनों एक तरह के राजनीतिक कवि हैं एक साजिशपूर्ण अवधारणा है।' यह विचार अकेले अशोक वाजपेयी के लिए मैंने व्‍यक्‍त किए हैं। प्रियदर्शन यहां कहीं से नहीं आते हैं।   



जहां तक मैं समझता हूं मैंने अपने लेख में प्रियदर्शन पर कोई भी व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की है लेकिन उन्होंने शुरूआत ही व्यक्तिगत टिप्पणी से की है और आगे भी कई जगहों पर इसी तरह से टिप्पणी करते चले गए हैं। ऐसा उन्होंने किसी क्षुद्रतावश किया होगा मैं नहीं मानता बल्कि मुझे तो लगता है कि यह सब अनजाने में होता चला गया। नहीं तो भला सोचिये कि जिस आदमी से संक्षिप्त परिचय हो या यों कहिये कि परिचय न के बराबर हो, उस पर भला प्रियदर्शन कैसे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी कर सकते हैं क्योंकि वे खुद इस बात को मानते हैं कि बिना परिचय के किसी को कलावादी भी नहीं कहा जा सकता। यानी कि जो बात लेखन देख कर या विचार जान कर कही जाती है उसके लिए भी वे मानते हैं कि व्यक्तिगत परिचय का होना बहुत जरूरी है। जब स्थिति यह है तो भला क्या इस पर यकीन किया जा सकता है कि मेरे जैसे अपरिचित आदमी पर वे कोई व्यक्तिगत टिप्पणी करेंगे, कभी नहीं। दरअसल देखा जाये तो यह सब अनजाने में उनसे हो गया है। अब वे भी क्या करें जब जीवन को सुखमय बनाने के लिए किसी को रात दिन हजार बार अपने पैंतरे और रास्ते बदलने पड़ते हों तो वैसे लोग इस तरह की समस्याओं से घिर ही जाते हैं। तभी तो आप देखेंगे कि ऐसा सिर्फ व्यक्तिगत छींटाकशी करने के मामले में ही नहीं हुआ है बल्कि उनके पूरे लेख में इस समस्या के चिह्न सर्वत्र देखने को मिलते हैं- वहां पर भी जहां वे अपनी स्थापनाएं रख रहे होते हैं और वहां पर भी जहां वे अपनी सफाई रख रहे होते हैं। सोच समझ कर लिखी गयी पंक्ति और अनजाने में लेख में आ गयी पंक्ति एक दूसरे का पीछा करती आती रहती हैं। पहले वे काफी सोच समझ कर एक पंक्ति लिखते हैं कि तभी दूसरी पंक्ति अनजाने में चली आती है और वह पहले की पंक्ति को काटती निकल जाती है। यह पहली पंक्ति उनकी सोच समझ कर ओढ़ी हुई पंक्ति होती है जिसके बारे में वे मुतमईन होते हैं कि इसे सब पसंद करेंगे, क्योंकि वह हर तरह से आजमायी हुई पंक्ति होती है जबकि दूसरी पंक्ति उनके व्यक्तित्व के गोपनीय अंधेरे से निकल कर आती है जिसे वे मुस्कुराते चेहरे, शालीन व्यवहार और फकीराना अंदाज के पीछे यत्नपूर्वक दफ्न किये होते हैं। यही उनका असली चेहरा है जो उनकी बौद्धिकता के नकाब को फाड़कर निकल आता है। लेख में जो शब्द दर शब्द असली नकली का छाया युद्ध देखने को मिलता है और फिर इस सबसे जो अंतरविरोध पैदा होता है वह बहुत दयनीय है। भला इस तरह के अंतरविरोध से ग्रस्त आदमी कैसे किसी कवि के अंतरद्वंद्व को समझ सकता है जो गुंटर ग्रास की कविता की पहली ही पंक्ति में देखने को मिलता है- 'मैं क्यों खामोश रहा/ क्यों लंबे समय से छिपाता रहा/ उसे जो प्रत्यक्ष है और युद्धों की कवायदों में आजमाया जाता रहा है...' (मंगलेश डबराल का अनुवाद)। यह सिर्फ सवाल नहीं है खुद से बल्कि पश्‍चात्‍ताप भी है यहां और सारे राज एक-एक कर बोल देने की तैयारी भी- 'वह कहा ही जाना चाहिये/ जिसे कल कहने पर मुमकिन है बहुत देर हो जाये।'



गुंटर ग्रास की कविता क्या वो तो मेरा लेख भी नहीं समझ पाये। मैंने उनसे कहीं नहीं पूछा है कि वे क्यों लिखते हैं। अपने लेख में जब मैं यह सवाल कर रहा होता हूं तो यह सवाल हिंदी के तमाम कवियों से होता है, खुद से भी न कि किसी एक से। और किसी एक से पूछूंगा भी तो प्रियदर्शन से क्यों जिनके बारे मैं जानता भी नहीं कि वे कविता भी लिखते हैं। लेकिन वे इस सवाल को अपने पर लेते हुए जवाब देने बैठ गए और पूरे दो पैराग्राफ लिखा। और लिखा क्या जरा इसकी भी बानगी देख लीजिए। वे कहते हैं कि वे इसलिए लिखते हैं ताकि उन्हें पैसे और प्रसिद्धि मिले, हालांकि फिर जैसी कि उनकी नियति है वे विरोधाभास में जाते हुए रो पड़ते हैं कि हिंदी लेखन में आखिर प्रसिद्धि ही कितनी है। यहां पैसे की बात वो अनजाने भी सामने नहीं आने देते, लेकिन 'प्रसिद्धि की कामना का दबाव' के पीछे पैसे की छाया कोई भी चाहे तो देख सकता है। फिर उन्हें अचानक लगता है कि जवाब बहुत व्यावसायिक किस्म का या यों कहिये कि स्वार्थी किस्म का हो गया, तो वे तुरत आगे जोड़ते हैं कि जीवन को तह दर तह समझने के लिए लिखते हैं। लेकिन सोच समझ कर भी वे यह नहीं लिख पाये कि किसका जीवन। यह अभी उन्होंने पता नहीं क्यों गोपनीय रखा है। दरअसल, ऐसे लोगों के पास कई 'हिडन एजेंडा' होता है। हालांकि वे कहेंगे कि इसमें हिडन एजेंडा वाली क्या बात है, लेकिन इनके लिखने का अंदाज देखिये- 'यह लेख सफाई देने के लिए नहीं लिखा है- हालांकि जब लिखा ही है तो अपने आप सफाई चली आती है।'



आगे वे अपनी राजनीति का खुलासा करते हुए कहते हैं कि वे हिंसा के खिलाफ हैं लेकिन वे यह नहीं कहते कि वे राज्य की हिंसा के खिलाफ हैं क्योंकि यही वह हिंसा है जो दूसरी हिंसा को पैदा करती है। वे यह भी नहीं कहते कि विषमता के खिलाफ जो लड़ रहे हैं वो कौन हैं। उन्हें तो यह भी नहीं मालूम कि उनकी लड़ाई में शरीक न होने का उन्हें अफसोस है या यह उनके लिए राहत की बात है। वे खुद ही बहस में कूदे और अंत आते-आते घोषणा करते निकल जाते हैं कि वे खुद को इस बहस से अलग कर रहे हैं।



ध्यान से देखा जाये तो वे यहां बहस करने आये भी नहीं थे। वो सिर्फ इस बात का विरोध प्रकट करने आये थे कि भूल कर भी अंबानी पर हमला मत करो। ऐसा वे इसलिए करने नहीं आये थे कि उन्हें अंबानी से प्रेम है या अंबानी से उनकी कोई जान-पहचान है बल्कि यह उनकी स्वामिभक्ति है। खैर इसमें खराबी ही क्या है। क्यों न करें वो स्वामिभक्ति? किसे नहीं मालूम कि जो लोग कारपोरेट लूट के खिलाफ देशभक्त की तरह खड़े हैं उनके खिलाफ सरकार सेना उतार चुकी है और वही सरकार स्वामिभक्तों के लिए खजाने का मुंह खोली हुई है। आप क्या चाहते हैं कि प्रियदर्शन जाकर सरकारी सेना से टकरा जाएं और वह भी 'जनता की पलटनिया' के भरोसे जो कहीं दिखती नहीं।



ये इतने डरे हुए लोग हैं कि जिसे वे नकली क्रांतिकारिता कहते हैं वह भी उनकी नींद उड़ा देने के लिये काफी है क्योंकि इनके आका को नहीं मालूम कि क्रांतिकारिता भी नकली होती है। भनक मिलते ही फायर कर देगा तुरत नौकरी से। वैसे लुके-छिपे यह दलील देते ये हमेशा देखे जा सकते हैं कि जब असली क्रांतिकारिता का वक्त आयेगा तो वे वहां जरूर खड़े मिलेंगे। लेकिन जबतक यह स्थिति नहीं है वे असली चाटुकारिता करेंगे क्योंकि वे असली जीवन जीते हैं। उन्हें असल से प्यार है। आप भले ही उन्हें उनकी चाटुकारिता या स्वामिभक्ति के लिये उन्हें कोसिये, लेकिन वे अंत तक यही कहेंगे कि वे असली हैं और आप नकली।


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प्रगतिशील और प्रतिगामी के मापदंड को धुंधला करने की साजि़श कर रहे हैं अशोक वाजपेयी और प्रियदर्शन: रंजीत वर्मा




   



     





  


5/06/2012

दिखावटी राजनीति से सावधान: प्रियदर्शन

दैनिक भास्‍कर में रंजीत वर्मा के छपे लेख की मूल प्रति में से प्रियदर्शन के लेख की आलोचना को संपादित किए जाने संबंधी पोस्‍ट पर प्रियदर्शन जी ने अपना पक्ष रखा है। क्रोनी संपादन से लेकर गुंटर ग्रास की कविता और रंजीत जी की आलोचना तक हर चीज़ पर बिंदुवार उन्‍होंने बड़ी सार्थक टिप्‍पणी भेजी है और दिखावटी क्रांतिकारिता से आगाह भी किया है। इस टिप्‍पणी को हम हिंदी के एक लेखक का प्रतिनिधि आत्‍मकथ्‍य मान सकते हैं। जहां तक मेरे द्वारा क्रोनी जर्नलिज्‍म नामक शब्‍द के इस्‍तेमाल की बात है, तो मैंने टिप्‍पणी में पूछा ही था कि क्‍या मैं इसे लिखने की छूट ले सकता हूं। उस वक्‍त मेरे मन में यह बात थी और अब भी है कि यह कुछ ज्‍यादा सख्‍त हो गया था और इसका पार्टीज़न इस्‍तेमाल ही इसे सार्थक बना सकता है, वर्ना हिट विकेट हो जाने का खतरा है। प्रियदर्शन जी को यह शब्‍द बुरा लगा है, ज़ाहिर है क्रोनी के प्रयोग का परिप्रेक्ष्‍य  मिसप्‍लेस्‍ड माना जा सकता है। लेकिन जो मूल बात है, वो अपनी जगह कायम है और प्रियदर्शन जी ने कायदे से उस पर रोशनी डाली है। उन्‍होंने भले आखिर में इस बहस से खुद को अलग कर लिया हो, लेकिन बहस अपनी जगह अब भी बनी हुई है और बात जारी रहे, तो शायद ''वास्‍तविक'' और ''दिखावटी'' क्रांतिकारिता के कई और पहलू सामने आ सकें।


प्रियदर्शन
 हिंदी के लेखक और टिप्पणीकार किस दुस्साहस के साथ दूसरों पर बेधड़क टिप्पणी करते हैं, यह बात काफी हैरान करने वाली है। रंजीत वर्मा से मेरा संक्षिप्त परिचय है और अभिषेक श्रीवास्तव से उतना भी नहीं। लेकिन एक ने मुझे कलावादी ठहरा दिया, दूसरे ने मुझे क्रोनी जर्नलिज़्म का हिस्सा करार दिया। रंजीत वर्मा ने मेरे लिखे हुए में एक साज़िश भी देख ली- वह भी अशोक वाजपेयी के साथ मिलकर की गई साज़िश। प्रसंगवश, फिर बता दूं, कि अशोक वाजपेयी से भी मेरा संवाद उतना ही भर है जितना शायद अभिषेक श्रीवास्तव से-कार्यक्रमों की दुआ-सलाम और एकाध बार की निहायत संक्षिप्त- कुछ सूचनाओं के लेन देन तक सीमित- टेलीफोन पर हुई बातचीत के अलावा कुछ नहीं। सिर्फ अशोक वाजपेयी से ही नहीं, हिंदी के ज़्यादातर लेखकों से मेरे संवाद की स्थिति यही है- बेशक, राजेंद्र यादव इसके अपवाद हैं जिनसे कुछ ज़्यादा संवाद रहा है। शायद यह मेरा स्वभाव है, मेरी सीमा है- आपको अच्छा लगे ठीक, बुरा लगे तो भी ठीक।

मैं क्यों लिखता हूं? इस भयानक विषमता और गरीबीके बीच क्यों लिखता हूं? रंजीत वर्मा ने पूछा भी और जान भी गए कि मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा। लेकिन दरअसल ऐसे सयाने सवाल और सयाने जवाब उन लोगों को चाहिए होते हैं जो ज़रूरत के हिसाब से पाले, पत्रिकाएं, अख़बार और मैत्रियां बदलते हैं, जो अपने लिखने के लिए एक बड़ा सा उद्देश्य बताते हैं और फिर लेखन को बहुत महान सी चीज़ की तरह पेश करते हैं।

मैं शायद पहले भी लिख चुका हूं- मैं बस इसलिए लिखता हूं कि लिखना मुझे अच्छा लगता है। कोई मेरा लिखा पढ़ ले तो और अच्छा लगता है, बाज़ार उसका कुछ मोल दे दे- ना कुछ पारिश्रमिक के तौर पर ही- तो कुछ और अच्छा लगने लगता है, वह किसी के काम आ सके तो शायद सबसे अच्छा लगता है। मैं बहुत लिखता हूं- इसके बहुत सारे बाहरी दबाव भी होते हैं- नौकरी का दबाव, दूसरों के कहे का दबाव, अपने भीतर से उठी किसी प्रतिक्रिया का दबाव, और शायद, इन सबके साथ थोड़ी सी प्रसिद्धि की कामना का भी दबाव- हालांकि हिंदी का लेखक अपने ही समाज में जैसा बेचेहरा प्राणी है और लोगों को जैसे प्रसिद्धि मिलती है, उसे देखते हुए ऐसी कामना हास्यास्पद लगती है, फिर भी एक सदाशयी इच्छा उभरती है कि हिंदी का लेखक सिर्फ अपने लेखन के बूते जाना जाए। दूसरी बात यह कि लेखन का मोल मेरे लिए इन दबावों से ज़्यादा है। लिखना मुझे क्यों अच्छा लगता है?  क्योंकि उससे अपने-आप को, अपने समाज को, अपने समय को बार-बार पहचानने में मुझे मदद मिलती है। लिखना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि लिखते हुए जीवन की तहें मेरे आगे खुलती हैं।

अब अपनी राजनीति पर आ जाऊं। मेरी राजनीति साफ है- वह मेरे लेखन में ज़रूरत के हिसाब से झलकती भी होगी- भले सायास ढंग से, दूर से नज़र आने के लिए पोती हुई, या थोपी हुई न दिखे। मैं इंसाफ़ और बराबरी का हामी हूं और हिंसा के ख़िलाफ़ हूं - जो व्यवस्थाएं किसी भी किस्म की सांप्रदायिक, लैंगिक, आर्थिक गैरबराबरी का, हिंसा का पोषण करती हैं, मैं उनके विरुद्ध हूं। हालांकि यह लिखते-लिखते भी ध्यान आ रहा है कि हम सब ऐसी ही व्यवस्था में जीने के आदी बनाए जा रहे हैं, कुछ कम मनुष्य होकर रहने को अभिशप्त हैं। लेखन निजी स्तर पर मेरे लिए इस प्रक्रिया का प्रतिरोध भी है। इस राजनीति को इसके आगे भी साफ कर सकता हूं लेकिन एक पेशेवर लेखक होने के नाते जानता हूं कि इस विषयांतर से मुझे बचना चाहिए। मैंने बस अपने लिए जो बड़ी लकीर बनाई है, वह आपके सामने रख दी है।

लेकिन लेखक विचारधाराओं के प्रहरी की तरह काम करे, यह बात मुझे कुछ जंचती नहीं। मैं विचारधाराओं के दुर्गों की दरार देखना अपना फर्ज समझता हूं। मैं किलों और परकोटों के भीतर चल रही पाखंडपूर्ण राजनीति का परदा हटाने वाले लेखकों को ज़्यादा ध्यान से पढ़ना चाहता हूं, उन लेखकों को नहीं जो विचारधारा के दुर्गों पर खड्गहस्त पहरा देते हों और ज़रा भी कोई अगल-बगल की दीवार से झांकता दिखे तो उसका सर कलम करने को बेताब रहते हों। दुर्भाग्य से हमारे समय का बहुत सारा लेखन- हिंदी में भी और दूसरी देसी-विदेशी भाषाओं में भी- राजनीतिक विचारधाराओं का चारण लेखन है- रंजीत वर्मा के लेख की ही तरह बहुत सतही और सपाट लेखन है जिसे मैं अपने स्तर पर ख़ारिज करता हूं।

अब गुंटर ग्रास प्रसंग पर आएं। फिर दुहराता हूं कि गुंटर ग्रास की कविता पता नहीं, मूल जर्मन में कैसी होगी, लेकिन अपने अंग्रेजी अनुवाद में बहुत औसत या ख़राब कविता है। इसलिए नहीं कि उसमें सुघड़ पंक्तियां नहीं हैं या उसमें अभिव्यक्ति की बारीक छिलाइयां नहीं हैं- ऐसी सुघड़ पंक्तियां और बारीक छिलाइयों पर जान छिड़कने वाली कविताएं भी ख़राब ही होती हैं- बल्कि इसलिए कि वह इजराइल और ईरान की राजनीति को लेकर कोई ऐसी बात नहीं कहती जिससे हमारा परिचय न हो। ध्यान दें कि गुंटर ग्रास की कविता पर बहस इसलिए नहीं हो रही कि उसने इस वैश्विक राजनीति पर कोई नई बात छेड़ी है, बल्कि कविता पर बहस हो भी नहीं रही है, गुंटर ग्रास की राजनीति पर बहस हो रही है कि एक जर्मन लेखक ने इज़राइल के विरुद्ध और ईरान के समर्थन में ऐसी पोजीशन क्यों ले ली।

लेकिन एक लेखक के तौर पर मैं गुंटर ग्रास के साथ हूं। उसे अपनी बात कहने का हक है और अगर उसकी बात सुनकर दुनिया बेचैन होती है तो यह एक लेखक के तौर पर उसकी सफलता भी है। लेकिन इस राजनीति को अपना काम करने दीजिए, एक पत्रकार और लेखक के तौर पर यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम किसी शोर के साथ बहने की जगह किसी रचना को उसकी गहराई में जांचें। मैं कविताएं खूब पढ़ता हूं- राजनीतिक कविताएं भी, लेकिन वे मुझे तभी अच्छी लगती हैं जब मैं पाता हूं कि वे मुझे कुछ और संवेदनशील बना रही हैं या मेरी समझ में कुछ जोड़ रही हैं। मिसाल के तौर पर इमैनुएल ओर्तिज़ की कविता ‘अ मोमेंट ऑफ साइलेंस’ मैं अपने कई युवा साथियों को पढ़वाता हूं- फिर यह समझते हुए कि अपनी तरह की कुछ सपाटबयानियों के बावजूद वह कविता अन्याय और अत्याचार के एक बड़े संदर्भ को समझने में हमारी मदद करती है।

गुंटर ग्रास- दुर्भाग्य से- अपनी इस कविता में मेरी ऐसी कोई मदद नहीं करते- रंजीत वर्मा की करते हों तो करते हों। मेरे लिए वह एक राजनीतिक बयान है, बेशक ज़रूरी- जो मैं पहले भी लिख चुका हूं- लेकिन सिर्फ इस वजह से कि उस कविता से दुनिया में एक राजनीतिक बहस सी छिड़ी है, मैं कविता की अपनी समझ बदलने को तैयार नहीं हूं। कविता में कला हो या राजनीति- वह सहज और सच्ची होनी चाहिए। दिखावटी कला हो या दिखावटी राजनीति- दोनों एक जैसे बेमानी होते हैं।

इसलिए जब कोई लेखक मुकेश अंबानी, ऐंटीलिया, बढ़ती विषमता और गरीबी का हवाला देकर अपना लेख या अपनी कविता शुरू करता है तो मैं क्रांतिकारिता को बहुत संदेह से देखता हूं- ऐसी सपाट और सरलीकृत आलोचनाएं सबसे आसान काम हैं जिसमें बस इतना भर जोखिम रहता है कि कोई संपादक इन्हें बेकार या वाहियात पंक्तियां मानकर लेख से काट न दे। रंजीत वर्मा के साथ बस इतनी ही दुर्घटना हुई है। यहां मैं ऐसी ‘क्रांतिकारी’ या ‘प्रगतिशील’ मुद्रा वाले उन लेखों और लेखकों की याद नहीं दिलाऊंगा, जिन्होंने जीवन का प्रथम अवसर आते ही उन संस्थानों में नौकरियां चुनीं या लिखने का काम किया जिनकी वे तब या अब आलोचना किया करते थे या करते हैं। मैं यह याद दिलाकर भी वक़्त बरबाद नहीं करूंगा कि जिन राजनीतिक व्यवस्थाओं की विरुदावली गा-गाकर हमारे बहुत सारे कवियों की क्रांतिकारिता जवान हुई, वे अपने चरित्र में कितनी भयावह और अमानवीय साबित हुईं। ख़तरा यही है कि जब आप ऐसा कुछ करते हैं तो अचानक इसके समांतर खड़ी उस दूसरी प्रवृत्ति का समर्थन करने लगते हैं जिसे ठीक से न समझ पाते हुए रंजीत वर्मा कलावाद की श्रेणी में डाल देते हैं और जो अपनी परिणति में उतनी ही ठंडी, बेजान और मनुष्य विरोधी साबित होती है।
दरअसल कहना मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि हम कई तरह की क्षत-विक्षत सच्चाइयों से घिरे एक ऐसे समय में रह रहे हैं जिसमें पक्ष-विपक्ष चुनने से पहले, किसी रचना को श्रेष्ठ या कमतर बताने से पहले, हमें अपनी कसौटियां तय करनी होंगी। निजी तौर पर मैं अपने लिए ऐसी कसौटियां बनाता हूं और तमाम तरह की आवाज़ों और रंगतों वाले कवियों-लेखकों को पढ़ता हूं। जो सराहे जाने लायक लगते हैं, उन्हें सराहता हूं। गुंटर ग्रास नहीं लगे तो इसमें आप साज़िश देख लें।

जहां तक भास्कर के क्रोनी संपादन का सवाल है, शायद अभिषेक श्रीवास्तव का इशारा इस तथ्य की ओर है कि वहां विमल झा मेरे मित्र हैं जो इन दिनों ओपेड देखा करते हैं। विमल झा से बिल्कुल पारिवारिक मैत्री के बावजूद मैं ठीक-ठीक यह नहीं जानता कि वहां वे किस पद पर हैं। भास्कर में- चाहे जिसके दबाव में या चाहे जिस प्राथमिकता के तहत- छपने वाले लेखों का जो स्तर होता है, उससे मैं आम तौर पर हताश रहता हूं और यह हताशा हल्के ढंग से मैंने अपने मित्र के साथ भी साझा की है। रंजीत वर्मा के लेख में जो संपादन उन्होंने किया, उसमें मेरा ज़िक्र उन्होंने किसी मैत्री के तहत काटा, यह बात मेरी समझ में कतई नहीं आती। उल्टे मुझे लगा कि उन्होंने मेरे साथ अन्याय किया।

लेकिन मैं यह स्पष्ट कर दूं कि अगर रंजीत वर्मा ने ऐसे ही शीर्षक से और इसी उलझे हुए अंदाज़ में यह मूल लेख भास्कर को भेजा तो उसका संपादन उचित था। पेशेवर पत्रकारिता की अपनी कसौटियां होती हैं, उन कसौटियों पर यह लेख कतई खरा नहीं उतरता। पता नहीं, रंजीत वर्मा ने यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि मेरे मुताबिक राजनीतिक कविताओं पर किसी भी सूरत में बहस की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत थी, तभी मैंने की- और ग्रास की कविता के संदर्भ में की। मैं नहीं जानता हूं कि रंजीत वर्मा कितनी कविताएं पढ़ते हैं, लेकिन मैं लेखक जैसा भी होऊं, पाठक कायदे का हूं और अपनी स्मृति भर से जितनी राजनीतिक कविताएं उन्हें सुना सकता हूं, उतनी शायद कम लोग सुना पाएं।

दरअसल यह साजिश का मामला भी दिलचस्प है। हिंदी की दुनिया में क्रांति करने निकले लेखक पहले साज़िश खोजते हैं। उनके मुताबिक नागार्जुन और अज्ञेय का नाम एक साथ लिया जाना भी साज़िश है, और सिर्फ इत्तिफाक से लगभग एक ही समय दो अलग-अलग अखबारों में गुंटर ग्रास पर दो टिप्पणियां छप जाना भी साज़िश है। यह खोखलापन रंजीत वर्मा के मूल लेख में इतना प्रत्यक्ष है कि उसे पढ़कर न गुस्सा आता है न अफसोस जागता है- हंसी तक नहीं आती।

यह लेख सफाई देने के लिए नहीं लिखा है- हालांकि जब लिखा ही है तो अपने-आप सफाई चली आती है। वैसे अपनी आलोचना मुझे इतनी नहीं चुभती। यह लेख इसीलिए लिखा कि लिखने की इच्छा हुई। ब्लॉग पर सक्रिय कई युवा लेखकों का- बेशक, उनमें अभिषेक श्रीवास्तव भी हैं- उत्साह मुझे प्रीतिकर लगता है- शायद लेखक होने के नाते यह इच्छा भी होती हो कि गलत न समझा जाऊं। फिर यह भी इच्छा होती है कि इन युवा मित्रों का उत्साह किसी ठोस और सार्थक संवाद में बदले- बस मुट्ठी उछाल मुद्राओं की मिसाल होकर न रह जाए- जिसका ख़तरा अभी दिख रहाहै।

हिंदुस्तान में एक तरफ ऐंटीलिया बन रहा है और दूसरी ओर करोड़ों लोग उजाडे जा रहे हैं, यह करुण सच्चाई बहुत स्पष्ट है। जो व्यवस्था यह अमानुषिक विषमता पैदा करती है, उससे लड़ने की ज़रूरत है और कुछ मुट्ठी भर लोग यह लडाई लड़ भी रहे हैं। मैं नहीं जानता कि मुझे राहत है या अफसोस कि मैं ऐसी लड़ाई में शामिल नहीं हूं। जो लोग शरीक हैं, उन्हें सलाम करता हूं, उनके साथ खड़ा होने की कोशिश करता हूं। लेकिन ऐंटीलिया के बनने को हथियार बनाकर और करोड़ों लोगों के विस्थापन को ढाल बनाकर वार करने वाले लोग दरअसल हिंदी साहित्य और पत्रकारिता की टुच्ची राजनीति भर कर रहे हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। इस टुच्ची राजनीति में दोस्तियों और दुश्मनियों के पुराने हिसाब चुकता करने की चाह ज़्यादा होती है, चीज़ों को बदलने और समझने का सरोकार कम। दुर्भाग्य से, जब वे ऐसा करते हैं तो उन्हें नहीं पता होता कि वे इस भयावह सच्चाई को भी छोटा कर रहे होते हैं और उसके ख़िलाफ़ चल रही लड़ाई को भी।

हिंदी के युवा ब्लॉगरों को ऐसी नकली मुद्राओं से सावधान रहने की ज़रूरत है। यह मेरा पक्ष है- इसे रखकर मैं ख़ुद को इस बहस से अलग कर रहा हूं।

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गुंटर ग्रास पर दैनिक भास्‍कर का क्रोनी जर्नलिज्‍म

5/05/2012

गुंटर ग्रास पर दैनिक भास्‍कर का ''क्रोनी जर्नलिज्‍म''

गुंटर ग्रास की कविता पर जो बहस पिछले दिनों शुरू हुई थी, वह हिंदी अखबारों का हिस्‍सा बन चुकी है। अफसोस केवल इस बात का है कि अखबारों ने अब लेखकों का नाम लेकर उनकी आलोचना करने से भी परहेज़ शुरू कर दिया है। आज दैनिक भास्‍कर में रंजीत वर्मा का लिखा लेख देखें ''कविता की राजनीति और राजनीतिक कविता'', तो यह बात साफ हो जाती है। संपादक ने मूल लेख में से भास्‍कर में ही 21 अप्रैल को छपे प्रियदर्शन के लेख का जि़क्र और उसकी आलोचना को उड़ा दिया है। इतना ही नहीं, अशोक वाजपेयी का भी संदर्भ छूते-छुआते आया है और सबसे जघन्‍य अपराध संपादक ने यह किया है कि पहली ही पंक्ति में मुकेश अम्‍बानी और उनके राजमहल एंटिला का नाम उड़ा दिया है। हिंदी के अखबार में कविता पर लिखे एक लेख को छापते वक्‍त अखबार के कारोबारी हित (मुकेश अम्‍बानी के संदर्भ में) और संपादक की दोस्‍ती-यारी व सुविधा को ध्‍यान में रखा जाना दुनिया की सबसे अनैतिक बात हो सकती है, वो भी तब जब कविता गुंटर ग्रास की हो और बहस वैश्विक।
बहरहाल, नीचे रंजीत जी का मूल लेख चस्‍पां है। आज छपे हुए लेख से मिलान कर के देखिए, समझ में आ जाएगा कैसे रेता गया है इसे। साथ में अशोक वाजपेयी व प्रियदर्शन की टिप्‍पणियां भी लगा रहा हूं जिनकी आलोचना रंजीत जी ने की है।
एक आखिरी सवाल भास्‍कर से ज़रूर पूछा जाना चाहिए कि कहीं उसके संपादक को भी तो अज्ञेयवादी रसरंजन का चस्‍का नहीं लग गया? जनसत्‍ता से तो खैर उम्‍मीद  ही नहीं  थी कि वह राजनीतिक कविता के राजनीतिक मूल्‍य पर बात करे, लेकिन भास्‍कर ने एक राजनीतिक आलेख में दोस्‍ती-यारी वाला संपादन कर के ओछी  मिसाल पेश की है। क्‍या हम इस प्रवृत्ति को अंग्रेज़ी में ''क्रोनी जर्नलिज्‍म'' कहने की छूट ले सकते हैं, बिल्‍कुल क्रोनी कैपिटलिज्‍म की तर्ज पर... ???  


प्रगतिशील और प्रतिगामी के मापदंड को धुंधला करने की साजि़श कर रहे हैं अशोक वाजपेयी और प्रियदर्शन  

रंजीत वर्मा
एक ऐसे समय में जब विषमता की खाई सबसे अधिक चौड़ी होकर समाज को दो भागों में बांट रही हो यानी कि जब एक ओर करोड़ों में एंटिला (मुकेश अंबानी का घर) के बनने और दूसरी ओर करोड़ों लोगों के घर-गांव उजाड़े जाने के बीच के किसी दुर्दांत मोड़ पर यह देश खड़ा हो और ठीक इसी समय में आपके हाथ में कलम हो और आप कविता लिखने का काम करते हों, तो क्या आपने कभी सोचा कि आपके ऊपर यह कैसी जवाबदेही आन पड़ी है? या आप बिना सोचे ही बस लिखे जा रहे हैं? और आप ऐसा सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपको पता है कि बेहतर या कहना चाहिये कि सुघड़ लगने वाली कविता कैसे लिखी जाती है? लेकिन क्या आपने कभी यह भी सोचा कि आखिर आप लिख क्यों रहे हैं और अगर नहीं, तो आप कम से कम यही सोचे होते कि यह जो कविता आप लिख रहे हैं वह आप किसके लिए लिख रहे हैं? क्या किसी को इसकी जरूरत है या यह आपका कोई निजी कारोबार है? बाजार आपकी कविता का तो कहीं है नहीं जो आप कह सकें कि आप रुपये बनाने के लिए यह सब कर रहे हैं। फिर आप क्या कहेंगे? मुझे पता है आप कहेंगे कि और चाहे जो हो लेकिन मैं किसी राजनीति के तहत कविता नहीं लिखता। जाहिर है कि ऐसा कहते वक्त आप राजनीति को दुराग्रह मान कर चल रहे हैं। और यहीं आपकी प्रतिगामी राजनीति की दिशा तय हो जाती है। हालांकि इसे आप राजनीति मानने से गुरेज करते हैं जबकि आपको यह अच्छी तरह पता होता है कि आप किन करोड़ों लोगों के खिलाफ कार्रवाई में उतर चुके हैं। 


अशोक वाजपेयी का 'कभी-कभार'
गुंटर ग्रास की कविता पूरे यूरोप और अरब में खलबली पैदा की हुई है। अरब जहां इस कविता का स्वागत कर रहा है वहीं इजराइल ने न सिर्फ इस कविता पर पाबंदी लगा दी है बल्कि गुंटर ग्रास के इजराइल आने पर भी रोक लगा दी है। हिंदी में इस कविता ने अपने ढंग की बहस खड़ी कर दी है जिसके मूल में वही पुराने सवाल हैं जो अमूमन राजनीतिक कविताओं पर उठाये जाते हैं, जैसे कि कविता में बयानबाजी ज्यादा है, कलापक्ष बेहद कमजोर है, कविता कहीं नज़र नहीं आती वगैरह वगैरह- जैसा कि अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता में अपने कॉलम कभी-कभारमें लिखा है कि इसे कविता मानने में संकोच होता है। गुंटर ग्रास की कविता जो जरूर कहा जाना चाहियेपर इस तरह का घुटा घुटाया आरोप लगाने से पहले उन्हें चाहिये था कि वे पूरी कविता पूरे मनोयोग से तीन-चार बार पढ़ लेते। क्या पता शायद पढ़ा भी हो, लेकिन इसके बावजूद उन्हें बात शायद इसलिए समझ में नहीं आयी हो क्योंकि हो सकता है उन्हें पता न हो कि यह कविता ही है जो समय के पार निकल कर विस्मृतियों तक जाती है और वहां से चीजों को लाकर सामयिक संदर्भों में बदल देती है। अगर वे कविता की जगह इस तकनीक का इस्तेमाल अपना वक्तव्य देने में करते तब भी यही कहा जाता कि यह कविता है। जैसा कि उन्होंने अपनी इस कविता में एक जगह लिखा है कि ’’आसन्न खतरा बरपाने वालों के लिए होगी एक अपील भी’’, लेकिन इसके बावजूद वह जो अपील करते हैं उसे कविता से बाहर नहीं किया जा सकता, वह कविता का एक अभिन्न हिस्सा है। कविता की शुरूआती पंक्तियों में ही जब वे कहते हैं ''अब तक मैं खामोश क्यों रहा'' तो यह किसी वक्तव्य की पंक्ति न होकर तत्काल किसी कविता की पंक्ति हो जाती है।

पूरी दुनिया में राजनीतिक कविता पर हमला करने का यह आजमाया हुआ नुस्खा है जिसका इस्तेमाल हिंदी में भी धड़ल्ले से किया जा रहा है कि उसे कलाविहीन साबित कर दो। लेकिन यह फार्मूला कुछ खास कारगर हुआ नहीं। न राजनीतिक कविताओं का लिखा जाना रुका और न वे असर पैदा करने में कमतर साबित हुईं। उदाहरण के तौर पर गुंटर ग्रास की इसी कविता को देखा जा सकता है जिसने पूरी दूनिया में अपनी तरह की बहस खड़ी कर दी है। इसलिए अब वे अपने पहले के तर्क को थोड़ा बेहतर करते हुए कह रहे हैं कि यह कविता सपाट शैली के कारण ही असर पैदा कर पायी। उनका कहना है कि ''ऐसी सपाट और स्थूल कविताएं ही आज की राजनीतिक व्यवस्थाओं को समझ में आ सकती हैं, वे सूक्ष्म और बारीक अभिव्यक्तियां नहीं जो बेहतर कविता की कसौटी मानी जाती हैं।'' (देखें 21.4.2012 को दैनिक भास्कर में छपा प्रियदर्शन का लेख 'इजरायल की दीवार के आगे ग्रास') यानी कि अब किसी भी स्थिति में राजनीतिक कविताओं पर बहस करने की कोई जरूरत ही नहीं। क्योंकि अगर कविता असर पैदा कर गयी तो जाहिर है कि वह सपाट है तो फिर उस पर बात क्या। और अगर असर पैदा नहीं कर पायी तो वैसी कविता पर बात करने की जरूरत ही क्या!
प्रियदर्शन का भास्‍कर में छपा लेख

हालांकि ये बातें जो हिंदी में आज 2012 में कही जा रही हैं उसका जवाब आज से 18 साल पहले 1994 में ही अमेरिकी कवि फिलिप लेविन ने अपने एक साक्षात्कार में दे दिया था जब प्रश्‍नकर्ता ने उनसे वेलेतो, हर्नान्डिज या नेरुदा की कमजोर राजनीतिक कविता को लेकर सवाल किया था। उन्होंने यह स्वीकार करते हुए कि नेरुदा ने कुछ कमजोर राजनीतिक कविताएं लिखी हैं, अपने जवाब में कहा था कि ''...जब इस आदमी की कविता के विशाल फलक से आप कुछ कमजोर कविताएं ढूंढ लेते हैं और उन्हीं कमजोर कविताओं का बार-बार उदाहरण देते हुए आप यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि देखिये, जब आप राजनीतिक हो जाते हैं तो इस तरह की कमजोर कविताएं लिखते हैं- मैं समझता हूं कि यह पूरा दृष्टिकोण ही गलत है।'' हो सकता है किसी को यह कविता कमजोर लगे लेकिन तब भी न तो प्रियदर्शन की तरह निष्कर्ष पर पहुंचना उचित है और न ही अशोक वाजपेयी की तरह यह नसीहत देना कि उन्होंने इस काम के लिए कविता की विधा का इस्तेमाल क्यों किया, वे वक्‍तव्‍य जारी करते तब भी पूरी दुनिया का ध्यान उधर जाता।

वैसे कहा जाए तो प्रतिक्रियावादियों ने काट के तौर पर एक तीसरा तरीका भी डेवलप कर लिया है जो पहले और दूसरे तरीके के मुकाबले जितना ज्यादा खतरनाक है उससे कम हास्यास्पद नहीं। अपने कॉलम 'कभी-कभार' में अशोक वाजपेयी लिखते हैं, ''यह नहीं कि कविता में राजनीतिक मत या विचार प्रकट नहीं किये जा सकते हैं: स्वयं जर्मनी में बर्टोल्ट ब्रेख्त, भारत में फैज़ अहमद फैज़, मुक्तिबोध, नागार्जुन, अज्ञेय आदि ने ऐसा किया है....।'' इस तीसरे तरीके की बानगी आप यहां देख सकते हैं। अज्ञेय का नाम जिस तरह से उन्होंने प्रगतिशील विचार रखने वाले तमाम मार्क्‍सवादी कवियों के साथ जोड़ते हुए एक सांस में रखा है, वह किसी अवचेतन के तहत बस यूं ही नहीं रख दिया है बल्कि सोची समझी योजना के तहत उन प्रसिद्ध प्रगतिशील कवियों के साथ अशोक वाजपेयी ने अज्ञेय का नाम डाला है। इससे ज्यादा भयानक कोशिश और क्या हो सकती है कि उस मापदंड को ही धुंधला कर दो जो साहित्य को प्रगतिशील और प्रतिगामी धड़ों में बांटता है। राजनीतिक कविता के नाम पर भगवा चिंतन को मार्क्‍सवादी चिंतन के साथ एक कतार में नहीं खड़ा किया जा सकता।

मैं एक बार फिर फिलिप लेविन को उद्धृत करना चाहूंगा। अपने एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ''...यदि आप सचमुच कवि हैं तो यह काम एक राजनीतिक कार्यवाही है। यदि आप व्हाइट हाउस जाना चाहते हैं और लोगों का मनोरंजन करना चाहते हैं, यदि आप कविता के समी डेविड या रोड म्यूकेन हैं, तब भी आप एक खास अर्थ में राजनैतिक कार्यवाही कर रहे हैं, चाटुकारिता की कार्यवाही।'' यानी कि फिलिप लेविन ने भी इस विभेद को जरूरी माना है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि अज्ञेय या उस धारा के किसी भी कवि को मुक्तिबोध, नागार्जुन, फैज़ या ब्रेख्त के साथ रख कर नहीं देखा जा सकता। विचार की दो लाइनें हैं ये। यह कह कर कि जो क्लास मुक्तिबोध में है वही अज्ञेय में भी है इसलिए दोनों एक तरह के राजनीतिक कवि हैं, एक साजिशपूर्ण अवधारणा है। ऐसी अवधारणाओं का तब तक पुरजोर तरीके से खंडन करते रहना चाहिए जब तक वे साहित्य के अंधेरे में जहां-तहां घात लगाये बैठे दिखते हों। आवाजाही के पक्ष में जो लोग हैं, उन्हें भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

और ये रहा रंजीत वर्मा का भास्‍कर में बलात्‍कृत लेख

5/02/2012

मंगलेश! तुम्‍हारी 'चूक' पर मैं हैरान हूं: आनंद स्‍वरूप वर्मा

हमारे प्रिय कवि मंगलेश जी जब भारत नीति प्रतिष्‍ठान के मंच पर राकेश सिन्‍हा के साथ पाए गए और उसकी तस्‍वीर सार्वजनिक होने के बाद जब विवाद पैदा हुआ, तो उन्‍होंने एक स्‍पष्‍टीकरण कुछ लोगों को मेल किया, जिसे ग्‍वालियर वाले अशोक कुमार पांडे ने फेसबुक पर लगाया था। उस स्‍पष्‍टीकरण की प्रतिक्रिया में वरिष्‍ठ पत्रकार और मंगलेश जी के बहुत करीबी आनंद स्‍वरूप वर्मा ने उन्‍हें एक चिट्ठी लिखी है। यह चिट्ठी वर्मा जी ने मंगलेश जी को कल भेजी थी और उनकी सहमति से मुझे भी भेजी। मंगलेश जी ने य‍ही चिट्ठी अशोक कुमार पांडे को भेजी है जिसे वे फेसबुक पर कल लगा चुके हैं। यह चिट्ठी दो कारणों से अहम है। पहली वजह खुद वर्मा जी ने बताई है कि उदय प्रकाश वाले मामले में ओम थानवी ने अपने जनसत्‍ता के अनंतर में उनका नाम लेकर गलतबयानी की है (इसके अलावा भी कई अन्‍य मामलों में उन्‍होंने थानवी जी की बतौर संपादक 'निकृष्‍ट' भूमिका की बात बताई है)। दूसरे, वर्मा जी खुद आवाजाही के हक़ में हैं, लेकिन उनका परिप्रेक्ष्‍य ओम थानवी से बिल्‍कुल अलहदा है। प्रस्‍तुत है वर्मा जी का पूरा पत्र और नीचे मंगलेश की का स्‍पष्‍टीकरण भी, जो उन्‍होंने कुछ लोगों को भेजा था।  


प्रिय मंगलेश,


आनंद स्‍वरूप वर्मा
'भारत नीति प्रतिष्ठाननामक संस्था में समांतर सिनेमा पर तुम्हारे भाग लेने के संदर्भ में कुछ ब्लॉग्स और साइट्स पर टिप्पणियां तथा जनसत्ता में ओम थानवी का लंबा लेख पढ़कर मुझे हैरानी नहीं हुई। हैरानी इस बात पर हुई कि तुम्हें मित्रों को स्पष्टीकरण भेजने की जरूरत क्यों महसूस हुई। जिन टिप्पणियों और लेख का ऊपर मैंने जिक्र किया है उनमें से किसी को पढ़ने से यह नहीं पता चलता है कि उस गोष्ठी में तुमने कौन सी आपत्तिजनक बात कही थी- सारा मुद्दा इस पर केंद्रित है कि उस गोष्ठी में तुम गये क्यों जबकि वह एक दक्षिणपंथी संगठन द्वारा बुलाई गई थी। तुमने इसके जवाब में कहा है कि यह एक चूक थी

मैं नहीं समझता कि यह कोई चूक थी। अगर किसी के दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी/प्रगतिशील होने का मापदंड गोष्ठियों में जाने को ही बना लिया जाय न कि उसके जीवन और कृतित्व को तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैचारिक प्रतिबद्धता का निर्धारण इस तरह के सतही मापदंडों से नहीं होता कि कौन कहां जा रहा है अथवा किससे मिल रहा है। उदय प्रकाश का मामला इससे थोड़ा भिन्न था क्योंकि उन्होंने उस व्यक्ति के हाथों पुरस्कार लिया जो घोर कम्युनिस्ट विरोधी और प्रतिगामी विचारों का घोषित तौर पर पोषक है हालांकि इसे भी मुद्दा बनाने के पक्ष में मैं उस समय नहीं था। जिन दिनों हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, मैंने यही कहा था कि एक बार उदय प्रकाश से पूछना चाहिए कि किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ? कहीं अनजाने में तो उनसे यह चूक नहीं हो गयी? और इसी आधार पर मैंने उस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर भी नहीं किया था हालांकि ओम थानवी ने हस्ताक्षरकर्ताओं में मेरा नाम भी अपने लेख में डाल रखा है। उदय प्रकाश की और अंत में प्रार्थनाशीर्षक कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और उस कहानी का वैचारिक पक्ष इतना प्रबल था कि जब तक उदय प्रकाश किसी जघन्य अपराध में लिप्त नहीं पाये जाते, उनके और उनकी रचनाओं के प्रति मेरे आदर में कोई कमी नहीं आती। यही सोचकर मैंने हस्ताक्षर करने से मना किया था और आज भी मैं अपने उस निर्णय को सही मानता हूं।

तुम्हारे गोष्ठी प्रसंग पर जितनी टिप्पणियां देखने को मिली हैं वे बहुत सतही और व्यक्तिगत विद्वेष की भावना से लिखी गयी हैं। तुम्हें याद होगा जब मैंने नेपाल पर आयोजित एक मीटिंग में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित किया था तो हम लोगों के एक वामपंथी कवि मित्र ने मेरी इसलिए भर्त्सना की थी कि मेरे मंच पर डी.पी. त्रिपाठी कैसे मौजूद थे। उनकी निगाह में वह एक पतित राजनीतिज्ञहैं इसलिए उनको आमंत्रित कर मैंने अपनी पतनशीलता का परिचय दिया। मैंने उन्हें समझाना चाहा कि वह एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव के नाते वहां मौजूद थे लेकिन कवि मित्र इससे संतुष्ट नहीं हुए। बहरहाल मामला इतना ही नहीं है। हम वामपंथियों के अंदर जो संकीर्णता है वह इस हद तक हावी है कि अगर मैं किसी मंच पर (दक्षिणपंथियों की तो बात ही छोड़ दें), सीताराम येचुरी के साथ बैठा देखा जाऊं तो संशोधनवादी घोषित कर दिया जाऊंगा। हमें सांस्कृतिक/सामाजिक संगठनों और राजनीतिक पार्टियों में फर्क करना चाहिए। दो वर्ष पूर्व गाजियाबाद में आयोजित भगत सिंह की यादगार से संबंधित एक गोष्ठी में मंच पर जैसे ही मेरे बगल में डी.पी. यादव आकर बैठे, मैंने वाकआउट कर दिया। लेकिन वह एक कुख्यात माफिया का मामला था। मैं राकेश सिन्हा को नहीं जानता लेकिन अगर वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्थक हैं तो महज इस कारण हम उनके मंच से अपनी बात कहने में गुरेज करें- यह मुझे उचित नहीं लगता। क्या तुम्हें आमंत्रित करते समय राकेश सिन्हा को तुम्हारे विचारों की जानकारी नहीं थी? तुम्हें अच्छी तरह पता है कि वर्षों से रामबहादुर राय जी के साथ मेरे अच्छे संबंध हैं और मैं उनकी पत्रिका में वही लिखता रहा हूं जो मैं चाहता हूं। रामबहादुर राय जब मुझसे मिलते हैं और राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत होती है तो मैं उन्हें आरएसएस समर्थक और वह मुझे कम्युनिस्ट समर्थक समझकर ही बात करते हैं और कई बार अत्यंत शालीनता के साथ हमारी बहसें भी हो जाती हैं। इसलिए हमें कहां जाना है, कब जाना है, किसके साथ बैठना है, किसके साथ नहीं बैठना है- ये सारी बातें विषय और उस समय की घटनाओं से निर्देशित होनी चाहिए। इसके लिए कोई बना बनाया फार्मूला नहीं हो सकता।

जहां तक ओम थानवी का सवाल है, संपादक होने के वावजूद उनके व्यक्तिगत आग्रह/दुराग्रह उनके संपादकीय दायित्व पर हमेशा भारी पड़े। तुम उनके साथ काम कर चुके हो और मैं उनके संपादन में नियमित तौर पर लिख चुका हूं। 1970 से दिल्ली के विभिन्न अखबारों में मैं फ्रीलांसिंग करता रहा हूं और रघुवीर सहाय से लेकर ओम थानवी तक अनेक संपादकों से मेरा साबका पड़ा। मेरा व्यक्तिगत अनुभव यही रहा कि संपादक के रूप में ओम थानवी अत्यंत अनैतिक और निकृष्ट हैं। नेपाल पर जब मैं लिखता था, उन्होंने बिना मुझसे पूछे हर जगह जनयुद्ध शब्द को इनवर्टेड कामा के अंदर कर दिया और जब मैंने एक बार जानना चाहा कि ऐसा वह क्यों करते हैं तो उन्होंने कहा कि जनयुद्ध तो माओवादी मानते हैं, हम तो इसे तथाकथित जनयुद्ध ही कहेंगे। मैंने उन्हें समझाना चाहा कि यह लेख मेरा है, मेरे नाम से छप रहा है इसलिए मेरे ही विचारों को इसमें रहने दीजिए लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ। मैंने इसे मुद्दा न बना कर जनयुद्ध की बजाय सशस्त्र संघर्ष लिखना शुरू किया जो ओम थानवी के लिए ज्यादा आपत्तिजनक हो सकता था लेकिन जिद पूरी होने की सनक से मस्त इस हठधर्मी संपादक का ध्यान इस पर नहीं गया और जनसत्ता से मेरा संबंध बना रहा। लेकिन जब प्रधानमंत्री प्रचंड द्वारा कटवाल को बर्खास्त किये जाने के बाद मेरे लेख में उन्होंने काटछांट करना चाहा क्योंकि वे कटवाल की बर्खास्तगी के पक्ष में नहीं थे, तब मेरा संबंध समाप्त हुआ क्योंकि मैं इसकी इजाज़त नहीं दे सकता था। मैंने तय कर लिया कि अब ओम थानवी के संपादन में नहीं लिखूंगा। ऐसे बीसियों प्रसंग हैं जिनके आधार पर मैं उन्हें निकृष्ट कोटि का संपादक मानता हूं। अभी के लेख में भी उनकी तिलमिलाहट इस बात से है कि वामपंथियों ने उनके आराध्य अज्ञेय पर लगातार प्रहार किये थे। इस लेख के जरिए उन्होंने अपने भरसक वामपंथ को नीचा दिखाकर अपना हिसाब किताब चुकता करने की कोशिश की। इस समय कुछ ब्लॉग्स भी ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि बंदर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया गया हो। बस, थानवी जैसे लेखक और उस्तरापकड़ू बंदरों वाले ब्लॉग्स में एक अच्छी दोस्ती कायम हो गयी है।

तुमने अपने स्पष्टीकरण में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में कुछ घटनाओं का जिक्र किया है जो मुझे अनावश्यक लगा। आशा है तुम इस तरह की आलोचनाओं से आहत हुए बगैर वह करते रहोगे जिसे ठीक समझोगे न कि वह जो दूसरों को खुश रख सके।

तुम्हारा-
आनंद स्वरूप वर्मा


मंगलेश डबराल का व‍ह स्‍पष्‍टीकरण, जिसकी प्रतिक्रिया में उपर्युक्‍त पत्र भेजा गया है:

मंगलेश डबराल
पिछले कुछ दिनों से कुछ फेसबुक ठिकानों पर यह सवाल पूछा जा रहा है कि मैं भारत नीति संस्थान नामक एक ऐसी संस्था में समान्तर सिनेमा पर वक्तव्य देने के लिए क्यों गया, जिनके मानद निदेशक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थक राकेश सिन्हा हैं. मैं स्वीकार करता हूँ कि यह एक चूक थी जो मुझसे असावधानी में हो गयी. समान्तर सिनेमा की एक शोधार्थी सुश्री पूजा खिल्लन को मैंने कभी इस विषय में कुछ सुझाव दिए थे और एक दिन उन्होंने फोन पर मुझसे कहा कि एक कार्यक्रम में उनके पेपर पाठ के दौरान मैं कुछ बोलने के लिए आऊँ. दफ्तर में काम की व्यस्तता के बीच मैंने इंटरनेट पर इस संस्था के बारे में कुछ सूचनाएं देखीं कि यह एक दक्षिणपंथी संस्था है लेकिन उसमें रामशरण जोशी, अभय कुमार दुबे, कमर आगा, ज्ञानेंद्र पाण्डेय, नीलाभ मिश्र, अरविंद केजरीवाल आदि वक्ता के रूप में शामिल हुए हैं. इससे यह भी भ्रम हुआ कि दक्षिणपंथी या हिन्दुत्ववादी विचारधारा की ओर झुकाव के बावजूद यह पेशेवर संस्थान है. मुझे यह भी सूचित किया गया कि संस्थान की भूमिका सिर्फ जगह उपलब्ध कराने तक सीमित है. कुल मिलाकर मैं इस पर ज़्यादा गंभीरता से विचार नहीं कर पाया.

सुश्री खिल्लन का पर्चा और मेरा वक्तव्य, दोनों सेकुलर और प्रगतिशील दृष्टिकोण के ही थे. मैंने अपने वक्तव्य में अन्य कई मुद्दों के साथ फिल्मों में हाशिए के लोगों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के चित्रण के सवाल पर भी बात की जिसमें गर्म हवा, 'नसीम', 'अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' और 'मैसी साहब' आदि की खास तौर पर चर्चा थी. सुश्री खिल्लन के पर्चे में मकबूल फ़िदा हुसैन की फिल्म 'गजगामिनी' के कलात्मक दृश्यों की भी बात की गयी थी. लेकिन गोष्ठी में क्या कहा गया, बहस इस पर नही, बल्कि वहाँ जाने के सवाल पर है जिसका अंतिम जवाब यही है कि यह एक चूक थी.

अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के स्तर पर मेरा रिकार्ड साफ रहा है. मैंने साहित्य अकादमी मिलने पर उत्तराखंड -- तब उत्तरांचल--के मुख्यमंत्री के हाथों प्रेस क्लब देहरादून से सम्मानित होना अस्वीकार किया, फिर भाजपा शासन में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मलेन, न्यूयार्क का निमंत्रण अस्वीकार किया और तीन साल पहले बिहार सरकार का प्रतिष्ठित राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार भी नहीं लिया क्योंकि सरकार में भाजपा थी. प्रायः कुछ न छोड़ने, कुछ न त्यागने के इस युग में ये मेरे कुछ विनम्र "अस्वीकार" थे.

यह भी सच है कि एक मनुष्य का इतिहास उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है और उसके साथ चलता रहता है.

4/27/2012

बूढ़े गिद्ध का नया शिकार: विष्‍णु खरे बनाम व्‍यालोक पाठक

गुंटर ग्रास की कविता पर विष्‍णु खरे के हस्‍तक्षेप के बहाने जो बात-बहस शुरू हुई थी, उसमें निजी चिट्ठियों वाला सिलसिला और पहलू अब भी जारी है, अलबत्‍ता अब यह द्वंद्व युद्ध मेरे और पाणिनी आनंद से होते हुए व्‍यालोक पाठक तक पहुंच गया है। पिछले कुछेक दिनों के दौरान विष्‍णु खरे ने व्‍यालोक को ठीक वैसे ही निजी आक्षेप वाले पत्र भेजे जिसके लिए उन्‍हें हम जानते आए हैं। ''जानते आए हैं'' इसलिए क्‍योंकि धीरे-धीरे उनके पुराने ''पाप'' खुलने लगे हैं। मसलन, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय से पढ़े-लिखे एक युवक के बारे में पिछले हफ्ते जानकारी मिली जिसके लोर्का के एक अनुवाद पर विष्‍णु खरे ने उसे ई-मेल लिख कर डांटा था। नतीजा यह हुआ कि कविता-कहानी-अनुवाद की दुनिया में एक फूल जो खिल रहा था, वह बेवक्‍त मुरझा गया। फिलहाल व्‍यालोक के जवाब और विष्‍णु खरे के असहिष्‍णु बाण जस के तस मैं नीचे चिपकाए दे रहा हूं। पुराने ''पाप'' की गठरी अभी खुलनी बाकी है। मूल विषय पर जितनी बातें आएंगी, उन्‍हें तो जनपथ पर मैं लगाऊंगा ही, लेकिन जब निकली हुई बात  दूर तलक चली जाए तो हरेक रास्‍ते का प्रकाशन ज़रूरी होता है। इसलिए और ज्‍यादा कि यह समझ आ सके कैसे एक आत्‍ममुग्‍ध बूढ़ा गिद्ध (जानने वाले जानते हैं कि यह संबोधन किसका है) चुन-चुन कर अपने नए-नए शिकार खोज रहा है। उसे बिल्‍कुल यह आभास नहीं कि उसकी प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। लिहाजा यह पत्राचार तिथिवार आपके सामने है।   

On Mon, Apr 23, 2012 at 11:05 PM, Vishnu Khare <vishnukhare@gmail.com> wrote: 

अभिषेक श्रीवास्तव शायद कुछ निकटवर्तियों को अपने बल्क-मेल भेजते हैं. जब उन्होंने मेरा प्रत्युत्तर अपने ब्लॉग पर लगाने से इनकार किया तो मैंने उसे एक अटैचमेंट में बदल कर  उन्हीं के एक पत्र की मदद से उन प्राप्तकर्ताओं को भेजने की कोशिश की. लेकिन जैसा कि मुझे शक़ था, वह अटैचमेंट उनमें से किसी के पास नहीं खुला, मेरा "इंट्रो" ज़रूर पढ़ा जा सका. तब अविनाशजी का फोन आया कि वे उसे लगाना चाहेंगे. मैंने कहा कि चूंकि मैं "जनपथ" के "इनर सर्कल" को भेज ही रहा था सो अब वह "पब्लिक डोमेन" में है, आप चाहें तो लगा लें. इसी प्रक्रिया से वह आप तक भी पहुंचा था, यह आप जानते हैं.

ब्लॉग-दुनिया ने हमें कितने बौद्धिक आलस्य से भर दिया है, आपका जुमला "खतो-किताबत का गट्ठर" इसका सुबूत है. उस "गट्ठर" में आधा तो आपके मित्र का ही था. यूं भी कुल-जमा दो हज़ार के आस-पास शब्द होंगे लेकिन आपके युवा सर के लिए यह गट्ठर है. तब आपका कोमल- ध्यान दें मैं पिलपिला नहीं कह रहा हूँ- मस्तिष्क असली, कई हज़ार शब्दों के गट्ठर कैसे उठा पाता होगा? कितनी वेदना होती होगी? "बिहार में सामाजिक कामों से" आप जुड़े हैं- क्या कुर्सीतोड़ आरामतलबी में या एनजीओ सुपरवाइज़री में?

मोहल्ला का मूषक मैं पहले भी कभी नहीं था, अब भी नहीं हूँ- आप लोगों के उस विशेषाधिकार का हनन मुझसे बर्दाश्त  नहीं होगा. इसी सन्दर्भ मैं अविनाशजी को लिख चुका हूँ कि मोहल्ला को लेकर मेरी कुछ आपत्तियां और रिज़र्वेशंस हैं और हम दोनों भविष्य में उन पर बात करने को सहमत हुए हैं.

आप  नाबदान और पीकदान का फर्क़ भूल चुके लगते हैं. नाबदान उस नाली को कहते हैं जिसमें हर तरह का गँदला पानी बहता है. कुछ लोगों के दिमाग और सोच को नाबदान कहा जा सकता है. पीकदान में सिर्फ थूका जाता है लेकिन वह साफ़ होता रहता है. इसीलिए मैंने नेट के अधिकांश हिंदी इस्तेमाल को पीकदानी नहीं, नाबदानी कहा. आप भंडैती को गाली समझते हैं जबकि वह farce या विदूषकत्व का पर्याय है. आप "न जाने किस मुंह से क्या क्या त्याग करने" पर संभ्रांत आपत्ति कर रहे हैं लेकिन भूलते या नहीं जानते हैं कि यह आपके मित्र अभिषेक जी का ही जुमला था- जिसे मोहल्ला के अविनाशजी ने इतना बॉक्स-ऑफिस समझा था कि उसे हैडिंग के योग्य माना- और उन्हें ही साभार लौटा दिया गया है.

आपने जो शेर उद्धृत किया है वह तालाब के एक ऐसे मेंढक का दृष्टिकोण है जिसने समंदर के बारे में कुछ सुना तक नहीं है. समंदर यूं तो चाँद के साथ हर शाम अपने आपे से बाहर होता है लेकिन जब से बना है हजारों बार प्रलय ला चुका है. मिथक में तो उसने कृष्ण के यादव-कुल और द्वारका का नाश किया ही, 2004 में उसने ढाई लाख मानवों की बलि ली, 2011 में तोहोकू में हजारों को फिर ले गया और इण्डोनेशियाई त्सुनामी का आतंक अभी-अभी कम हुआ है. ऐसे शेरों के भरोसे मत रहिए. आप तो जागरूक, कर्मठ सोशल वर्कर हैं- ऐसा न हो कि त्सुनामी फिर आए और आप मलबे और लाशों के बीच इस तरह का मार्मिक, हौसलाअफज़ा कलाम पेश करते हुए घूमते फिरें.

मैंने विषयांतर नहीं किया बल्कि शायद विषय-प्रवर्तन ही किया. असल में हिंदी में कुछ कुंठित, अयोग्य, अपनी उचक्की करतूतों के कारण ही बेरोजगार किन्तु ब्लॉग के ज़रिये काम मिलने तक  येन-केन-प्रकारेण चर्चा में बने रहने को समुत्सुक, नाना प्रकार की चालाक निंदा-स्तुति करते हुए,  ईर्ष्यावश सबसे पहले हिंदी साहित्य पर हमला करने वालों का एक गिरोह सक्रिय है, जिसके सदस्य जब कुछ पा जाते हैं तो तत्काल ब्लॉगबाज़ी छोड़ कर अफसरों, संपादकों या मालिकों के  सामने फुल-टाइम दुम हिलाने लगते हैं और उनकी जगह उन्हीं जैसे नए "स्ट्रगलर्स" ले लेते  हैं. इनमें "बाहर" के भी ऐसे कई संदिग्ध लोग जुड़ जाते हैं जिनकी साहित्यिक महत्वाकांक्षाएँ जितनी विराट हैं, प्रतिभा उतनी ही कम है. साहित्य सिर्फ प्रतिभा, प्रतिबद्धता और सृजन-संघर्ष की बपौती है, किसी और की नहीं, लेकिन यह भयावह है कि आज जिसे देखो वह हिंदी का लेखक बनना चाहता है जबकि हिंदी में न कोई पैसा है, न सामाजिक पहचान. फिर भी साहित्य में कुछ ऐसा है कि उसकी हाशिये की स्थिति का बखान और मखौल करते हुए भी इस तरह के इतने मार तमाम लोग चाहते हैं कि काश, हम एक लेखक के रूप में पहचाने जाएँ. ऐसे हुडुकलुल्लू जब तक कस्बों में रहते हैं तब तक साहित्य, पत्रकारिता और टेलीविज़न के दोन कोर्लेओनियों और आकाओं के जानी दुश्मन की तरह दीखते-लिखते हैं, लेकिन दिल्ली आकर पहली फुर्सत में उन्हीं के जूते चाटते हुए जब कुछ पा लेते हैं तो उनके कारसेवक और मरजीवड़े बन जाते हैं. कई लोग दिल्ली न आकर भी वैसा कर लेते हैं.

मैं फिर कहता हूँ कि राजनीतिक रूप से जितनी प्रतिबद्ध और जुझारू आज की हिंदी कविता है उतनी संसार की और कोई दूसरी नहीं, जबकि पचास-पचास वर्षों से लिख रहे शीर्षस्थ हिंदी कवियों को उनके सारे संग्रहों से रायल्टी या पारिश्रमिक के एक लाख रुपये भी नहीं मिले होंगे. अच्छी अच्छी पत्रिकाएँ कवियों को यदि मुआवजा देती भी हैं तो वह रक़म दोनों के लिए  शर्मनाक होती है. आज आप कहानी और उपन्यास तक लिख कर महीने में दस हज़ार रुपये नहीं कमा सकते. महाभारत में कई चीज़ों पर आश्चर्य प्रकट किया गया है- मेरे लिए आज का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि ग़रीबों,  मजलूमों और कुछ प्रतिबद्धों को छोड़कर जब उसके इर्दगिर्द (इन तीनों पशुओं से क्षमा मांगते हुए) अधिकांशतः कुत्ते, सियार और लकड़बग्घे ही हैं तो हिंदी लेखक लिखता ही क्यों है.

द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद जितने युद्ध और मानवता-विरोधी षड्यंत्र अमेरिका और अमेरिका- प्रेरित-समर्थित देशों ने किए हैं, उन सबके विरुद्ध हिंदी में कम-से-कम एक कविता तो होगी, जबकि स्वयं ग्रास कह रहा है उसके जीवन की यह पहली इस तरह की कविता है. हिंदी में फलस्तीन को लेकर बीसियों कविताएँ हैं. यासर अरफात और महमूद दरवेश के प्रति जितना आदर और स्नेह हिंदी कवियों में रहा है उतना विश्व के किसी अन्य साहित्य में कम-से-कम मेरे देखने में तो नहीं आया.

लेखक कहलाने के योग्य हर साहित्यकार सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द और सही भाषा को केन्द्रीय महत्त्व देता है यह कहना उतना ही घिसा-पिटा है जितना यह कहना कि आज सूर्य पूरब से उगा. और मार्क्सवाद सरीखे चिंतन और उससे प्रेरित लेखन में तो भाषा के महत्व को अतिरंजित किया ही नहीं जा सकता. मार्क्सवादी भाषाशास्त्र नामक चीज़ भी है और संसार के कई आधुनिक भाषाशास्त्री मार्क्सवाद से भी कमोबेश प्रभावित हैं. आप भ्रष्ट भाषा में कुछ भी  प्रतिबद्ध लिख नहीं सकते. सटीक, सुस्पष्ट, तार्किक भाषा के बिना मार्क्सवाद सरीखे वैज्ञानिक विषय पर पक्ष-विपक्ष दोनों में कुछ भी सार्थक बोल, लिख और सोच पाना असंभव है. सच तो यह है कि ऐसी भाषा पत्रकारिता, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, हर तरह के ज्ञान विज्ञान ही नहीं, जीवन के हर पहलू में अनिवार्य है. भाषा के साथ सृजनात्मक, प्रयोगधर्मा आज़ादी निराला, शमशेर, मुक्तिबोध सरीखे विरले महान लेखकों द्वारा ही बरती (देने दी) जा सकती है.

इस सन्दर्भ में आपने जो प्रूफ-रीडिंग और एडिटिंग की क्लास लेने की बात कही है वह हिंदी के आप जैसे लोगों के बौद्धिक उठाईगीरेपन और मतिमंदता को ही दर्शाती है. ये दोनों हुनर, जो हर तरह की पत्रकारिता और लेखन-प्रकाशन के लिए अनिवार्य  हैं, आप और आपके अभिषेक-पाणिनिद्वय सरीखे मित्रों के लिए, तुच्छ और अपमानजनक हैं. पिछले कुछ वर्षों से हिंदी में एक ऐसी पीढ़ी दाखिल हुई है जिसे सही भाषा बोलना, पढ़ना, लिखना नहीं आता और वह उस पर उद्दंड गर्व करती है. आंचलिकता का एक साथ ढोंग और स्यापा करते हुए, हिंदी से ही लाभ उठाते हुए,  उसने हिंदी के हर तरह के भ्रष्ट इस्तेमाल को "अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता" का एक अराजक राजनीतिक नकली मसला बना डाला है. हुडुकलुल्लुओं का एक झुण्ड हिंदी को अधिकतम भ्रष्ट करने पर आमादा है और यदि उसका विरोध किया जाए तो वह हिंदी साम्राज्यवाद की ब्लैकमेल करने लगता है. मैं संसार की किसी भाषा का विरोधी नहीं. किन्तु कुछ भाषाएँ अपना काम कर चुकी हैं और कुछ भाषाएँ अब कई कामों की नहीं रहीं. यह एक तटस्थ, निर्मम, विश्वव्यापी, अनंत प्रक्रिया है. प्रूफ रीडिंग और एडिटिंग को लेकर आपके मन में जो ताच्छिल्य है वह दोमुंही भाषायी चालाकी का लक्षण है. वैसे इससे यह भी पता चलता है कि आप पत्रकारिता में प्रवेश क्यों नहीं पा सके होंगे.

अंत में, जो प्रश्न मैंने आपके जोड़ीदार पाणिनि जी से पूछा था, उसे आपसे भी करता हूँ. हिंदी के तो आप जानी दुश्मन लगते ही हैं, दईमारी संस्कृत ने आपका क्या बिगाड़ा है कि आप भी उसके श्लोकों के साथ बलात्कार करने पर उतारू हैं:

उष्ट्रानां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः
परस्परं प्रशंसन्ति अहोरूपं अहोध्वनिः

किमधिकं? शान्तं पापं.

विष्णु खरे


On Tue, Apr 24, 2012 at 10:50 AM, Vyalok Pathak <vyalok@gmail.com> wrote:

श्रीमन्,

सर्वप्रथम धन्यवाद कि आपने मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति को प्रत्यक्ष संबोधित इतना लंबा मेल लिखने के लिए समय निकाला। दूजा, यह जानकर अच्छा लगा कि आप मोहल्ला के मूषक न कभी थे, न हैं। बहरहाल, मुझे शायद ग़लत पता था कि एक बार के नकार को नकार ही माना जाता है, उस पर इनर और आउटर सर्कल की बहानेबाजी नहीं की जाती। चरित्र शायद कनॉट प्लेस के गलियारों से बढ़कर है न, प्रभो।

गट्ठर का प्रयोग मुहावरा था, सर न कि मेरा बौद्धिक आलस्य। आप भी तो इस बात को मानेंगे न कि आप दोनों के बीच हुए बौद्धिक आदान-प्रदान में प्रलाप अधिक है, मसले की बात कम। मेरे मित्र का केवल एक खत आपसे अधिक है, सर जी और यह कोई वजह नहीं कि आप दोनों के बीच हुए मेल-युद्ध को बहस के गिर्द समझा जाए, इसी वजह से मैने गट्ठर का प्रयोग किया। आपको नागवार लगा, तो क्षमा। हां, आपको अपनी रोजाना पढ़ाई का ब्योरा देना मेरी नैतिक बाध्यता नहीं हैं।  आपने मेरी नौकरी को लेकर जो 'बिलो द बेल्ट' प्रहार किया है, उस पर केवल इतना बता दूं कि फिलहाल बिहार में हूं, इसके पहले छह महीने तक मध्य प्रदेश के मंडला, बिछिया और कई ऐसे गांवों की खाक छान कर आय़ा हूं, जिनका आपने शायद नाम भी न सुना हो। मैं 'बैगा ' जनजाति के साथ काम करता था, और रोज़ाना करीबन 150 किलोमीटर की यात्रा भी। फिलहाल भी मैं कोई कुर्सीतोड़ आरामतलबी नहीं कर रहा, अपने निर्वाह के लिए दस घंटे की एक नौकरी कर रहा हूं।

तीसरी बात यह कि पीकदान रोज़ साफ होता है, तो उसमें खाना तो नहीं खाया जाता न सर। और गुरुदेव, आपके उच्छृंखल भाषा-प्रवाह को सही ठहराने के तर्क भी अद्भुत हैं। अभिषेक ने किया, तो मैं भी करूंगा...बहुत खूब। तो खाक, बड़प्पन दिखाया आपने। हां, लगे हाथों यह भी बता दूं कि नेट पर मैं बहुत कम चक्कर लगाता हूं। मेरा अपना कोई ब्लॉग नहीं, और मोहल्ला पर मैं बस हस्तक्षेप करता हूं, वह भी इसलिए कि आज के दौर में सोशल मीडिया एक जरूरी प्लेटफॉर्म बन गया है। साथ ही, आपने मेरी कूपमंडूकता का हवाला देते हुए समंदर के बारे में जो कुछ भी कहा, उस पर मुझे आश्चर्य होता है। शेर में बरसात का हवाला है, गुरुदेव, जो आप समझ नहीं पाए या नज़रअंदाज़ कर गए। बारिश आने से तो तालाब ही बौराते हैं सर, समंदर पर उससे क्या फर्क पड़ेगा ? जैसे, "छुद्र नदी भरि चली तोराई, जस थोरेहुं धन खल इतराई......"। वैसे भी आप कितनी प्रलय ला रहे हैं, वह तो दर्शनीय है ही।

चौथी बात यह गुरुदेव कि हिंदी के बारे में आपने जो कहा, उससे में पूर्णतया सहमत हूं। इसी वजह से समकालीन साहित्य की ग़लाज़त से दूर भी, और हां कुछ उदाहरण तो मैंन पहले भी गिनाए ही थे। हां, कवियों-लेखकों की प्रतिबद्धता के कुछ उदाहरण देते तो हम जैसे कमअक्लों को बात और समझ में आती। साथ ही, याद दिला दूं कि  मैंने अमेरिका के समर्थन में पट्टियां और झंडे नहीं उठा रखे हैं।

अंतिम बात यह श्रीमन्, कि मैं अगर एडिटिंग और प्रूफ रीडिंग को बेकार का काम समझता, तो अपने जीवन के आट-नौ बहुमूल्य वर्ष इन्हीं कामों को नहीं देता। आप पत्रकारिता में मेरे प्रवेश को लेकर भी ग़लत हैं, सर। मैं आईआईएमसी के 2002-03 बैच के हिंदी पत्रकारिता का छात्र था, माया (जब श्रीकांत त्रिपाठी के संपादकत्व में उसके पुनर्प्रकाशन की कोशिश हुई), द संडे इंडियन, ईटीवी से लेकर दैनिक भास्कर तक अपनी सेवा दे चुका हूं। हां, पत्रकारिता के नाम पर उल्था करने और दूसरों की गंदगी साफ करने से जब ऊब गया, तो फिलहाल सबैटिकल पर हूं। इसमें पत्रकारिता की कक्षाएं लेता हूं, घूमता हूं और मेहनत से रोटी कमाता हूं। यह सब मैं आपको लिखता भी नहीं, लेकिन आपकी हीन-ग्रंथि से झल्लाकर विवश हुआ हूं। आप आखिर क्यों तीन लैपटॉप, नेट कनेक्शन और मार-तमाम चीजों की दुहाई देते हैं और दूसरों के बारे में बिना जाने अयाचित टिप्पणी करते हैं, श्रीमन्।

इत्यलम्।
विनयावनत

व्यालोक

पुनश्चः आपने जो मेरी हिंदी और संस्कृत की दुहाई दी है, उसके लिए धन्यवाद, हालांकि आपने मेरी हिंदी और संस्कृत में कौन सी ग़लती देखी, वह स्पष्ट नहीं। हां, आपने मेरा ज्ञानवर्द्धन जरूर किया है कि 'संदर्भ' के बाद 'में' लगाए बिना भी वाक्य को बढ़ाया जा सकता है ('इसी संदर्भ मैं अविनाशजी'..... वाला आपका वाक्य देखें) और हेडिंग के बदले हैडिंग लिखा जा सकता है। श्लोक में विवाहेषु लिख कर आप कितने ऊंटों का विवाह एक साथ करा रहे हैं, समझ नहीं पाया (देवे-देवयोः-देवेषु, समझेंगे, श्रीमान)। क्या आप नहीं जानते कि विवाह तो विवाह ही होता है, एक का हो या अनेक का, उसमें गीत तो गाए ही जाएंगे। इसी तरह प्रशंसन्ति और प्रशंस्येते, दोनों ही के प्रयोग को आप देखें।  बाक़ी, अंत में अहोरूपं का म और अहोध्वनि का म मिलकर 'अहोरूपमहोध्वनि'  हो गया। हां, इसके ''  के बाद आधे अ का निशान (जो अंग्रेजी के एस की तरह होता है) मुझे नहीं मिल पाया, इसके लिए क्षमा। लट् लकार में प्रयुक्त 'गर्दभा संति गायकाः ' और 'गीतं गायंति गर्दभाः' दोनों ही व्याकरणिक तौर पर अशुद्ध शायद नहीं हैं, हां पाठभेद ज़रूर हो सकता है, और आपका मौलिक सृजन भी। तो, अपने यहां तो क्षेपकों की परंपरा ही रही है। बहरहाल, आपके ध्यानाकर्षण के लिए मैं आभारी हूं।


On Wed, Apr 25, 2012 at 2:43 PM, Vishnu Khare <vishnukhare@gmail.com> wrote:

जब तक कोई व्यक्ति स्वयं को वैसा सिद्ध न कर दे, मैं उसे तुच्छ नहीं मानता. फिर समझाने की कोशिश करता हूँ. जब अभिषेकजी ने मेरा मेल लगाने से इनकार कर दिया तो मैंने उसे उनके उस अन्तरंग  मंडल ("इनर सर्कल") को भेजने की कोशिश की जो उनकी स्थायी सूची पर है ताकि उसे मालूम हो जाय कि अभिषेकजी को उत्तर दिया गया था और वह क्या था. अब यदि उस सूची में अविनाशजी थे तो मैं उनके पते को उससे साफ़ तो नहीं कर सकता था. फिर अविनाशजी ने मुझसे उसे लगाने की बाकायदा अनुमति माँगी और मैंने दी. यदि मुझे मोहल्ला पर आने की हसरत होती तो मैं आपको लिखे गए मेरे पत्र को उन्हें भी सीसी कर चुका होता. विश्वास कीजिये, वे उसे अब तक सहर्ष लगा चुके होते और अब भी भेजूं तो लगा देंगे. मोहल्ला पर जाने की हवस आपको है- आप उसे "सोशल  मीडिया का ज़रूरी प्लेटफ़ॉर्म" समझते हैं. अपनी-अपनी समझ की बात है.

देख रहा हूँ कि बिहार में समाज सेवा करते हुए भी आप कनाट प्लेस को भुला नहीं पा रहे हैं. दिल्ली में चालीस बरस रहा लेकिन औसतन प्रति वर्ष दो बार भी वहाँ जाना नसीब न हुआ. अधिकांश दफा तो मोहन सिंह प्लेस के कॉफ़ी हाउस के लिए, वह भी 1970 के दशक तक ही गया. 2000-2010 के बीच तो कब गया यह भी याद नहीं.

भाई, मैं तो यह कह रहा था कि जब आपको कुछ सौ शब्द गट्ठर लगते हैं तो आपकी कोमल ग्रीवा समाज-सेवा का बोझ कैसे उठाती होगी. नागवार आपको लगा है, मुझे क्यों लगेगा.

आप मेरे बारे में बहुत कम जानते हैं, मैं आपके जानने लायक भी नहीं, किन्तु जब आप मुझे मंडला, बिछुआ और बैगाओं के बारे में चुनौतीपूर्ण ढंग से बताते हैं तो मुझे आपके आत्मपावन   मूर्खतापूर्ण अहंकार पर तरस आता है. मैं मध्य प्रदेश के ठेठ आदिवासी इलाके के जिले छिन्दवाड़ा के मुख्यालय छिन्दवाड़ा में पैदा हुआ हूँ. ज़रा देखिएगा मंडला वहाँ से कितनी दूर है. बिछिया, बिछुआ और गाँवों के ऐसे कई नाम गोंडवाना में बहु-प्रचलित हैं. वह सारा इलाका हमारा है. बीसियों गोंड बचपन से मेरे मित्र और सहपाठी रहे हैं. मेरी पहली शिक्षिका एक गोंड ईसाई थीं. मेरे घर के ठीक पीछे गोंडों का एक बाड़ा था जिसमें लगभग पचास गोंड रहते होंगे. मुझे जीवन में पहली बार मछली एक गोंड परिवार ने दिखाई और खिलाई थी जिसे हमने अपने अधिक मुसीबत के दिनों में एक कमरा किराये पर दिया था. वे हमारे परिवार जैसे थे. इनमें से कुछ संकेत मेरी कविताओं में 1970 से हैं.

आप सन्दर्भ देखना ही नहीं चाहते. जब मोहल्ला पर कुछ जाहिलों ने यह आरोप लगाया कि मैं नेट समझता नहीं हूँ, नेट की दुनिया से ईर्ष्यालु हूँ, नेट पर लोगों को काम करने नहीं देना चाहता, तब मैंने वह सब बताना अनिवार्य समझा. जैसे मेरे गोंडों के साथ उपरोक्त संबंधों के बारे  है. मेरे पास 1997 से कंप्यूटर है उसके बाद भी मुझसे बीसियों इंटरव्यू लिए गए होंगे, मैंने एक बार भी नेट में मेरी गहरी दिलचस्पी और गतिविधि का ज़िक्र नहीं किया, मेरा कोई फोटो डेस्कटॉप या लैपटॉप के साथ नहीं छपा. मैं यह मान कर चलता हूँ कि आज का कोई भी बुद्धिजीवी, जो अफोर्ड कर सकता है, एक डेस्कटॉप तो रखता ही होगा या साइबर-कैफे जाता होगा. लेकिन हिंदी के कुछ अहंकारी युवा मूर्ख समझते हैं कि उन्होंने ही कंप्यूटर ईजाद किया है. उन्हें रिअलिटी चेक देना ज़रूरी था. वे पलटकर बिलबिलाने लगते हैं. अब इसका तो कोई इलाज़ ही नहीं है.

आप लिखते हैं कि प्रतिबद्धता के कुछ उदाहरण तो देते. जब कुछ सौ शब्दों में आपकी कमर टूट गयी तो उदाहरण देने में उसकी कितनी दुर्दशा होगी. लेकिन यह मामला और गंभीर है. ब्लॉग पर मुफ्तिया जानकारी पा लेने वाले लोगों ने स्वयं को बौद्धिक जूँ, चीलर और खटमल जैसा parasite  बना डाला है. मैं पत्रों में बीसियों कवियों के नाम दे चुका हूँ. आप उन्हें पढ़ते क्यों नहीं हैं? आप पत्रिकाओं को क्यों नहीं देखते? मैं ब्लॉग पर यह निर्लज्जता और अज्ञान देख कर दंग होता  हूँ कि मुक्तिबोध, धूमिल या आलोक धन्वा जैसों  की पुरानी कविताएँ लगाने के बाद भी लोग लिखते हैं कि अरे, ये लोग कहाँ थे, इनकी और रचनाएँ (हराम में) पढवाइए.

आप इतना नहीं देख पा रहे हैं कि "सन्दर्भ में मैं" में दुहराव के कारण 'में' टाइप होने से रह गया और बाद में भी मेरी निगाह में नहीं आ पाया. अब आपने ही आठ को आट टाइप कर दिया तो क्या वह कोई गलती है जिसे लेकर बैठ जाऊं? या जहां आप सोशल वर्क कर रहे हैं वहां आठ को आट बोलते-लिखते हैं?

शेर की व्याख्या को लेकर आपसे बहस व्यर्थ है. आपने बारिश में समंदर को देखा नहीं है. समंदर मानव-निर्मित और उतना सीमित नहीं है. फिर भी वह रोज़ अपनी सीमाएं तोड़ता है  वर्ना हर तटवर्ती इलाके में पुश्ते क्यों बनाए जाते? सागर पर शायद भूमि से ज्यादा बारिश होती होगी और लगातार उसके परिणामों पर खोज हो रही है. शायरी या कविता को बहुत ज्यादा विज्ञान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए लेकिन साहित्य प्रमाणित या सत्यापनीय तथ्यों से खिलवाड़ नहीं कर सकता, वाहवाही के लिए भी नहीं.

हैडिंग का सवाल आपने अच्छा उठाया है. अंग्रेजी के इस तरह के शब्दों को नागरी में अक्सर लोग '' की मात्रा से लिखते हैं.लेकिन '' पर '' की मात्रा लगाइए और सिर्फ 'हे' पढ़िए और फिर heading . क्या हम head  को 'मेड' ( made ) की तरह पढ़ते हैं? यदि आप दोनों के उच्चारण सही कर रहे हैं तो आप पाएँगे कि 'हेडिंग' लिखना ठीक नहीं है. अंग्रेजी की यह स्वर-ध्वनि 'हे' और 'है' के बीच की है और १९२०-३० की हिंदी पुस्तकों में इसके लिए हे में ए की मात्रा के ठीक साथ चंद्राकार कम्पोज़ किया जाता था. आप देख कर बताइए कि कामिल बुल्के made  को मेड क्यों लिखते हैं और आपके हेड को हे´ड क्यों? मुझे तो नैट को भी नेट लिखने से नफरत है. खैर, अब तो 'हंस' उड़ गया और 'हंस' कर बोलो को एक जैसा लिखा और कम्पोज़ किया जाने लगा है. आप हेडिंग ही लिखें लेकिन साथ में कम-से-कम  आइ.आइ.एम. तो लिखें. हिंदी में ९० प्रतिशत लोग किस बेवकूफी में अंग्रेजी अक्षर आइ को आई लिखते हैं यह समझ के बाहर है.

मैंने कब लिखा कि पीकदान में खाना खाइए? मैं तो आपको नाबदान में ही खाने से रोक भी नहीं रहा हूँ.

आप किसी असली संस्कृत पंडित से पूछ लें, फिर आपके श्लोक पर बात करें.

श्रीकांत त्रिपाठी जी से मेरा थोड़ा परिचय है. कभी भेंट हो तो मेरी याद दिलाइएगा.

विष्णु खरे


On Thu, Apr 26, 2012 at 9:48 AM, Vyalok Pathak <vyalok@gmail.com> wrote:


श्रीमन्,

मुझे तुच्छ न समझने के लिए आपका धन्यवाद। आपका मेल मिला, मुझे बहुत लंबा-चौड़ा जवाब देने लायक नहीं लगता, बस कुछ बिंदुवार बातें बताता हूं।

1. आप सचमुच वाक्यों को नहीं पढ़ते, या फिर अपने हिसाब से उनका अर्थ निकालते हैं। मैंने सोशल मीडिया को एक ज़रूरी प्लेटफ़ॉर्म बताया था, न कि मोहल्लालाइव को। मुझे छपास की हवस नहीं सरजी, और इसके लिए मुझे आपसे या किसी से सनद नहीं चाहिए।

2. कनॉट प्लेस अगर आप दस वर्षों में नहीं गए हैं, तो आपको जाना चाहिए। खूबसूरत जगह है। रहा सवाल, आपको जानने का, तो थोड़ी-बहुत जानकारी मैं भी रखता हूं। मैंने अपने बारे में बताया था, न कि आपके बारे में अज्ञानी था। आपकी यह अद्भुत अदा है। मैंने तो आपके द्वारा मुझ पर लगाए कोमलता के आरोप का जवाब दिया था, बस। और हां, गोंडों की समाजार्थिक स्थिति वही है, जो राजस्थान में मीणाओं और बिहार में कुर्मियों की। तो, बैगा और गोंड का अंतर, उनके गांवों की स्थिति और पूरा वातावरण आपको बताने की जरूरत नहीं गुरुदेव।

3. आप कब तक मुक्तिबोध, धूमिल वगैरह की दुहाई देंगे, मुझे नहीं पता। इसका आदर्श जवाब तो यही है कि मैं निराला और प्रसाद की बात करने लगूं। बात आज की यानी 2012 की हो रही थी।

4. मैं बिल्कुल जानता था कि संदर्भ के साथ 'में' क्यों नहीं लगा है? मानवीय ग़लतियां होती ही रहती हैं श्रीमन्, लेकिन वह आप भी तो मानें। आपने तो सीधे मुझे हिंदी और संस्कृत का जनाजा उठाने वाला करार दिया। संपूर्ण कोई नहीं होता, और वही बताने की चेष्टा मैंने आपको की। अच्छा लगा कि एक ही उदाहरण में आप मान गए। हेडिंग का मसला भी मेरे लिए हेडेक नहीं है। आख़िर भाषा तो बहता नीर है, बशर्ते उसका रुख़ ही न मोड़ दिया जाए। पाठभेद होते ही हैं। आखिर, आप भी तो लगातार 'फुलस्टॉप' लगा रहे हैं, जबकि मैं 'पूर्णविराम ' का प्रयोग कर रहा हूं। संस्कृत के श्लोक के संदर्भ में मैंने तो आप ही को विद्वान मानकर कुछ जिज्ञासाएं की थीं। आप लगता है, आंतरिक तौर पर उससे सहमत भी हैं (या जवाब तलाश रहे हैं), वरना जूं, चीलर, बौद्धिक उठाईगीरे, परजीवी और पता नहीं क्या-क्या विशेषणों से विभूषित करनेवाली आपकी लेखनी इस मसले पर इतनी चुप रहे, यह आश्चर्य का विषय है।

5. श्रीकांत जी से अगर मैं मिला तो जरूर आपका उल्लेख करूंगा।

विनयावनत,
व्यालोक

इस प्रसंग से जुड़ी और सामग्री नीचे देखें:

... बाहर कभी आपे से समंदर नहीं होता
बिसनू, कौन कुमति तोहे लागी
मूर्खों सावधान, मैं सिंह हूं जो तुम्‍हें आहार बना सकता हूं
जाहिल इज़रायल विरोधियों को नहीं दिखता ईरान का फासीवाद
गुंटर ग्रास की विवादित कविता हिंदी में: 'जो कहा जाना चाहिए'