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क्या आम आदमी पार्टी ने पंजाब पर भाजपा के कब्जे की राह बना दी है?
भाजपा द्वारा एक नयी अवधारणा पंजाब को देने के लिए आम आदमी पार्टी की विफलताओं ने अनुकूल वातावरण का निर्माण प्रदेश में कर ही दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपनी कुर्सी के लिए आम आदमी पार्टी की दिल्ली टीम के साथ एक तरह का समझौता किया हुआ है, ऐसे आरोप बार बार विपक्षी दलों द्वारा लगाए जाते रहे हैं।
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भोपाल : वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट तथा उभरते विकल्पों पर परिचर्चा
‘जोशी-अधिकारी इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़’, ‘हम सब’ और ‘गांधी भवन’ द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में श्रोताओं की उपस्थिति उत्साहजनक रही, जिनमें राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, राम प्रकाश त्रिपाठी, पलाश सुरजन, आरती, बालेंदु परसाई, शैलेंद्र शैली, सुधीर सजल, उपासना बेहार, स्मिता सत्यमेव आदि शामिल रहे।
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नेपाल: इतिहास का पहिया पीछे न जाए, सतर्क रहने की जरूरत!
इस आन्दोलन का संचालन कौन लोग कर रहे थे, इसकी जानकारी अब धीरे धीरे सामने आ रही है. मुख्य किरदारों में हैं–बालेन्द्र (बालेन) शाह जो काठमांडू का मेयर है और सुदन गुरुंग जो ‘हामी नेपाल’ नामक एनजीओ का संचालक है. टाइम पत्रिका के 2023 के टाप 100 लोगों में बालेन शाह का नाम है. सुदन गुरुंग के ‘हामी नेपाल’ नामक एनजीओ को कुछ अमेरिकी कंपनियों से करोड़ों रूपये की वित्तीय सहायता मिली है.
Lounge
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छह दशक से कविता के ‘अंधेरे में’ भटकता मुक्तिबोध का कहानीकार
मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया में कविता चूंकि कहानी लिख पाने में हासिल विफलता के बाद आती है (जिसका उद्देश्य महज खुद को प्रकट कर के खो देना है), फलस्वरूप मुक्तिबोध के ही लेखे ‘‘साहित्यिक फ्रॉड’’ का अनुपात उनकी कविताओं में उनकी कहानियों के बनिस्बत कहीं ज्यादा है।
COLUMN
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विश्व पर्यावरण दिवस : हिमालयी पारिस्थितिकी और प्लास्टिक का प्रदूषण
भारत के पारिस्थितिकी संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण का संकट दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। नाज़ुक और संवेदी पहाड़ों पर 80 फ़ीसद से अधिक प्लास्टिक कचरा सिंगल यूज खाद्य और पेय पैकिंग से उत्पन्न हो रहा है। चिंताजनक यह है कि इस कचरे में 70 फीसद तो वह प्लास्टिक है जिसे न तो रीसायकल किया जा सकता है और न ही इसका कोई बाज़ार मूल्य है।
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काशी: पुस्तक परिचर्चा के दौरान शहर की बहुलतावादी संस्कृति पर सघन बहस
काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।
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अजय भवन में विश्वनाथ त्रिपाठी: क्योंकि सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता…
विश्वनाथ जी का ही फोन था। मैंने खुद को उम्मीद करने से रोका। उन्होंने पूछा कि आपको तीन लोग लाने होंगे मुझे कुर्सी पर बिठाकर उतारने के लिए। मैंने कहा हम चार आ जाएँगे। उन्होंने कहा कि मैं एक घंटे से ज़्यादा नहीं बैठ सकूँगा। मैंने कहा अप दस मिनट बाद वापस जाना चाहेंगे तो आपको वापस ले चलेंगे। बोले- ठीक है, आ जाइए।















