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पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व
जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।
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ओडिशा: डॉ. रैंडल सिक्वेरा और लक्ष्मण नायक गिरफ्तार, दमन जारी
लक्ष्मण नायक ‘मा माटी माली सुरक्षा मंच’ और समाजवादी जन परिषद के प्रमुख दलित कार्यकर्ता हैं। वे रायगड़ा जिले में मार्शल आर्ट सिखाते हैं। डॉ. रैंडल सिक्वेरा कालाहांडी और रायगड़ा जिलों में आदिवासी समुदायों के बीच काम करते रहे हैं। उन्होंने एमबीबीएस के बाद जनरल मेडिसिन में एमडी की डिग्री प्राप्त की। वे मेडिको फ्रेंड्स सर्कल और जन स्वास्थ्य अभियान के सदस्य भी हैं। दोनों ही खनन और औद्योगीकरण के कारण पैदा हुए विस्थापन तथा संकट के खिलाफ संघर्षरत जन आंदोलनों के समर्थन और इंसानी रिहाइशों की रक्षा के लिए समर्पित हैं।
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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक
ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?
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सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न
राजनीतिक सफलता का अर्थ केवल सही तर्क होना नहीं है। उसका अर्थ सही तर्क को उस भाषा में प्रस्तुत करना भी है जिसे समाज का बड़ा हिस्सा समझ सके। गांधी इसी कला के उस्ताद थे। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को अत्यंत सरल प्रतीकों में बदल दिया। यही कारण था कि उनका संदेश देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक पहुँच गया।
COLUMN
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संक्रमण काल: CJP के आंदोलन और उसके चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि
सीजेपी नया और तेजी से बदलता आंदोलन है। उसके सामाजिक चरित्र पर अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी। फिर भी सवाल महत्वपूर्ण है: क्या यह केवल एक राजनीतिक आंदोलन है, या भारतीय समाज में किसी गहरे बदलाव की आहट भी है?
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काशी: पुस्तक परिचर्चा के दौरान शहर की बहुलतावादी संस्कृति पर सघन बहस
काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।
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आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान
डॉ. जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता।














