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आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!
सोनम वांगचुक और युवा साथियों का सत्याग्रह केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है। यह शिक्षा, बेरोजगारी, लोकतंत्र और जवाबदेही के गहरे संकट का आईना है। ऐसे समय में असली सवाल यह नहीं कि कौन जंतर-मंतर पहुँचा, बल्कि यह है कि सरकार अब तक चुप क्यों है।
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भारत-अमेरिका FTA के खिलाफ कई राज्यों से हजारों किसानों का दिल्ली कूच
देश बचाओ मोर्चा ने केंद्र सरकार से मांग की कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते से संबंधित सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं तथा किसानों, मजदूरों, दुग्ध उत्पादकों, छोटे व्यापारियों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक चर्चा किए बिना कोई भी समझौता न किया जाए।
Editor’s Choice
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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक
ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?
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सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न
राजनीतिक सफलता का अर्थ केवल सही तर्क होना नहीं है। उसका अर्थ सही तर्क को उस भाषा में प्रस्तुत करना भी है जिसे समाज का बड़ा हिस्सा समझ सके। गांधी इसी कला के उस्ताद थे। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को अत्यंत सरल प्रतीकों में बदल दिया। यही कारण था कि उनका संदेश देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक पहुँच गया।
COLUMN
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विश्व पर्यावरण दिवस : हिमालयी पारिस्थितिकी और प्लास्टिक का प्रदूषण
भारत के पारिस्थितिकी संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण का संकट दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। नाज़ुक और संवेदी पहाड़ों पर 80 फ़ीसद से अधिक प्लास्टिक कचरा सिंगल यूज खाद्य और पेय पैकिंग से उत्पन्न हो रहा है। चिंताजनक यह है कि इस कचरे में 70 फीसद तो वह प्लास्टिक है जिसे न तो रीसायकल किया जा सकता है और न ही इसका कोई बाज़ार मूल्य है।
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काशी: पुस्तक परिचर्चा के दौरान शहर की बहुलतावादी संस्कृति पर सघन बहस
काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।
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आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान
डॉ. जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता।















