गुजरात दंगों के दस साल बाद और बाबरी विध्वंस के बीसवें साल में अगर अचानक
यह सवाल खड़ा हो जाए कि हिंदुस्तान की सांप्रदायिक राजनीति का नया चेहरा कौन है,
तो शायद जवाब तलाशने में दिक्कत होगी। यह सवाल उतना आसान नहीं है जितना ऊपर से जान
पड़ता है। कुछ ताज़ा रुझानों पर ज़रा ग़ौर करें... (पूरा लेख पढ़ने के लिए नीचे दिए पन्ने पर क्लिक करें)


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