5/28/2012

यह हिंदी की छिछली दुनिया है, छोड़ो, कुछ बेहतर करें: ओम थानवी


28 मई, दोपहर 2 बजकर 41 मिनट पर ओम थानवी का प्राप्‍त पत्र


बंधुवर, लिंक भेजने के लिए धन्यवाद.

मैंने केवल कटघरे का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि कटघरे की बात वहीँ थी. बाकी आपकी किसी बात का जवाब मैं क्यों दूँ? उसमें झोल ही झोल है. नामवर की क़तरब्योंत भी आप मेरे विरोध के लिए जायज ठहरा रहे हैं, जबकि वह सरेआम बेईमानी थी क्योंकि मेरी किताब को नामवर जी "एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि" कहें, यह मंगलेश जी को बर्दाश्त हो नहीं सकता. इसीलिए पंक्ति उड़ा दी. वरना एक अदद पंक्ति -- सही हो चाहे गलत -- नामवर सिंह की राय थी जिसे संपादक सेंसर क्यों करेगा? यह हिंदी की छिछली दुनिया है मित्र.

आप कहते हैं कनक दीक्षित हिंदूवादी हैं!  मैंने कभी उनका यह रूप न देखा न सुना. नेपाल से वे प्रसिद्ध पत्रिका "हिमाल'" का संपादन करते हैं. उन्होंने ही चे गेवारा पर मेरे लम्बे लेख को अंग्रेज़ी में अनुवाद करवा कर चे की तस्वीरों के साथ "हिमाल" में प्रकाशित किया था.  उनके भाई कुंदा दीक्षित नेपाली टाइम्स नामक साप्ताहिक के संपादक हैं. दोनों नेपाल की जानी-मानी हस्तियाँ हैं. हाँ, आनंदस्वरूप वर्मा इनसे घृणा करते हैं, पर इसके कारण मैं जानता हूँ.

नेपाल के आलावा कनक और मैं  पाकिस्तान, इटली, बेल्जियम, तुर्की आदि अनेक देशों में पत्रकारिता और  दक्षिण एशिया के हालात पर बात करने के लिए साथ भी हुए हैं. वे व्यंग्य में जब-तब खुद ज़रूर कहते थे कि नेपाल में तो हमें "कुलीन परिवार" कहकर खारिज करने वाले भी हैं. पर, मुझे याद है और यह वहां इतिहास है, नेपाल की राजशाही के खिलाफ सड़क पर सबसे पहले पत्रकारों में कनक ही उतरे थे. दिल्ली में भी सड़क पर बैठे कनक को पुलिस द्वारा उठाये जाने की तस्वीरें छपीं थीं. ओछे वामपंथियों में हर विरोधी को हिंदूवादी करार दिए जाने का फैशन चल पड़ा है. इस से तो जो वामपंथ के करीब है, धीरे-धीरे दूर हट जाएगा. अगर कनक दक्षिणपंथी हैं भी तो मुझे इससे फर्क भी नहीं पड़ेगा. मैं तो शुरू से इस आवाजाही की ही तरफदारी कर रहा हूँ... वैसे  उनकी और मेरी निकटता का एक और बड़ा कारण हमारी सिनेमा रुचि है. वे तो काठमांडू में नियमित रूप से एक फिल्म समारोह भी आयोजित करते हैं.  

पर इस तरह तो मैं आपकी हर बात का जवाब देता जाऊँगा. उसमें फिर आप पेंच निकालेंगे. फिर जवाब. छोड़ो यार, कुछ बेहतर काम करें.

आपका,

ओम थानवी



पूरी बहस को फॉलो करने के लिए नीचे के लिंक देखें:

सुबह के दो पत्र

अनन्‍तर पर प्रतिक्रिया

अनन्‍तर, 27 मई, 2012



मुझे नए कठघरों से परहेज़ नहीं: ओम थानवी

27 मई के जनसत्‍ता में छपे 'अनन्‍तर' की प्रतिक्रिया में मेरी लिखी टिप्‍पणी पर आज सुबह अखबार के संपादक ओम थानवी ने दो पत्र भेजे। दरअसल हुआ ये कि रात में ओम जी ने एक मेल किया जिसमें आशुतोष भारद्वाज वाले लेख पर जनसत्‍ता से साभार लिखने को उन्‍होंने कहा, हालांकि स्रोत का उल्‍लेख मेरी टिप्‍पणी में था। इसी क्रम में मैंने रात में जब यह बदलाव किया और उनसे इसकी पुष्टि की, तो उन्‍हें लगे हाथ सूचित भी कर दिया कि 'अनन्‍तर' पर अपनी प्रतिक्रिया मैंने लिख दी है, उसे पढ़ लें। सुबह एक बार फिर मैंने जब लिंक सर्कुलेट किया, तो ओम जी को दोबारा भेज दिया। इसलिए उनके दो पत्र।


ओम थानवी

28 मई, सुबह 9:59 बजे


प्रिय अभिषेक जी,

अच्छा किया जो आपने सूचित किया. अभी पढ़ा. आपकी भाषा में प्रवाह रवां है, यह देख कर अच्छा लगा. हालांकि जानता हूँ कि आपने इसके लिए सूचना नहीं दी है.

आवाजाही प्रकरण हमारे तईं बहुत हुआ. ज़्यादा कहूँगा तो उनकी कलई ज़्यादा खुलेगी, जिन्हें आप देवता मान बैठे हैं.

हाँ, आपने अंत में लिखा है: "चाहें तो ओम थानवी इसे छापने का श्रेय ले सकते हैं और हम उन्‍हें धन्‍यवाद भी देंगे इतना सच्‍चा लेख छापने के लिए, लेकिन हम क्‍यों भूल जाएं कि आशुतोष उनके स्‍टाफर हैं। क्‍या कोई बाहर का व्‍यक्ति लिख कर भेजता तब भी वे ऐसे ही छापते? यह सवाल काल्‍पनिक है, लेकिन मौजूं है। कीचड़ भी अपना, कमल भी अपना। यही है ओम थानवी का लोकतांत्रिक सपना। अनन्‍तर का लोकतंतर ऐसा ही हो सकता है।"

प्रसंगवश, आशुतोष जनसत्ता के स्टाफर नहीं हैं. इंडियन एक्सप्रेस के हैं. एक रिपोर्टर के नाते वे एक्सप्रेस के संपादक के प्रति जवाबदेह हैं, ख़बरें एक्सप्रेस के लिए ही लिखते हैं. सहयोगी प्रकाशन होने के नाते हम चाहें तो एक्सप्रेस की कोई भी सामग्री ले सकते हैं. ख़बरें जब-तब लेते भी हैं. लेख नहीं लेते. न रविवार आदि के फीचर. यह लेख आशुतोष जी ने जनसत्ता के लिए ही लिखा था, स्वतंत्र लेखक के नाते. उन्होंने अपनी मरजी से भेजा, हमने अपनी मरजी से छापा. इंडियन एक्सप्रेस प्रकाशन समूह में एक्सप्रेस, जनसत्ता के अलावा फिनेंशिअल एक्सप्रेस, लोकसत्ता, स्क्रीन जैसे अन्य पत्र भी हैं. उनके स्टाफर हमारे लिए नहीं उन अख़बारों के लिए लिखते हैं जिनके स्टाफर वे हैं. आशुतोष की तरह वे लेख या फीचर या स्तम्भ तक जनसत्ता में लिख सकते हैं, लेकिन हम उनका लिखा छापने के लिए बाध्य नहीं हैं, उन पर एक स्वतंत्र लेखक की तरह ही विचार होगा. यह एक्सप्रेस समूह का आतंरिक लोकतंत्र है. सोचा कम से कम इस तथ्य की जानकारी आपको दे दूँ.   

आपका,
ओम थानवी



28 मई, सुबह 10:55 बजे


प्रिय अभिषेक जी,

आपकी टिप्पणी आपके पहले सन्देश पर ही मैं पढ़ चुका था. आपने फिर उसका लिंक भेजा है. मैंने पहले भी लिखा कि यह प्रकरण हमारे लिए बहुत हो चुका.

टिप्पणी में अपना लिंक देकर आपने लिखा है : ''यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है।"

मुझे नए कटघरों से परहेज नहीं, पर ज़रा तथ्यों को ज़रूर देख लें. वर्मा जी का "पत्र" और उसके नीचे मंगलेश जी का स्पष्टीकरण आपने (और आप से मोहल्ला लाइव में)  २ मई को शाया हुआ. मेरा स्तम्भ २९ मई को छप चुका था (२० को नहीं, इस तरह डेढ़ महीने को एक महीना कर लें!), तो यह नया कटघरा किस आधार पर?

आपके लिंक पर २ मई की तारीख अब भी पड़ी है. मंगलेश जी का कहना है मैंने उनका यह स्पष्टीकरण अपने स्तम्भ (२९ अप्रेल) में क्यों नहीं छापा. आप ही बताएं, आपके २ मई  के लिंक से (जिसमें अनंतर का ज़िक्र तक है) इसे जनसत्ता में २९ अप्रेल को कैसे छापा जा सकता था?

आपका,
ओम थानवी


दूसरे पत्र में ओम जी ने जो तारीखों वाली बात कही है, वह सही है। मुझसे तारीखों को लेकर गफ़लत हुई, इसे मैं मान रहा हूं। लेकिन ओम जी ने सबसे छोटे कठघरे का जि़क्र ही क्‍यों किया जबकि इससे कहीं बड़े कठघरे मौजूद हैं? तारीखों से जुड़ी एक गफ़लत के बावजूद आपत्तियां अपनी जगह अब भी कायम हैं - अभिषेक श्रीवास्‍तव


संबंधित पिछले आलेख: 

अनंतर का लोकतंतर ऐसा ही होता है

ताकि गर्द कुछ हटे  

अनंतर का लोकतंतर ऐसा ही होता है

अभिषेक श्रीवास्‍तव

जनसत्‍ता में 20 अप्रैल को संपादक ओम थानवी ने अपने स्‍तम्‍भ 'अनन्‍तर' में जब 'आवाजाही के हक में' आधा पन्‍ना रंगा था, उसी दिन इस लपकी गई बहस के मंतव्‍य से 'कुछ गर्द हट' गई थी। 14 अप्रैल को मंगलेश डबराल का इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के मंच पर जाना, 16 अप्रैल से मेरे और विष्‍णु खरे के बीच शुरू हुई मेला-मेली, 20 अप्रैल को बहस का जनसत्‍ता में शिफ्ट हो जाना और 27 मई को 'अनन्‍तर' से ही बहस का पटाक्षेप- पूरे डेढ़ महीने की इस कवायद में आखिर हिंदी के बड़े लेखकों, एक हिंदी अखबार के संपादक और खुद इस बहस में शामिल स्‍टेकहोल्‍डर्स ने वास्‍तव में किया क्‍या? आइए, ज़रा फ्लैशबैक में चलते हैं।

ताकि गर्द कुछ हटे: ओम थानवी

होना था क्‍या  

मंगलेश डबराल द्वारा राकेश सिन्‍हा के मंच की अध्‍यक्षता एक राजनीतिक मसला था, ठीक वैसे ही जैसे उदय प्रकाश का पुरस्‍कार प्रकरण। एक सेलीब्रेटेड लेखक के सार्वजनिक आचरण पर जो आपत्तियां उठी थीं, वे दरअसल साहित्‍य और राजनीति के अंतर्सम्‍बंधों पर बहस को जन्‍म दे रही थीं। विष्‍णु खरे के जो मेल आए और उसके बाद गुंटर ग्रास की विवादित कविता पर तमाम जगहों पर जो बात फैली, उसके केंद्र में भी एक सेलीब्रेटेड लेखक की राजनीति और साहित्‍य के बीच विरोधाभास/एकता पर ही बहस को होना था।

क्‍या हो गया

आज जब 'जनसत्‍ता' ने इस प्रकरण को अपने तईं निपटा दिया, तो ज़रा देखिए कि पांच हफ्ते में मोटे तौर पर क्‍या-क्‍या हुआ:

- मंगलेश डबराल ने अपने आचरण को 'चूक' बताया।

- विष्‍णु खरे ने जनसत्‍ता (पढ़ें पत्रकारिता) को ओम थानवी के योगदान पर सवाल खड़े किए और बदले में अपना योगदान गिनवाया।

- आनंद स्‍वरूप वर्मा ने मंगलेश डबराल की 'चूक' को ही चूक बता दिया और जनसत्‍ता के संपादक की 'निकृष्‍टता' के कारण उससे सम्‍बंध तोड़ लेने की कहानी बताई।

- वामपंथी लेखक संगठन से संबद्ध चंचल चौहान और के. विक्रम राव जैसे लोग अचानक सक्रिय हो गए।  

- पहली बार मोहल्‍लालाइव ने और दूसरी बार जानकीपुल ने ओम थानवी का 'अनन्‍तर' अपने यहां चिपका कर उसका प्रचार किया।

- जनसत्‍ता ने पिछले पांच हफ्ते में जो भी सामग्री इस प्रकरण पर प्रकाशित की, अधिकांश ब्‍लॉग से उठाई गई थी।

- बाकी जनसत्‍ता और उसके संपादक की 'लोकतांत्रिकता' के बारे में किसने क्‍या कहा, मसलन पंकज सिंह या सुधीश पचौरी, ये सारी बातें सिर्फ ओम थानवी जानते हैं जो उन्‍होंने 27 मई के 'अनन्‍तर' में लिखी हैं।

साफ है कि जनसत्‍ता में जिस तरह बहस को पर्सनल बनाया गया और मूल बहस को सिरे से गायब कर डाला गया, उससे एक बड़ी पुरानी कहावत गलत साबित हो गई, कि 'आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास'। दरअसल, हरि भजन को कोई आया ही नहीं था, सब कपास ओटने आए थे और अपने-अपने हिस्‍से का ओट कर कट लिए।

सबसे ज्‍यादा किसने ओटा


ओम थानवी
खबरों की पत्रकारिता का एक पुराना आसान फॉर्मूला है 'चेज़ दी मनी'। जहां पैसा न हो, वहां इसे इस तरह पढ़ा जाता है कि फायदा किसे हुआ। मूल बहस को छोड़ दीजिए जिस पर किसी ने बात ही नहीं की। जो हुआ, हम उससे हुए फायदे को ज़रा देखें, तो बहुत मेहनत नहीं करनी होगी। ओम थानवी ने बहस जनसत्‍ता में शिफ्ट की, 'विरोधी' विचारों को जगह दी (आनंद स्‍वरूप वर्मा और मंगलेश डबराल, जिन्‍हें साभार लिया गया था) और अंतत: बहस को खत्‍म करने के क्रम में सबको एक साथ निपटा दिया। इस निपटान में उन्‍होंने शरद दत्‍त, पंकज सिंह, सुधीश पचौरी आदि से अपने 'लोकतांत्रिक' होने की पुष्टि करवा ली और अंत में विष्‍णु खरे की लिखी प्रशस्ति को स्‍कैन कर के चिपका दिया। 'लोकतंत्र', 'सहानुभूति', 'गलतबयानी' और 'आत्‍मश्‍लाघा' के इस 'अनन्‍तर' में दरअसल ओम थानवी ने कहावत पलट डाली- कपास तो खूब-खूब ओट लिया, लगे हाथ हरि भी बन गए। बोले तो चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का मेरे बाप का!  

आइए, अब सिलसिलेवार 'अनन्‍तर' में घुसते हैं 'ताकि गर्द कुछ हटे'।

'मुखौटे' का लोकतंत्र

शुरुआती डेढ़ कॉलम में ओम थानवी लोकतांत्रिकता और उदारता की मुहर अपने ऊपर लगाते हैं। इसके लिए वे आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का भी सहारा लेते हैं। दरअसल, ऐसा कर के वे अपनी लोकतांत्रिकता को बहुतों के मुकाबले छोटा ठहरा देते हैं। क्‍या राकेश सिन्‍हा उनसे कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जो मंगलेश डबराल को अपने मंच पर अध्‍यक्ष बना रहे हैं? क्‍या राकेश सिन्‍हा से ज्‍यादा लोकतांत्रिक विभूति नारायण राय नहीं जो अपने तमाम विरोधियों को शरण दिए जा रहे हैं? क्‍या राय से ज्‍यादा लोकतांत्रिक रमन सिंह नहीं जो नामवर सिंह के साथ मंच साझा कर रहे हैं? क्‍या उनसे भी बड़े लोकतांत्रिक नरेंद्रभाई मोदी नहीं जिनके सद्भावना मंच पर मुसलमान नेता विराजते हैं? क्‍या इस देश की बहुदलीय राजनीति कहीं ज्‍यादा लोकतांत्रिक नहीं जहां वाम, दक्षिण, मध्‍यमार्गी सब एक ही संसद में बैठते हैं? क्‍या अमेरिकी प्रशासन उससे भी बड़ा लोकतांत्रिक नहीं जिसके विश्‍वविद्यालयों में नोम चोम्‍सकी सरीखे उसके आलोचक पढ़ा रहे हैं? यदि लोकतांत्रिकता की ओम थानवी वाली परिभाषा को देखें, तो वे सबसे छोटे कद के लोकतांत्रिक साबित होंगे क्‍योंकि उनके पास अपने विरोधियों को देने के लिए एक ऐसा मंच है जिससे व्‍यापक जनता (पढ़े हिंदी पाठक) का कोई परिचय नहीं। दूसरे, वे ऐसे ही लोकतांत्रिकों की कतार में खड़े नज़र आएंगे क्‍योंकि जिस लोकतंत्र की बात वे कर रहे हैं, वैसा लोकतंत्र दरअसल व्‍यक्तियों की सत्‍ता को कायम करने के लिए अपनाया जाता है। आप देखिए कि एक मंच पर खड़े दो विरोधी विचार के लोगों में से फायदा उसी को होता है जिसकी 'सत्‍ता' बड़ी होती है, छोटी सत्‍ता वाला बदनाम ही होता है। ओम थानवी इस बदनामी को 'असहिष्‍णुता' कहते हैं। जिस कदर विचारधाराओं को कपड़ा बनाने की साजि़शें पिछले कुछ दशकों में चली हैं, जिस कदर किसी विचारधारा के अनुरूप सार्वजनिक आचरण पिछले दिनों में दूभर बना दिया गया है, 'आवाजाही' से परहेज़ शायद ऐसे में कमिटमेंट का एक प्रतीक भर है और मुझे लगता है कि यही एक जेस्‍चर है जिससे आप अपने होने का, अपने स्‍टैंड का सार्वजनिक संदेश देते हैं। ओम थानवी कह रहे हैं इसे भी छोड़ो, यह लोकतांत्रिक नहीं। उनका लोकतंत्र दरअसल झूठा है। यह जन की सत्‍ता नहीं, व्‍यक्ति की सत्‍ता का औज़ार है। होशियारी देखिए ज़रा, कि जब तक लोगों को आपका चमकदार चेहरा दिख रहा है तब तक आप तर्क और तथ्‍य गिनाते हैं, जैसे ही कोई 'मुखौटा' कह देता है आप भाग्‍यवादी हो जाते हैं। शायद इसीलिए ओम थानवी कहते भी हैं, कि ''...ऐसी प्रतिक्रियाओं को सविस्‍तार प्रकाशित किया (...) तो इसलिए भी कि उदार रवैये की बात 'मुखौटा' न लगे।' यानी ओम थानवी का 'मुखौटा' न दिखे, इसके लिए वे सचेतन प्रयास करते हैं। वे चूंकि हमारे तर्कों को भी समझते हैं, लिहाज़ा डिसक्‍लेमर दे देते हैं, ''...लेकिन दुर्भाग्‍य देखिए कि फिर भी वह कुछ को मुखौटा ही लगी।'' तर्क और भाग्‍यवाद का यह घालमेल कहां ले जा रहा है, सोचिए? जिन्‍हें मुखौटों की पहचान है उन्‍हें तो आपने खारिज कर दिया, और जिन्‍हें मुखौटे दिखते नहीं (या यह कहें कि जिन सबने मुखौटे पहन रखे हैं और नहीं चाहते कि वे दूसरों को दिखें) उन सबको आपने गले लगा लिया। कहीं वह 'मुखौटों' का लोकतंत्र तो नहीं जिसकी बात ओम थानवी कर रहे हैं? यदि ऐसा है, तब तो वे ठीक कह रहे हैं क्‍योंकि लोकतंत्र दरअसल मुखौटा ही तो है जिसे ओम थानवी से लेकर जॉर्ज बुश तक अलग-अलग हितों के लिए लगाते हैं। अब इसका क्‍या किया जाए यदि ओम थानवी की सत्‍ता बेहद छोटी है (शायद कुछेक हज़ार पाठकों की), इसीलिए शायद 'जनसत्‍ता' का नाम आज उनके लिए मुखौटे का काम कर रहा है। यह बात अलग है कि हिंदी का सत्‍ता विमर्श ही इतना टुच्‍चा है कि 'जनसत्‍ता' भी एक सत्‍ताधारी की तरह इसमें नुमाया हो जाता है। ओम थानवी इस लिहाज़ से कुछ भी अलग और मौलिक नहीं कर रहे। वही कर रहे हैं जो निर्मल बाबा करते हैं- जनता (पढ़ें मुट्ठी भर लेखक-पाठक) की आस्‍था के सैलाब में अपना मुखौटा चमकाते हुए अपनी सत्‍ता कायम रखने का काम।                

आनंद स्‍वरूप वर्मा का मामला: झूठ दर झूठ  

पहली ही पंक्ति देखिएगा, ''...बचे आनंद स्‍वरूप वर्मा'', बिल्‍कुल क्राइम ब्रांच के किसी फिल्‍मी अफसर की तरह अगले एनकाउंटर से पहले बोला जाने वाला संवाद। बहरहाल, सबसे पहले ओम थानवी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लिखे का इस्‍तेमाल अपने हक़ में करते हैं। उदय प्रकाश वाले प्रकरण में कबाड़खाना का लिंक उन्‍होंने दुरुस्‍त दिया है, लिहाज़ा बरी होने को लेकर उनका आत्‍मविश्‍वास सही भी है लेकिन एक राष्‍ट्रीय दैनिक के संपादक के तौर पर उन्‍हें कौन बरी करेगा? वे लिखते हैं, ''पूंजीवाद और सर्वहारा की बात करने वाले दोनों 'सहारा' की सेवा में थे।'' इससे क्‍या साबित होता है? एक पत्रकार कहां नौकरी करेगा? बनिया के यहां ही न? जनसत्‍ता भी तो बुनियादी तौर पर बनिया की दुकान ही है न? हां, बनिया से पत्रकार नाता क्‍यों तोड़ता है, यह देखे जाने वाली बात हो सकती है। आगे देखिए, ''वर्मा जी की मेहरबानी है कि निकृष्टताका उदाहरण यह दिया है उनके किसी लेख में जनयुद्ध शब्द पर मैंने इनवर्टेड कोमालगा दिया, या नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड के हाथों किसी कटवाल की बर्खास्तगी मुझे रास नहीं आई। देर तक दिमाग पर जोर डाले रहा कि नेपाल में एक कनक दीक्षित को छोड़ किसी दूसरे शख्स को ठीक से जानता भी नहीं, यह कटवाल कौन हैं! बाद में गूगल पर देखा कि नेपाल के सेनाध्यक्ष थे।'' दक्षिण एशिया की पहली माओवादी सरकार के पतन की वजह जो व्‍यक्ति बना, उसका नाम भारत के महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय हिंदी दैनिक के संपादक को गूगल पर खोजना पड़ रहा है! ये बात ध्‍यान देने वाली है कि 'इनवर्टेड कॉमा' वाले प्रसंग के बाद भी आनंद स्‍वरूप वर्मा के लेख जनसत्‍ता में छपे थे, बाद में जब माओवादी सरकार गिरी तो एक लेख से कटवाल वाला प्रसंग हटा देने संबंधी ओम थानवी की बात पर आनंद स्‍वरूप वर्मा ने लिखना छोड़ दिया (आनंद स्‍वरूप वर्मा के मुताबिक)। समझ सकते हैं कि जिस 'राष्‍ट्रीय संपादक' को राजशाही समर्थक हिंदूवादी कनकमणि दीक्षित ही नेपाल के नाम पर याद आते हों, और जिन्‍हें वे ठीक से जानते हों, उससे ये उम्‍मीद करना संभव नहीं कि ऐसे राजनीतिक मसले पर वह कुछ समझ रखता होगा जो अमेरिकी सीआइए की हिट लिस्‍ट में पहले नंबर पर रहा। अगले पैरा में देखिए, '' वर्मा यह नहीं बताते जनसत्ता में आठ बरस उन्होंने इनवर्टेड कोमाया अन्य किसी तरह के बाधा के बगैर कैसे लिखा, न यह कि जनसत्ता  के अलावा किस राष्ट्रीय दैनिक ने उन्हें लगातार पहले पन्ने पर जगह दी- बाकायदा नाम के साथ, जैसे स्टाफ को देते हैं। हमने उनसे नियमित स्तंभ भी लिखवाया। क्या हमें मालूम नहीं था कि उनकी विचारधारा क्या है, या यह कि उनके लिए देश की किसी भी समस्या से बड़ी चीज नेपाल का माओवादी आंदोलन है?'' ओम थानवी आठ साल का श्रेय ले रहे हैं, जबकि आनंद स्‍वरूप वर्मा जनसत्‍ता के खुलने से ही उसमें लिखते रहे हैं (सती कांड पर दो वर्षों को छोड़ दें तो) और प्रभाष जोशी के ज़माने में दक्षिण अफ्रीका से लगातार दस दिन उन्‍होंने पहले पन्‍ने पर लीड खबर लिखी थी। आनंद स्‍वरूप वर्मा का जनसत्‍ता से जुड़ा होना उनकी विचारधारा के चलते नहीं था बल्कि नेपाल विशेषज्ञ की हैसियत से था। ओम थानवी ने जो भी दावे किए हैं, वे सब आत्‍मश्‍लाघा से प्रेरित हैं क्‍योंकि जनसत्‍ता से जिन लेखकों को प्रभाष जोशी ने जोड़ा था, उन्‍हें कुछ मामलों में आगे बढ़ाए रखना ओम थानवी की मजबूरी भी थी और आनंद स्‍वरूप वर्मा इसी मजबूरी का एक नाम थे क्‍योंकि नेपाल पर कनकमणि दीक्षित तो कम से कम जनसत्‍ता पाठकों की पसंद नहीं हो सकते थे। दूसरे अखबारों  का सवाल पूछ कर ओम थानवी ने ओछी बात कर दी। क्‍या आनंद स्‍वरूप वर्मा का नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, लातिन अमेरिका या भूटान पर काम अखबारों की कतरनों का मोहताज है?  बहरहाल, और देखिए, ''क्या आपको भी लगता है कि उन्होंने एक इनवर्टेड कोमाके मुद्दे पर राब्ता तोड़ दिया?'' वास्‍तव में नहीं, क्‍योंकि आनंद स्‍वरूप वर्मा खुद ऐसा नहीं कह रहे, उन्‍होंने तो कटवाल प्रकरण के बाद राब्‍ता तोड़ने की बात अपने पत्र में कही थी, जिसे आज ओम थानवी को गूगल पर खोजना पड़ रहा है। ओम थानवी की राजनीतिक समझ को ''मुट्ठी भर माओवादियों'' के प्रयोग से ही समझा जा सकता है। जब वे कहते हैं कि ''एक स्‍वतंत्र अखबार मुट्ठी भर माओवादियों के संघर्ष को सारी जनता का युद्ध नहीं ठहरा सकता'', तो वे भूल जाते हैं कि माओवादी चुनाव में हिस्‍सा ले चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी पिछले चुनावों में जनादेश पाई सबसे बड़ी पार्टी है (हो सकता है भूले न हों, पता ही न हो)। इससे भी बड़ा अपराध ओम थानवी अपने पद के खिलाफ यह कर जाते हैं कि ऐसी बात उस दिन छापते हैं जिस दिन पूरी दुनिया की निगाह नेपाल पर लगी है क्‍योंकि 27 मई ही वहां संविधान लिखे जाने की आखिरी तारीख है। संयुक्‍त राष्‍ट्र से लेकर बीजेपी के नेताओं तक को 27 मई के बाद नेपाल की स्थिति पर गहरी चिंता है, और ओम थानवी उसी दिन पूछ रहे हैं कि भई ये कटवाल कौन है? गलतबयानी, आत्‍मश्‍लाघा और काट-छांट के संपादकीय अधिकार के घालमेल से इस प्रकरण में ओम थानवी ने, मुहावरे में कहें तो, दरअसल अपने ही शब्‍दों को अपने पैरों पर मार लिया है।

चंचल चौहान की बात: भोंथरा संवेदन या बदमाशी (नादानी)  

जब नेपाल समझ में न आए, तो 'विश्‍व पूंजीवाद' कैसे समझ आ सकता है? चंचल चौहान का यह बयान, कि ''अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी दुनिया भर में यह विचार या चेतना फैला रही है कि विचारधारा और विचारधारा से लैस संगठन व्यर्थ हैं'', ओम थानवी के या तो सिर को बिना छुए निकल गया या वे खुद को नादान दिखाने की कोशिश में यह अर्थ लगा बैठे कि ''जनसत्‍ता जनवादी लेखक संघ के विरुद्ध किसी अंतरराष्‍ट्रीय षडयंत्र में शरीक है।'' आप समझिए कि राजनीति-दर्शन का एक सामान्‍य वाक्‍य कैसे भोंथरे संवेदन (या थेथरोलॉजी) का शिकार हो जाता है। चंचल चौहान जो कह रहे हैं, वह संभव है जलेस का नाम लिए जाने से उत्‍प्रेरित हो, लेकिन उनकी बात सामान्‍य तौर पर सही है। इस सामान्‍यीकृत वाक्‍य को भी ओम थानवी पर्सनल बना देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सामने वाला कोई गंभीर बात कह रहा हो और आप सब कुछ सुनने के बाद कह दें कि मुझे भूख लगी है।

मंगलेश डबराल का संदर्भ: सफेद झूठ  

ओम थानवी पहले तो मंगलेश डबराल के स्‍पष्‍टीकरण को 'मज़ेदार' कह के मज़ा ले लेते हैं, लेकिन बाद में खुद फंस जाते हैं। वह कहते हैं, '' बहस मुख्यत: जनपथऔर मोहल्ला लाइवपर चली। तीन सौ से ज्यादा प्रतिक्रियाएं वहां शाया हुर्इं, पर मंगलेश जी का पक्ष कहीं पर सामने नहीं आया।'' यह झूठ है, सरासर झूठ। आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र जिस पन्‍ने पर 'जनपथ' पर छापा है, उसी के ठीक नीचे मंगलेश डबराल का 'चूक' वाला स्‍पष्‍टीकरण भी मौजूद है (http://www.junputh.com/2012/05/blog-post.html) और ओम थानवी इससे कतई इनकार नहीं कर सकते क्‍योंकि 20 मई के जनसत्‍ता में जो आनंद स्‍वरूप वर्मा का मंगलेश डबराल के नाम पत्र उन्‍होंने छापा है, उसके नीचे 'साभार जनपथ' लिखा है। ज़ाहिर है, ऊपर दिए जिस पेज से उन्‍होंने आनंद स्‍वरूप वर्मा का पत्र उठाया या उठवाया होगा, उसके एक लाइन नीचे लिखे को उन्‍होंने जान-बूझ कर नज़रअंदाज़ कर दिया है- ''मंगलेश डबराल का वह स्‍पष्‍टीकरण, जिसकी प्रतिक्रिया में उपर्युक्‍त पत्र भेजा गया है।'' (यह बात ठीक है कि मंगलेश जी ने यह पत्र मुझे नहीं भेजा था, मैंने इसे अशोक पांडे की फेसबुक वॉल से उठाया था) ज़ाहिर है मंगलेश जी की ओर से अशोक पांडे अपनी दीवार पर 'खांस' आए थे, लेकिन उसकी मुनादी 'जनपथ' पर समय रहते हो चुकी थी। यहां ओम थानवी की लोकतांत्रिकता और सच्‍चाई का झीना परदा चर्र-चर्र कर के फट जा रहा है। उन्‍होंने कबाड़खाना का एक लिंक देकर खुद को बरी किया था, 'जनपथ' का एक और लिंक उन्‍हें कठघरे में खड़ा कर चुका है। उन्‍होंने जब बहस ही खत्‍म कर दी है, तो उनकी सेहत पर इससे फर्क नहीं पड़ता है और वैसे भी उनसे जवाब ही कौन मांगने जा रहा है, जब उन्‍हें नामवर जी की मुअनजोदड़ो पर 'स्‍नेहवश' कही बात 'सबसे उल्‍लेखनीय' लग रही हो। एक बात पूछी जानी चाहिए, क्‍या मंगलेश जी को ओम थानवी काट-छांट का संपादकीय अधिकार नहीं देंगे? क्‍या अब भी वे मंगलेश जी को अपने अ‍धीन ही मानते हैं?

और अंत में आत्‍मरति

विष्‍णु खरे के बहाने अंत में आखिर संपादकीय संभोग का सुख ओम थानवी ने ले ही लिया, लेकिन विष्‍णु खरे की बात की दूसरी अर्थच्‍छवियां शायद वे समझ नहीं सके। विष्‍णु खरे इतने भी मूर्ख नहीं कि ओम थानवी को राजेंद्र माथुर के बाद का अद्वितीय हिंदी संपादक ठहरा दें। ध्‍यान से पढि़ए, उसमें लिखा है, ''राजेंद्र माथुर के बाद 'अपनी तरह के' अद्वितीय हिंदी दैनिक संपादक ओम थानवी के लिए''। क्‍या समझ आया? 'अपनी तरह के' ऐसे ही नहीं लिखा विष्‍णु खरे ने, यह एक कालजयी प्रशस्ति और प्रमाण पत्र है कि कल को ओम थानवी यदि कुछ भी कर बैठें, तब भी 'अपनी तरह के' ही रहेंगे।

मेरा पक्ष

मुझसे मेरा पक्ष किसी ने नहीं पूछा, लेकिन इतना लंबा लिखने के बाद कुछ तो कहना बनता ही है। पहली बात, इतने लब्‍धप्रतिष्‍ठ लोगों ने मिल कर डेढ़ महीने में सिर्फ और सिर्फ कीचड़ का उत्‍पादन किया, जिसे एक-दूसरे पर उछाला। अच्‍छी बात यह हुई कि बाकी लोगों ने तो गर्द हटाने की फिक्र नहीं की, लेकिन ओम थानवी ने गर्द हटाने के चक्‍कर में खुद को धो दिया। उनके लोकतंत्र और उनकी सत्‍ता के साथ सहानुभूति बनती है। जहां तक साहित्‍य और राजनीति के बीच मूल बहस का सवाल है, तो 'जनपथ' पर वह अविराम जारी है अलग-अलग प्रसंगों के रास्‍ते।

आशुतोष भारद्वाज का लेख
अच्‍छी बात बस एक हुई है कि कीचड़ में एक कमल खिल गया है। 27 मई को 'अनन्‍तर' के ही सामने वाले पन्‍ने पर आशुतोष भारद्वाज ने अपने लेख में एक सीख दी है 'पहले अपना घर साफ करें'। चाहें तो ओम थानवी इसे छापने का श्रेय ले सकते हैं और हम उन्‍हें धन्‍यवाद भी देंगे इतना सच्‍चा लेख छापने के लिए, लेकिन हम क्‍यों भूल जाएं कि आशुतोष उनके स्‍टाफर हैं। क्‍या कोई बाहर का व्‍यक्ति लिख कर भेजता तब भी वे ऐसे ही छापते? यह सवाल काल्‍पनिक है, लेकिन मौजूं है। कीचड़ भी अपना, कमल भी अपना। यही है ओम थानवी का लोकतांत्रिक सपना। अनन्‍तर का लोकतंतर ऐसा ही हो सकता है।





  

5/27/2012

पहले अपना घर साफ करें

बहुत दिन बाद किसी अखबार में कुछ कायदे का छपा है। आज का जनसत्‍ता पढि़ए- ओम थानवी के लिए नहीं, आशुतोष भारद्वाज के लिए- ठीक सामने वाले पन्‍ने पर। नहीं पढ़ पाए, तो यहां वह लेख पढि़ए...


आशुतोष भारद्वाज

पिछले सवा दो वर्षों में हिंदी के मसलों पर रिपोर्टिंग का पहला त्रासद अनुभव यह रहा कि बुजुर्ग और नामचीन लेखकों से फोन पर उनका वक्तव्य मांगिए तो अधिकतर ‘‘अब इस पर क्या कहा जाए, रहने दें...’’ की मुद्रा में फोन रख देते हैं। दिलचस्प है कि बांग्ला या कन्नड़ के वरिष्ठ लेखक मुद्दे से अनजान होने के बावजूद न सिर्फ फोन पर पूरी बात पूछते-सुनते, बल्कि अपनी बेबाक राय भी देते हैं।

हिंदी के वरिष्ठ लेखक सार्वजनिक बयान देने से क्यों बचते-डरते हैं? क्या किसी अन्य क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ होंगे? मसलन, किसी अर्थशास्त्री, राजनेता या पुलिस अधिकारी से कोई प्रश्न पूछे जाने पर वह किसी रिपोर्टर से कहेगा कि ये सब छोड़िए, बाकी सब ठीक है? क्या कर रहे हैं इन दिनों... आइए कभी।

दूसरा त्रासद अनुभव, ये सम्मानीय बुजुर्ग जवाब तो नहीं देते, लेकिन फोन रखते वक्त हौले से सरका देते हैं- वैसे हमें मालूम है कि किसके कहने पर आप यह लिख रहे हैं। अगले दिन खबर छपने पर युवा लेखक-मित्र बेधड़क खुद को आपका स्वयंभू और एकमात्र हितैषी मान आपको तिकड़मी सलाह देते हैं- क्यों कर रहे हैं यह सब? क्यों किसी को हीरो बना रहे हैं? आप अच्छा लिख रहे हैं, अपना काम करिए न।

यह दिलचस्प है। अपनी भाषा यानी अपने जीवन के एक महत्त्वपूर्ण मसले पर एक कायर-कातर और शातिर-शायराना चुप्पी, अगर कोई दूसरा बोले तो उस पर निहित स्वार्थ और किंचित षड्यंत्र का ठप्पा, इसके कोई मायने नहीं कि रिपोर्टर फोन के उस ओर खड़े व्यक्ति से कभी नहीं मिला है।

अगर आदर्श चुनाव संहिता, चिकित्सक का हिपोक्रेटिक हलफनामा, सांसद की संवैधानिक शपथ हैं तो लेखकीय आचार संहिता भी होनी चाहिए। किसी के निजी जीवन से हमें सरोकार नहीं, लेकिन उन सार्वजनिक लम्हों में जब इंसान बतौर लेखक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है तो उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जो मूल्य उसके शब्द प्रस्तावित करते हैं उनके लिए वह कुरबान होने की कुव्वत रखेगा। अपने शब्द पर न्योछावर होने की बेझिझक और बेखौफ हुंकार लेखक होने की अनिवार्य शर्त है। मसलन, उसका शब्द अगर सत्ता-विरोधी है तो वह अपने लेखकीय जीवन में सत्ता की चाकरी नहीं करेगा। वह न कहें-लिखें जिसे आपका आचरण अवैध बना दे। जो सत्यापित कर सकें सिर्फ वही लिखें। बस।

इस संहिता की ललकार पर हमारे कई सम्मानित बुजुर्ग और युवा लेखक अपनी हस्ती लुटा चुके मिलेंगे। मसलन, वे वयोवृद्ध आलोचक, जिनकी सराही और प्रकाशनार्थ संस्तुत की गई किताब को एक बड़ा प्रकाशन छापने से मना कर देता है। यह उस किताब से कहीं अधिक जूरी के अध्यक्ष का तिरस्कार है। क्या आलोचक का काम महज किताबों का लोकार्पण करना और मंच से बोलना है? अपने कहे-लिखे शब्द के सम्मान की रक्षा कौन करेगा? क्या उनसे यह अपेक्षा न हो कि किताब पर होने वाला हर वार सबसे पहले वे अपनी काया पर सहेंगे?

या वे लेखक जो पुलिसिया बर्बरताके खिलाफ लिखते-बोलते हैं, लेकिन चुपचाप उस भूतपूर्व पुलिसिए के दरबार में जा खड़े होते हैं, जो भारत के इतिहास में शायद पहले ऐसे कुलपति बने हैं, जिनके खिलाफ फर्जी प्रमाण-पत्र बनवाने के मामले में एफआइआर दर्ज हो चुकी है। उन पर कई दलित छात्र उत्पीड़न का और लेखिकाएं अपमान का आरोप लगाती हैं। आपको अपने निजी जीवन में किसी के भी साथ मित्रता, अंतरंगता रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन बतौर लेखक कहीं शिरकत करने से पहले क्या यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि आपकी उपस्थिति आपके शब्द और लेखक बिरादरी को तिरस्कृत तो नहीं करेगी?

कोई प्रकाशक या संपादक अपनी अर्थवत्ता लेखक और उसकी रचना से ग्रहण करता है। अपने यहां उलट है। प्रकाशक मानते हैं कि उन्होंने अनेक लेखकों को खड़ा किया है- क्या था वह हमारे यहां छपने से पहले, हमने बनाया उसे। अद्भुत दंभ, जिसे खुद लेखक की कातरता ने रक्तपोषित किया है।

किसी पत्रिका के दफ्तर जाइए, लेखक अपनी रचना का रोली, चावल, कपूर, बत्ती बना कर संपादक की आरती उतारते मिलेंगे- कल ही पूरी की है, देख लीजिएगा जरा। संपादक बताएगा कि स्वीकृत रचनाओं की कतार बहुत लंबी है, तो कहेंगे- थोड़ा जल्दी कर दीजिएगा न। एकाध कोई आगे पीछे कर दीजिएगा।

जिस इंसान के भीतर लेखकीय संयम नहीं, उसे अपने शब्द की ताकत पर भरोसा नहीं तो फिर संपादक बिना उसकी याचना का लुत्फ उठाए क्यों उसे छापे! भले वह आपकी रचना जल्दी छाप दे, लेकिन क्या आप इस मासूम भुलावे में हैं कि संपादक आपका सम्मान करेगा? आप जैसे ही दरबार से उठ कर जाएंगे, वह अन्य सभासदों के सामने तुरंत आपका और आपकी रचना का चीर हर लेगा। आपने अपनी गरिमा तो आरती की थाली में स्वाहा कर दी, जिसे आपने अनगिन जागती रातों में संजोया, जो घनघोर नाउम्मीदी-नाकामी के लम्हों में आपके साथ अंतिम स्वप्न की तरह जीती रही, कम-अज-कम उस कृति को तो ऐसी सभाओं में दांव पर मत लगाइए। प्रकाशक को शक्तिमान किसने बनाया? लेखक की कायरता, अपने शब्द पर अविश्वास और छपास-ललक ने। अगर साल-छह महीने देर से छपेगा या नहीं भी छपेगा तो क्या उसकी कलम को लकवा मार जाएगा, लैपटॉप कोमा में चला जाएगा?

यही ललक उसे लोकार्पण मंडप ले जाती है, वह बड़े लोकार्पणकार का जुगाड़ करता है, लेकिन यहां भी कुंठित होता है कि वरिष्ठ लेखक ने उसकी तारीफ में कुछ घिसे हुए जुमले तो मंच से कहा, लेकिन बिना उसकी किताब पढ़े यों ही चला आया था। किताब के   पन्ने मोड़, रास्ते में प्रकाशक की कार से आते वक्त नोट्स जैसा कुछ बना लाया था।

प्रचारलोलुप यह इंसान अब भी नहीं खैर करता, अपने शब्द को पोला-पोपला-पिलपिला बनाए जाता है। किताब आ गई, लोर्कापण हो गया और अब यह बेमुरव्वत और बेनमक जंतु समीक्षक के दरबार पहुंचता है- कहीं कुछ देख लीजिएगा हो सके तो जरा। सुधी समीक्षक के श्रीचरणों मेंअपनी हस्ताक्षरित किताब भिजवाता है, भेजने से पहले दो, उसके बाद चार फोन करता है। कई सारी प्रतियां अन्य बुजुर्ग लेखकों को ससम्मान भेंट करने जाता है- नई किताब आई है मेरी, आप देख लेते जरा।

जरा! कुछ और भी बाकी था या है? अपनी किताब को बेइज्जत करने से बेहतर वह अपनी कलम तोड़, लैपटॉप फोड़ फांसी क्यों नहीं लगा लेता? वह क्यों नहीं इस आत्मविश्वास में बेफिक्र होकर जीता है कि अगर उसका शब्द सच्चा है तो उसे किसी समीक्षक-प्रचारक की दरकार नहीं। उसकी किताब अपना रास्ता खुद बनाएगी।

मित्रो, बेवकूफी है संपादक-प्रकाशक के खिलाफ अभियान। भ्रष्ट आचार तो इस लेखक नामक जंतु का ही है, जो स्वघोषित एंटी-एस्टैब्लिशमेंट है, अनाम, अज्ञात या दूर देश के दुश्मन गढ़ता है; बुश, सरकोजी से लेकर किन्हीं चेहराहीन प्राणियों पर दिन-दोपहर फेसबुकिए मुक्के बरसाता है; प्रगतिवादिता, अन्याय, क्रांति जैसे मशहूर जुमलों की विराट इमला लिखता है; प्रेम, मानवता, सहिष्णुता का मंत्रोच्चार करता है, समाज के हर वर्ग, राजनेता, फिल्मकार, व्यापारी आदि पर अंतिम फतवा अपना स्वयंभू अधिकार समझता है, लेकिन अपने कर्मों से पूरी लेखक बिरादरी को तिरस्कृत करता है।

विरोध इसी प्रजाति का होना चाहिए, भले वह कविता कहता, कहानी बोलता या आलोचना सुनाता हो। सबसे पहले इस जंतु को इस खुशफहमी से जुदा करें कि वह लेखक है। चार-छह कागज काले करने से कोई लेखक नहीं बनता। आप अच्छा लिख रहे हैं, लिखते होंगे; आपकी रचनाएं देशी-विदेशी कई भाषाओं में अनूदित होकर चर्चित हुई होंगी, हुआ करें; लेकिन आपको समझना चाहिए कि लेखक होना एक अपूर्व नैतिक क्रिया है। लेखक कहलाने की अर्हता कठोर है, बलिदान मांगती है। लेखक भाषा का सेनापति है, रचना उसे समाज और साहित्य का अनिवार्य और अंतिम दूत बनाती है। उसे अधिकार और दायित्व देती है कि वह अपनी भाषा और उसे बरतने वाले प्राणियों के सम्मान के लिए आंधी-तूफान, घनघोर लालच और लिप्सा के लम्हों में भी सैनिक की तरह मोर्चा बांधे मिलेगा। अगर आपका आचरण आपके शब्द का विलोम है, आप शब्द की रक्षा नहीं कर सकते तो आप खुद तय करें कि आपको क्या कहा जाए।

आखिर आप भी तो स्कूल-कॉलेज के दिनों में पहली मर्तबा शब्द के पास अंतिम उम्मीद की भांति गए थे कि इसकी आंच में अपनी रूह और हड्डियां गलाएंगे, पिघले रसायन की ताप से एक बेहतर दुनिया रचेंगे। उम्र ने भले समझा दिया कि दुनिया शायद यों नहीं बदलेगी, लेकिन खुद को स्वाहा करने का जज्बा काहे भूल आए। डॉलर के बरक्स रुपए की तरह शक्ति के समक्ष शब्द के अवमूल्यित होते जाने के दौर में इतना तो हम कर ही सकते हैं कि हर वह व्यक्ति, जो लेखकीय आचार संहिता अपने जीवन में लागू करने में असमर्थ हो अपनी भाषा की गरिमा की खातिर खुद को शब्दकार न माने। प्रकाशक-संपादक ठहरे बाहरी प्राणी, उनसे बाद में निपट लेंगे। पहले अपने घर की तो सफाई हो।

साभार: जनसत्‍ता, 27 मई 2012

5/25/2012

सावधान! यह आदमी बेहद खतरनाक और छलिया है: रंजीत वर्मा

शिवमंगल सिद्धांतकर 'बाबा' के जवाब पर कवि और 'बाबा' की पत्रिका के संपादक रहे रंजीत वर्मा ने अपनी टिप्‍पणी भेजी है। यह टिप्‍पणी परत दर परत 'बाबा' के जवाब का पोस्‍टमॉर्टम करती है।



रंजीत वर्मा
यह जवाब देने से पहले मैं बता दूं कि मेरे मन में पुनीता शर्मा को लेकर कोई सवाल नहीं है। सवाल शिवमंगल जी के स्टैंड को लेकर है। मेरे मन में यह सवाल भी नहीं उठता अगर पुनीता शर्मा राग विराग की सचिव नहीं होतीं और शिवमंगल जी अपने लगभग सारे सांस्कृतिक कार्यक्रम राग विराग के अंतर्गत नहीं कर रहे होते। यहां यह याद दिलाने की जरूरत नहीं कि शीला सिद्धांतकर स्मृति पुरस्कार राग विराग संस्था की ओर से ही दिया जाता है और देशज समकालीन की अंतिम बैठक में उन्होंने कहा था कि अब इस पत्रिका को निकालने का सारा भार राग विराग उठायेगा क्योंकि उसके पास फंड है, वह सक्षम है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों पुरस्कार लेने के बाद मामला सिर्फ यह नहीं रहा कि पुनीता शर्मा गैर मार्क्‍सवादी हैं इसलिए उनसे ऐसी कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिये थी जैसा कि अपने जवाब में शिवमंगल जी ने कहा है बल्कि अब यह मामला उनके मार्क्‍सवाद विरोधी होने तक चला गया है। और अगर ऐसा नहीं है यानी कि वे मार्क्‍सवाद विरोधी नहीं हैं और किसी मार्क्‍सवादी संस्था से भी पुरस्कार लेने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है तो मैं इसे उनके अवसरवादी होने के लक्षण के रूप में ही देखूंगा जो उतनी ही आपत्तिजनक बात है। तब भला ऐसी किसी संस्था की ओर से कोई मार्क्‍सवादी विचारधारा की पत्रिका का निकाला जाना मुझे अपनी समझ के परे लगा अतः मैंने शिवमंगल जी से उनका स्टैंड जानना चाहा। उन्होंने जो जवाब दिया उससे मेरा सहमत होना मुश्किल था और तब मैंने पत्रिका के संपादक पद से हट जाने में अपनी भलाई समझी।



शिवमंगल सिद्धांतकर जी की यह स्थापना कि किसी के भी हाथों पुरस्कृत होने में कोई बुराई नहीं है चाहे वह मानवता का कोई बहुत बड़ा हत्यारा ही क्यों न हो अपने आप में किसी को भी चौंका देने के लिए काफी है। उनके हिसाब से बुराई सिर्फ तब है जब आप उसे पुरस्कृत करते हैं। शिवमंगल जी ने यह स्थापना तो दे दी लेकिन उन्होंने इसकी व्याख्या करना और इसे सत्यापित करना जरूरी नहीं समझा जबकि उन्हें चाहिये था कि वे बताते कि दोनों में क्या अंतर है। अगर कोई उनसे यह पूछे कि आप पुरस्कार जिससे ले सकते हैं उसे दे क्यों नहीं सकते तो मुझे नहीं मालूम कि उनका जवाब क्या होगा, लेकिन एक मोटी बात जो मेरी समझ में आती है वह यह है कि आप जब किसी के हाथों पुरस्कार ले रहे होते हैं तो जाहिर तौर पर आप उसे न सिर्फ उस समाज की ओर से स्वीकृति प्रदान कर रहे होते हैं जहां से आप आते हैं बल्कि साथ ही चूंकि आप वैचारिक रूप से भी अपनी एक अलग पहचान रखते हैं (अगर यह सच है तो), उस विचारधारा की ओर से भी उसे क्लीन चिट दे रहे होते हैं। और क्या इस तरह से उसे मान्य घोषित करना या मान्यता प्रदान करना उसे भी सम्मानित करना नहीं हुआ? और अगर हुआ तो आप इसे क्यों नहीं आपत्तिजनक मान रहे हैं! यह पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है। और उस पर यह तुर्रा कि इसमें गलत क्या है! और जिसने गलत कहा उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया!



मंगलेश जी ने राकेश सिन्हा के साथ मंच साझा करने पर अपनी गलती स्वीकार करते हुए जब कहा कि वह उनकी चूक थी, तो बाबा के नाम से प्रख्यात शिवमंगल जी ने अपनी शैली में जवाब देते हुए इसे वैज्ञानिक द्वंद्वात्मक पद्धति के विपरीत कहा। यानी कि दूसरे शब्दों में वे यह कह रहे हैं कि मंगलेश डबराल ने चूक मान कर मार्क्‍सवाद विरोधी काम कर दिया मानो भगवा चिंतक राकेश सिन्हा के मंच पर जाकर सचमुच वे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पद्धति का पालन कर रहे थे- जैसा कि शिवमंगल जी का कहना है। इस तरह वे चूक मानने पर न सिर्फ मंगलेश डबराल को मार्क्‍सवाद विरोधी साबित करते हैं बल्कि साथ में यह कह कर कि मंगलेश जी ने ऐसा दबाव में किया, वे उनके तमाम मार्क्‍सवादी साथी रचनाकारों को भी कठघरे में खड़ा कर देते हैं जो उन पर उनके हिसाब से दबाव बना रहे थे कि इसे वे अपनी चूक मानें। यह सब वे सिर्फ इसलिए कह रहे हैं ताकि कोई उनसे यह उम्मीद न करे कि वे परिवारवाद को तिलांजली देते हुए पुनीता शर्मा को राग विराग के सचिव पद से हटा देंगे या नहीं तो खुद को राग विराग से अलग कर लेंगे। वे मंगलेश डबराल की तरह गलत को गलत मानने वाली कोई गलती नहीं करने जा रहे हैं। वे इस मामले में उदय प्रकाश की तरह भी कोई सफाई देने की कोशिश नहीं करेंगे क्योंकि हत्यारा हो या वह चाहे घनघोर रूप से कितना भी मानवता विरोधी क्यों न हो, वे मानते ही नहीं कि उसके हाथों पुरस्कार लेना गलत भी हो सकता है।





उनका मानना है कि हत्यारे के साथ भी सिर्फ टकराव की नीति पर नहीं बल्कि सामंजस्य की नीति पर भी चलना चाहिये क्योंकि इसी तरह इतिहास आगे बढ़ता है। सन् 67 से वे इसी तरह इतिहास को आगे बढ़ा रहे हैं। आप खुद देखिये किस तरह उनका परिवार बिहार की सामंतवादी जकड़न से निकल कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया है। वे खुद कह रहे हैं, मैं नहीं कह रहा। यह द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का परिणाम नहीं तो और क्या लगता है आपको, और आप हैं कि उनके ही खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठ गए हैं। क्या ऐसा करते वक्त नहीं लगता आपको कि आप मोदी और मनमोहन के हाथ मजबूत कर रहे हैं, जैसा कि शिवमंगल जी कह रहे हैं। एकदम ठीक कह रहे हैं वो। अब आप यह तर्क लेकर मत बैठ जाइये कि पुरस्कार ले रही हैं पुनीता शर्मा और उसे जायज़ वे खुद ठहरा रहे हैं तो मैं कैसे मोदी के हाथ मजबूत कर रहा हूं। चुप बैठें आप। समझदारी तो नाम भर की भी नहीं है आपके पास। बस ऐसे ही किसी पर भी उंगली उठा देते हैं। अब आप इतिहास वगैरह का हवाला मत दीजिये क्योंकि आप जो भी कहेंगे सब भूमंडलीकरण से ज़माने पहले की बात करेंगे। शिवमंगल जी भूमंडलीकरण के बाद वाले चरण में आ गये हैं और यहां स्थितियां बिल्कुल बदली हुई हैं। अब सारा आंदोलन दुश्‍मनों से सामंजस्य और मित्र शक्तियों से टकराव के सिद्धांत पर चल रहा है। यह सामंजस्य और टकराव का नया द्वंदवाद है। इसमें पुरानी वाली वह बात नहीं रही- जैसे कि अगर सामंतयुगीन कोई सृजन या मूल्य बेहतर है तो उसके साथ सामंजस्य बैठाओ और साथ ही उस युग को नेस्तनाबूद करते हुए सर्वहारा समाज का आधिपत्य स्थापित करो। नहीं अब पुरानी पड़ गयी ये बातें अब सामंजस्य के नाम पर हत्यारे से गले लगना है। यह दूसरे को धकियाते किसी भी तरह आगे बढ़ जाने का युग है। ऐसे ही अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं हुआ है उनके परिवार का, जिसे वे थोड़ा सा मिस्टेक करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर का कह रहे हैं। आप चाहें तो मन ही मन इसे सुधार सकते हैं लेकिन बोलियेगा नहीं कुछ, नहीं तो वे बुरा मान जायेंगे।



वे पहुंचे हुए आदमी हैं। उनकी एक और स्थापना देखिये- यथार्थ और आभास के द्वंद्व की वैज्ञानिकता को समझने वाले कहते हैं कि जो दिखता है, जरूरी नहीं कि सच हो ही।बात समझ में आयी। अब गया वो ज़माना पदार्थ और चेतना वाला कि पदार्थ से चेतना का विकास होता है। अब चेतना नहीं आती, अब सिर्फ आभास होता है जो गलत भी हो सकता है क्योंकि पदार्थ भी अब पहले की तरह यथार्थपरक नहीं रहा। जानकारों को पता है कि अब तो ऐसे लोग भी मिलने लगे हैं जो अपनी पूरी जि़ंदगी आभासी दुनिया में गुज़ार देते हैं और उन्हें इसका आभास भी नहीं होता। आखिर क्या सोचकर वे कह रहे हैं कि उनके घर पर रखी मेज़ उनकी नहीं है बल्कि सार्वजनिक है। किसी के भी घर में जो कुछ सामान होता है उसका इस्तेमाल अमूमन घर के सभी सदस्य करते होते हैं अगर वह नितांत व्यक्तिगत न हो। तो क्या इसी आधार पर उन सामानों को सार्वजनिक कहा जा सकता है। पारिवारिक और सार्वजनिक होने के बीच का अंतर समझ कर भी जो आभास और यथार्थ के फलसफे के बीच उलझाने की कोशिश कर रहा हो, आप समझ सकते हें कि ऐसा आदमी कितना खतरनाक और छलावे से भरा हो सकता है। अगर यह मान भी लिया जाये कि उनके कमरे में रखी मेज़ सार्वजनिक है तो इससे क्या वह शील्ड जिस पर मोदी का नाम खुदा है और जिसे मोदी के हाथों लिया गया है उसे वैचारिक धरातल पर सही माना जा सकता है, जिसकी कोशिश शिवमंगल जी कर रहे हैं और तब से एड़ी चोटी का पसीना बहाने में लगे हुए हें। या यह कहकर कि पुनीता के नृत्य पर मनोज तिवारी झूम रहे थे, वे क्या साबित करना चाहते हैं। कौन है यह मनोज तिवारी? और उसके झूमने से मोदी के एजेंडे के तहत नृत्य प्रस्तुत करना कैसे सही हो गया।

देखिये मैंने पहले ही कह दिया है कि मुझे उनके नृत्य करने या पुरस्कार लेने पर कोई आपत्ति नहीं है, आपत्ति है तो सिर्फ इस बात पर कि शिवमंगल सिद्धांतकर इसे सही

ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जो खुद को क्रांतिकारी कहते हैं। ये दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। वे किसी एक को छोड़ दें किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।  

बहस से जुड़ी पिछली टिप्‍पणियां देखने के लिए नीचे क्लिक करें:

मार्क्‍सवाद के अनुकूल है मंगलेश और उदय प्रकाश का आचरण

बाबा की मेज़ पर मोदी की शील्‍ड