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स्कूली शिक्षा की प्रगति को आईना दिखाती है नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट
सार्वजनिक शिक्षा में संसाधनों की वृद्धि करना जरूरी है, साथ ही केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच सामंजस्यपूर्ण, योजनाबद्ध तरीके से नीतियों, योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन व परिचालन करना पड़ेगा। शिक्षकों की कमियों को दूर करते हुए शिक्षण अधिगम गुणवत्ता को सुधारने के लिए कार्य करना होगा।
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शब्द सृजन करते हैं, वे हत्या का हथियार नहीं हो सकते: प्रो. गणेश देवी
प्रगतिशील लेखक संघ का 14वाँ राज्य सम्मेलन 24-25 अक्टूबर को इंदौर के अभिनव कला समाज सभागृह में नई कार्यकारिणी के गठन और जनसरोकारों से संबंधित प्रस्तावों को पारित करने के साथ सम्पन्न हुआ। छिंदवाड़ा निवासी वरिष्ठ कवि मोहन कुमार डहेरिया को प्रदेश अध्यक्ष और भोपाल के कवि अनिल करमेले को महासचिव मनोनीत किया गया।
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‘मृत्यु अचानक बंद हुआ दरवाजा नहीं…’ : कवि ऋतुराज की स्मृति में कुछ आत्मीय बातें
आज ऋतुराज जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके साथ बिताए समय को याद करते हुए उनकी अनुपस्थिति का अर्थ और गहरा हो जाता है। किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसकी कमी केवल इसलिए महसूस नहीं होती कि अब उससे मुलाकात नहीं होगी। कमी इस बात की भी होती है कि बातचीत के वे अवसर समाप्त हो गए, जिनमें नए प्रश्न उठते थे, विचारों का आदान-प्रदान होता था और जीवन को देखने की दृष्टि कुछ और व्यापक बनती थी।
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सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न
राजनीतिक सफलता का अर्थ केवल सही तर्क होना नहीं है। उसका अर्थ सही तर्क को उस भाषा में प्रस्तुत करना भी है जिसे समाज का बड़ा हिस्सा समझ सके। गांधी इसी कला के उस्ताद थे। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को अत्यंत सरल प्रतीकों में बदल दिया। यही कारण था कि उनका संदेश देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक पहुँच गया।
COLUMN
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संक्रमण काल: CJP के आंदोलन और उसके चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि
सीजेपी नया और तेजी से बदलता आंदोलन है। उसके सामाजिक चरित्र पर अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी। फिर भी सवाल महत्वपूर्ण है: क्या यह केवल एक राजनीतिक आंदोलन है, या भारतीय समाज में किसी गहरे बदलाव की आहट भी है?
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काशी: पुस्तक परिचर्चा के दौरान शहर की बहुलतावादी संस्कृति पर सघन बहस
काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।
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आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान
डॉ. जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता।















