प्रसंगवश


... बाहर कभी आपे से समंदर नहीं होता

 (व्‍यालोक पाठक ने यह खुला पत्र विष्‍णु खरे द्वारा मोहल्‍ला पर सार्वजनिक की गई मेरी और उनकी चिट्ठियों के संदर्भ में मोहल्‍ला के मॉडरेटर अविनाश को भेजा था। उन्‍होंने इसे स्‍वतंत्र तौर पर छापने के बजाय प्रतिक्रियाओं में चिपका कर इसका वज़न ही कम कर दिया। गुंटर ग्रास की कविता के बहाने शुरू हुई बहस में किसी भी तीसरे पक्ष की प्रतिक्रिया, टिप्‍पणी या विषय से जुड़े स्‍वतंत्र आलेख का प्रकाशन अब लोकतांत्रिकता का तकाज़ा है, हर प्रतिक्रिया उतनी ही अहम है अब, खासकर इसलिए कि जिस चीज़ से बचने की कोशिश मैंने जनपथ पर की थी, वह काम मोहल्‍ला ने बखूबी कर डाला है बावजूद इसके कि विष्‍णु खरे को शुरुआती तौर पर मोहल्‍ला से  ही परहेज़ था। विषय पर लगातार दूसरों के लेखों को छापने के साथ-साथ यह नैतिक जि़म्‍मेदारी बनती है कि जिस किसी की प्रतिक्रिया को दूसरे मंच पर उपयुक्‍त जगह नहीं मिली, उसे यह जगह दी जाए।)


व्‍यालोक पाठक
डिसक्लेमर : यह अयाचित टिप्पणी नहीं है, क्योंकि विष्णुजी ने उनके और अभिषेक के बीच हुई खतो-किताबत का गट्ठर मुझे भी भेजा है और इस तरह मैं एक ‘पार्टी’ बन गया हूं। बहरहाल, जिस तरह उन्होंने तमाम युवाओं को एक ही लाठी से हांकने की कोशिश की है, उसी तरह मैं भी उनको इस मेल के जरिए कुछ बताने की कोशिश कर रहा हूं।

सर्वप्रथम, तो आपको इस बात की बधाई कि आखिरकार उसी जगह पहुंच गए, जहां से रोकने के लिए अभिषेक श्रीवास्तव को आपने विशेष निर्देश दिए थे। सनद रहे कि कहीं भी और, बस ‘मोहल्ला’, नहीं की टेर लगानेवाले आप वहीं पहुंच गए। दुनिया गोल है, श्रीमन् या फिर ‘पुनर्मूषिको भव…..’। दूसरी बात यह कि जिस नाबदानी इस्तेमाल के आप विरोधी हैं, मुझे तो लगता है कि आपने इंटरनेट को नाबदान क्या पीकदान ही बनाने की ग़लती कर दी है और दुनिया भर की गंदगी इस पर परोस दी है। जिन बंधुओं को आपकी ग़लाज़त नहीं दिखती, उनके लिए मुझे कुछ नहीं कहना। हां, बस यह याद दिला दूं कि भंड़ैती का इस्तेमाल, या अपने न जाने किस मुंह से क्या-क्या त्याग करना, जैसे वाक्यों का इस्तेमाल और बार-बार क्षेत्र-विशेष पर आक्षेप कम से कम शालीनता के दायरे में तो नहीं आता। आप तार्किक हैं, कर्दम-युद्ध की शुरुआत करनेवाले की दुहाई दे सकते हैं, पर गुरुवर आंखें हमारे पास भी हैं, और चलिए एक वक्त को मैं मान भी लूं कि आपने केवल प्रतिक्रिया की है, तो भी आपने अपनी गंभीरता और उम्रदराजी का परिचय तो नहीं ही दियाः-

बरसात में तालाब तो हो जाते हैं, कमज़र्फ
बाहर कभी आपे से समंदर नहीं होता


दूसरी बात, मैं आपको यह याद दिलाना चाहूं कि आप विषयांतर कर रहे हैं, श्रीमन्। बात हो रही थी गुंटर ग्रास की कविता के बहाने हिंदी साहित्यकारों (खासकर कवियों, अगर मैं सही समझा हूं तो) की चुप्पी और अपने सुविधाजनक खोल में घुसने की, आपने तो प्रूफ रीडिंग और एडिटिंग की क्लास शुरू कर दी प्रभो। वैसे, मैं अज्ञानी जहां तक जानता हूं, तो आप ज्ञान की उस धारा (पढ़ें मार्क्सवाद) से संबद्ध हैं, जो संप्रेषणीयता और सपाटबयानी को ही मानीख़ेज़ मानता है। कला को कला के लिए ही मानने का भ्रम नहीं पालता। तो फिर, ऐसा शुद्धतावादी दृष्टिकोण किसलिए? और हां, सबसे बड़ी बात यह कि एक की ग़लती के लिए आप पूरे युवावर्ग को ही उसी लाठी से नहीं हांक सकते हैं। यह नहीं कह सकते कि हमें पढ़ने-लिखने से खुद हम ही रोक रहे हैं। युवाओं में भी जिज्ञासा और शौक उतने ही हैं श्रीमन्। अरे हां, इसका मतलब यह कतई नहीं कि मैं ऊंट की शादी में गधे के गायन का समर्थक हूं या फिर इंटरनेट पर गंदगी फैलाने को उत्सुक रहता हूं…

उष्ट्रानाम विवाहेतु गर्दभा संति गायकाः
परस्परं प्रशंस्येते अहोरूपमहोध्वनि


तीसरी और अंतिम बात यह, कि मसले की बात हो, तो मजा आए। मसले पर बहस हो, तो अच्छा लगे। अपनी लियाकत और उम्र का सम्मान कीजिए और हरेक को एक ही लाठी से मत हांकिए, जैसे कि आपकी वजह से हरेक वरिष्ठ को हम लोग उसी सांचे में नहीं ढाल देंगे।

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1 टिप्पणी:

Ramji Yadav ने कहा…

भई वाह व्यालोक वाह वाह ! तुमने विष्णु खरे के पूर्वकथनों के आलोक में जो पुनरावलोक किया है उससे उनका शोक परलोक सिधार गया है और वे अंदर से अत्यंत हरे-भरे हो चुके हैं । भई अच्छी बहस भी एक उम्दा च्यवनप्राश जैसी होती है जो बाहर से लुपचुप और भीतर से गुपचुप व्यवहार का अवशिष्ट निकाल बाहर करती है और आदमी लंबी-लंबी सांसें लेता है और स्वस्थ दिखता भी है और लिखता भी है ।